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परंपरा

झारखंडी परंपरा व मान्यताओं को भाजपा ने तार-तार कर दिया है

ऐतिहासिक तौर पर झारखंड राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी संस्कृति को लेकर भिन्न-भिन्न मान्यताएं व परंपरा रही है। भाजपा की रघुवर सरकार ने झारखंड में खनिज सम्पदा की लूट की नयी पारम्परा गढ़ यहाँ के तमाम पुरानी परंपरा को सत्ता के ताकत के दम पर छिन-भिन्न कर कर दिया है, जो पुलिस-सरकार और ग्रामीणों के बीच आसानी से न सुलझने वाले विवाद में तब्दील हो गया है। इनके इन्हीं अलग-अलग मान्यताओं व परंपरा के अक्स तले आदिवासी समाज असमंजस की स्थिति उनमे टकराव के मुहाने पर ला खड़ा किया है। उस वक़्त के बिगड़े हालात वर्तमान में आदिवासी समाज में कोलाहल की स्थिति पैदा कर रही है। 

इतिहास गवाह है कि यहाँ के आदिवासियों ने अपनी स्वतंत्रता, आत्म-गरिमा व शोषण-उत्पीडन के विरुद्ध शुरू से ही कुर्बानियां देते आये हैं। एक ब्रिटिश मेजर लिखते हैं कि 1856 के दौर में आदिवासी छोटे-छोटे दलों ने घूमते रहते थे। नगाड़े की आवाज़ सुनते ही हज़ारों की संख्या विद्रोह करने जुट जाते थे और यह सिलसिला अंग्रेजों के दौर में सिद्धू-कान्हू समेत अन्य नेता, यहाँ तक कि 9-10 बरस के बच्चों तक को फाँसी पर लटकाए जाने के बाद भी नहीं रुका। आदिवासियों की यही ग़जब की बाहुदरी के दम पर अंग्रेजों तक को धूल चटा दी थी। 

वर्तमान में पश्चिमी सिंहभूम जिले की बुरुगुलीकेरा गांव की घटना उसी टकराव की एक दृश्य को लेकर व्यवस्था सामने आया है। इसके लिए झारखंड के नयी चुनी हुई सरकार को अतिशीघ्र झारखंड में बसने वाले प्रत्येक समुदाय के मुखियों के साथ बैठक कर सामाजिक समरसता के रास्ते निकालने पड़ेंगे। यही नहीं इनके सामाजिक व्यवस्था के वह तमाम तंत्र जिसे पिछली सरकार ने अपने नीतियों के आसरे ध्वस्त कर दिए हैं, उसे फिर से तत्काल प्रभाव से बहाल करने पड़ेंगे। क्योंकि ऐसी सामाजिक समस्याओं का हल न ही बंदूक के जरिये निकाले जा सकते हैं और न ही जल्दी में। यही नहीं झारखंडी मिज़ाज के तमाम बुद्धिजीवियों को भी इसमें आगे आते हुए पहल करनी पड़ेगी।

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