संथाल नवोदय को गुरूजी ने गठा, बाद में वह आदिवासी सुधार समिति कहलाया -4

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संथाल किंग शिबू सोरेन

‘ज़िंदगी तल्ख़ सही लेकिन दिल से लगाए रखना’ – संथाल किंग गुरूजी -भाग 4

भारत के बड़े पूँजीपति वर्गों ने अपनी लूट-खसोट पर केन्द्रित मुनाफे को गति देने के लिए करोड़ों बहाकर 2014 में भाजपा-मोदी को कोंग्रेस का विकल्प साबित करते हुए जनता में अच्छे दिन का उम्मीद जगा दाँव लगाया था। लेकिन मोदीजी के सता में आते ही जनता यह उम्‍मीद न सिर्फ़ नाउम्‍मीदी में तब्‍दील हुई, बल्कि मेहनतकश जनता, आदिवसी-मूलवासी, दलित, किसान, गरीब, बेरोज़गार युवा, बेटियों जैसे तमाम तबके की ज़ि‍न्दगी बद से बदतर होती गयी। अंततः लूट-खसोट तथा घपले-घोटालों की फेहरिस्त में भाजपाइयों ने वो इतिहास रचा जो कांग्रेस 60 सालों में न रच पायी।

भारत की एकता अखंडता को तो तार-तार किया ही, संविधान को तक पर रखते हुए तमाम संविधानिक संस्थाओं को तहस-नहस कर दिया। इस फेहरिस्त में दलित – आदिवासी – मूलवासियों के आरक्षण को प्रोपगेंडा रच न सिर्फ ख़त्म करने का प्रयास किया, बल्कि झारखंड सरीखे पांचवी-छठी अनुसूची राज्यों में ज़मीन-खनीज-सम्पदा लूटाने के बावजूद भी जब इनसे अर्थव्‍यवस्‍थान न सुधारी तो इन क्षेत्रों से आदिवासियों को ही खदेड़ने की स्थिति रच दी। परन्तु संथाल किंग दिशोम गुरु शिबू-सोरेन के संस्कारों वाले झामुमो ने चट्टान के भांति खड़ा हो अपने भाइयों को बुलंद आवाज लगाई…। एक बार फिर आदरणीय गुरूजी के फार्मूलों ने गरीबों की ढाल बन रक्षा की।

ज़रूर पढ़े : गुरूजी एक विचार हैं – भाग 1

                 गुरूजी के विचारों से ख़ौफ़ – भाग 2

        गुरूजी ने सहयोगियों के साथ मिल किये सामाजिक आंदोलन का शुरुआत  – भाग 3

इस कड़ी को आगे बढ़ते हुए आज गुरूजी के जीवन पर आधारित चौथा लेख समर्पित करता हूँ। पिछले भाग में, गुरूजी को गिरफ्तार करने आयी पुलिस को गुरूजी ने महिला का रूप धारण कर चकमा देते हुए नेमरा के संकीर्ण गलिओं से बाहर निकलने में कामयाब रहे। एक बार गिरिडीह, पारसनाथ पहाड़ के गोद में बसने वाला गाँव भेलवाडीह को पुलिस बल ने गुप्तचरों के सूचना के आधार पर चारों ओर से घेर लिया। ख़बर थी कि गुरूजी यहाँ रुके हुए है, सच था भी यही, वहां के मल्लाह व अन्य समुदायों ने प्रशासनिक स्थिति पर विचार करने व मछली खिलाने स्नेह पूर्वक उन्हें बुलाया था। पुलिस का कहना था कि गुरु जी को उन्हें दे दें, बिना नुकसान पहुँचाए चले जायेंगे।

गुरूजी के विचारों में आस्था रखने वाले मल्लाहों का मुख्या शंकर निषाद ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए अपने दो-चार साथियों को टोकरी समेत साथ लेकर मछली पकड़ने गाँव के बड़े तालाब के समीप पहुँच आग जला दी। अभी रात का तीसरा पहर ही था, इस वक़्त अमूमन एक दूसरे को पहचानना थोड़ा मुश्किल होता है। दूर से आग लौ देख वहां पुलिस भी धमकी, शंकर ने उन्हें बैठने का आग्रह करते हुए उन्हें मूस खाने का  निमंत्रण दिया। मूस पकाने का और खाने का सुन हुक्मरानों ने नाक-भाव सिकोड़ते हुए पूछा कि हमें यहाँ गुरूजी के आने की ख़बर मिली, तुमने देखा हो तो बतायें। शंकर ने उनसे कहा, “वे कभी-कभार ही इस गाँव में आते हैं, इधर तो कई दिनों से देखा नहीं हुआ है, सुना है वे टुंडी छोड़ संथाल के तरफ चले गए हैं”। इतने में एक हाकिम ने भरी आवाज़ गोला थाने मछली पंहुचाने को कह मूस के दुर्गन्ध वश जल्दी में चलने लगे। मल्लाहों ने उत्तर दिया जैसी आज्ञा हुजुर… लेकिन उन हुक्मरानों को क्या मालूम था उन्हीं में से एक हमारे गुरूजी भी थे जो …।

इस दौरान गुरु जी विभिन्न दलों व नेताओं के संपर्क में आये लेकिन उनके मेनुफेसटो व विचारधारा से सहमत/संतुष्ट न हुए। के.बी.सहाय, केदारनाथ, व अजय शर्मा के बीच विभेद देख सन् 1962 में चित्तरपुर आ मंज़ूर हसन खां संग जुड़े। मंज़ूर हसन खां के पिता मो. यासीन खां खुले विचारों वाले समाज सेवी थे, जिन्होंने सन् 1940 में गोला में हाईस्कूल की स्थापना की थी, मंज़ूर साहब विरासत में मिले गुणों को आत्मसात कर समाज सेवा की ओर अग्रसर थे। गुरूजी को इनका भी दबावपूर्ण रवैया पसंद न आया, मंज़ूर साहब विधायक चुनाव जीत सपथ ग्रहण को पटना गए तो गुरुजी भी बांधडीह होते हुए बोकारो की राह पकड़ ली। उन दिनों गुरूजी नौजवान थे, उस नौजवान को लोग मूंछ वाला कहते थे, जिन्होंने संथाल नवोदय का गठन किया जिसे बाद में आदिवासी सुधार समिति कहा जाने लगा। उनका मन राजनीति से उचटने लगा था कि तभी शंकर करमाली ने उन्हें टुंडी आने का न्यौता दिया … शेष कहानी अगले लेख में।

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