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पत्थलगढ़ी आन्दोलन भाजपा की करतूत की उपज

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रमण

पत्थलगढ़ी आन्दोलन का शुरुआती दौर 2017 माना जाता है और इसके जद में अबतक झारखण्ड और छत्तीसगढ़ के लगभग 300 गाँव आ चुके हैं। इस आन्दोलन का तहत संविधान के पन्नों में निहित 19 (5) का उपयोग कर कानून बनाने की मांग जिससे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बिना ग्रामसभा के अनुमति के न कोई सरकारी अधिकारी और ना ही कोई गैर-आदिवासी प्रवेश  कर सके।

आन्दोलन को कैसे समझा जाए

तस्वीरें कुछ कहती है वह क्या है-

आदिवासी ग्राम के बाहर या सीमा पर पत्थर खड़े किए होना, जिसपर पाषाण युग की तरह शिला लेखन के माध्यम से चेतावनी अंकित होना!

  • या, आदिवासी बाहुल इलाके में बिना ग्रामसभा के अनुमति के किसी भी गैर आदिवासी का प्रवेश निषेद होना।
  • या, पेसा (PESA –) अधिनियम के कुछ नियम लिखा होना।
  • या, भारत के संविधान के कुछ अनुच्छेदों का व्याख्यायान कर ग्रामसभा की शक्तियों का बोध करना होना।
  • या, आदिवासी तीर-कमान से परिपूर्ण हो अपने ग्राम की रक्षा के लिए तत्पर होना।

 पत्थलगढ़ी परम्परा की शुरुआत कैसे हुई

पत्थलगढ़ी परम्परा की शुरुआत मुंडा-आदिवासी रीतिरिवाजों की देन है। मुंडा आदिवासी की संख्या झारखण्ड में सर्वाधिक है। इस रीति के अनुसार जब किसी माननीय व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी तो उसके याद में पत्थर गाड़ा जाता था और विभिन त्योहारों में उन्हें याद भी किया जाता था। कभी-कभी सूचना-पट के तौर पर भी इसका प्रयोग होता देखा गया है। इसकी शुरुआत इसी परंपरा से माना जाता है।

पत्थलगढ़ी आन्दोलन में पत्थलगढ़ी का क्या अर्थ है

पत्थलगढ़ी का अर्थ है, एक बड़ी शिला, हरे रंग से रंगा गया, जिसपर लिखा गया है, यहाँ सिर्फ ग्रामसभा का कानून माना जायेगा क्योंकि पांचवी अनुसूची में प्राप्त अधिकार के तहत हमारे लिए ग्रामसभा ही संप्रभु अधिकार है। हम सिर्फ इसी के द्वारा पारित नियम-कानून मानेंगे। ग्रामसभा कानून के अंतर्गत बाहरी का प्रवेश हमारे सीमा में निषेद है (खास कर सरकारी कर्मचारी का)।

ऊपर चित्र में आप देख सकते हैं कि कुछ आदिवासी बैठे हैं जो संविधान की कॉपी लिए आनेवाले पत्रकारों को दिखाते हुए विधान बताने का प्रयास कर रहे है। ये कह रहे है आप इतने पढ़े-लिखे हो फिर भी आपने संविधान को ठीक से नहीं पढ़ा है। या ये कहें कि हमने संविधान के फाइन प्रिंट ठीक से नहीं पढ़ा, क्या है ये फाइन प्रिंट? समझने की कोशिश करते हैं।

संविधान के फाइन प्रिंट में अनुच्छेद 13 में यह व्याख्यान है कि:-

  1. संविधान लागू होने के पूर्व यदि कोई संविधान लागू था और वह फंडामेंटल राईट या मूल अधिकारों के खिलाफ हो तो वह कानून अमान्य होगा। इससे पता चलता है कि मानव के मूल अधिकार ही सर्वोपरी है।
  2. राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग द्वारा प्राप्त अधिकारों को छीनती हो या न्यून करती हो और इस खंड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि-उल्लंघन की मात्रा तक को शून्य माना जायेगा।

वहीं अनुच्छेद 13(3) का कानून व्याख्यान करता है कि :-

क) यदि कोई पूरानी सरकारी अध्यादेश, आदेश, कानून, नियम, विनियम, अधिसूचना, रीति-रिवाज आदि यदि मूलाधिकारों (Fundamental Rights) के खिलाफ नहीं है तो ये ख़त्म नहीं हो सकते।

ख) आदिवासी यह कह रहें है कि भाग (क) के अनुसार इनके रीति-रिवाज किसी भी मूलाधिकारों का हनन नहीं करती और भाग -ख के अनुसार हमारी संस्था (अन्य सक्षम प्राधिकारी) को भी इसके अंग होने का अधिकार प्राप्त है। यानि हमारे संस्था या हमारे बुजुर्गों द्वारा बनायी कोई कानून है और वो गलत नहीं है या मानवाधिकारों का हनन नहीं करता तो वह संविधान के भी खिलाफ नहीं है इसलिए वे निरस्त नहीं हो सकते।

आगे जब हम संविधान के पन्ने पलटते हैं तो अनुच्छेद 19 भी इसी की व्याख्यान करता है:-

  • 19 (d) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध घूमने या विचरण करने के लिए स्वतंत्रता हैं।
  • 19 (e) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने के लिए स्वतंत्रता हैं।

वहीं अनुच्छेद 19 का (5) व्याख्यान करता है:-

उक्त खंड के [उपखंड (d) और उपखंड (e)] में दिए गए अधिकार अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के आलोक में इन क्षेत्रों में लागू नहीं होती। यानि यहाँ कि राज्य सरकारे बाहरी लोगों को यहाँ आने से रोक सकती है। ऐसे कई राज्य हैं जैसे नागालैंड, मिजोरम आदि जहाँ ये कानून पारित है। यहाँ आने के लिए सरकारी परमिट या आदेश की आवश्यकता होती है जिसमें सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं।

अब समझते हैं कि आखिर ये अनुसूचित जनजाति क्षेत्र है क्या? इसे समझने के लिए हमें अनुच्छेद 244 के व्याख्यान को समझना पड़ेगा।

अनुच्छेद 244 :   अनुसूचित क्षेत्र एवं अनुसूचित जनजाति की व्यवस्था व्याख्यान करता है

इसके अंतर्गत (Vth & VIth scheduled) पांचवीं और छठी अनुसूची का जिक्र आता है।

-पांचवीं अनुसूची में आने वाले क्षेत्र : झारखण्ड, राजेस्थान, हिमाचलप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओड़िसा, अन्द्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्रा एवं मध्यप्रदेश 

-छठी अनुसूची में आने वाले क्षेत्र  : असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम

इस प्रावधान के अनुसार इन राज्यों के आदिवासी बाहुल क्षेत्रों में यहाँ की राज्य सरकारें इनके लिये कोई भी आम कानून पारित नहीं कर सकती। इन इलाकों में कानून पारित करवाने के लिए गवर्नर या राज्यपाल को ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल नियुक्त करना पड़ता है। फिर किसी कानून को पारित करवाने के लिए इन ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल से बात करनी पड़ती है या सहमती लेनी पड़ती है।

पाचवीं अनुसूची के अनुसार यहाँ के गवर्नर को अधिकार प्राप्त है कि राज्य सरकार द्वारा पारित किसी भी आम क़ानून पर ये इन क्षेत्रों में रोक लगा सकते हैं।

अभी तक ये देखा गया है कि ऐसे राज्यों में जब कोई नियम-कानून लागू होता है तो अमूमन पूरे राज्य में लागू हो जाता है, जिसमें अनुसूचित क्षेत्र भी शामिल होते हैं। पर ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल के पास ये अधिकार होता हैं कि वे पारित नियम-कानून में संशोधन करवा सकती है जिसे गवर्नर को संशोधन करना ही पड़ेगा। इसका उदाहरण हम राजस्थान में देख सकते हैं वहां कोई भी कानून लागू होता है तो पूरे राज्य में लागू हो जाता है परन्तु वहां के एडवाइजरी काउंसिल चाहे तो संशोधन करवा सकती है।

 ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल क्यों नहीं बन पाती

  • इन क्षेत्रों के लोग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते जिसका फ़ायदा सरकारें उठती है।
  • अधिकांश जानकारी के आभाव में इसका गठन नहीं हो पाता।
  • ऐसा देखा जाता है कि सरकार की इच्छा भी नहीं होती क्योंकि उनको ज़मीन अधिग्रहण जैसे मामलों में इसके चलते अड़चन महसूस होता है।
  • ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल के पास अधिकार होते हैं जिससे वे राज्य सरकार की मनमानी पर रोक लगा सकती है।

जबकि, ट्राईबल एडवाइजरी काउंसिल का गठन अनिवार्य होता है, गवर्नर को इनके साथ लगातार बैठकें कर सालाना राष्ट्रपति को रिपोर्ट भी प्रस्तुत करना होता है। कुल मिला कर हम कह सकते हैं पाचवीं और छठी अनुसूची को सरकारें जानबूझकर ठीक से लागू नहीं करती हैं।

इसी फेहरिस्त में अब पेसा (PESA) कानून को समझते हैं

  • PESA  : Panchayats(Extension to Scheduled Area) – Act 1996
  • पेसा     : पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996

देश में पंचायती राज अधिनियम 1993 में लागू हुआ था परन्तु अनुसूचित क्षेत्रों के कायदे-कानून अलग होने की वजह से इस अधिनियम में कुछ बदलाव कर तीन साल बाद 1996 में लागू किया जा सका और यह अधिनियम पेसा (PESA), पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 के नाम से जाना गया।

इस अधिनियम में क्या बदलाव हुए

  • इस अधिनियम के अनुसार इसके अधिकार क्षेत्र में आने वाले पंचायत या गाँव अपने हिसाब से अपने रीति-रिवाज के अनुकूल अपना कार्य कर सकती है।
  • एलेक्ट्रोल रोल के आलावा दूर दराज में छितराए ग्राम भी ग्रामसभा माना जायेगा।
  • उन्हें यह अधिकार प्राप्त है कि वे अपनी परम्परा या  बुजुर्गों द्वारा बनाये गए कायदे-कानून और रीति-रिवाजों के अनुकूल अपने लोगों के लिए कानून बना सकते हैं।
  • उन्हें ये भी अधिकार प्राप्त हुआ कि वे अपनी ज़मीन, अपने चारागाह, अपने जंगल या वन क्षेत्र आदि बचाने के लिए खुद ही क़ानून बना सकते हैं।

पेसा (PESA) के प्रावधान

  • यदि राज्य की विधानसभा कोई क़ानून बनाती है तो उसे यह ध्यान रखना होगा कि इन आदिवासियों के नियम-क़ानून इनके ही अनुरूप हो, साथ ही ये ध्यान रखना होगा कि वहाँ के धार्मिक मान्यताओं के साथ कोई खिलवाड़ ना हो।
  • ग्रामसभा के अनुमति के बिना इन इलाकों में कोई कार्यक्रम या परियोजना लागू नहीं होंगे।
  • यदि किसी परियोजना के लिए कोई ज़मीन ली गयी हो तो वह वापस भी कराई जा सकती है और कानून का उलंघन कर ज़मीन ली जा रही हो तो भी ग्रामसभा मना कर सकती है।
  • पहले भी कोई ज़मीन ली गयी हो तो ग्रामसभा के माध्यम से वापस ली जा सकती है।
  • गाँव के लोकल सरकारी इकाई और संस्थानों आदि पर ग्रामसभा का ही अधिकार होगा।
  • यदि सरकार चाहती है कि किसी परियोजना के लिए ज़मीने अधिग्राहित की जाय तो उसे ग्रामसभा से अनिवार्य रूप से बात करना पड़ेगा या सहमती लेनी पड़ेगी क्यूंकि यह ग्रामसभा का अधिकार है।

अब हम आते हैं पत्थलगढ़ी के मुख्य बिंदुयों पर

राज्य की बीजेपी सरकार दो पुराने कानूनों को बदलना चाह रही है इसलिए ये सरकार संदेह के घेरे में हैं। कोन से हैं वो कानून:

  • CNT एक्ट –1908 (Chhota Nagpur Tendency Act. )छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 
  • SPT एक्ट  -1949  (Santhal pargana Tendency Act.)-संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम

मामला यह है कि झारखण्ड राज्य की बीजेपी सरकार राज्य में लैंड-बैंक बनाना चाहती है इस प्रक्रिया के तहत वे खुद ही ज़मीन अधिग्रहित कर अपने पास रखना चाहती है ताकि बाहर की कंपनियों या बाहर के लोगों को बिना रोक-रुकावट के ओनें-पौने दामों में ज़मीन मुहैया करा सके।

ग्रामसभा या (PESA) पेसा को भंग करने के इरादे से झारखण्ड में बीजेपी की सरकार बैकडोर से विकास समिति और आदिवासी विकास समिति का निर्माण कर रही है। ( इस बिन्दु को हम अगले लेख में समझेंगे… ),  सवाल ये है कि यदि आदिवासियों के लिए पहले से ही सटीक कानून मौजूद हैं और वो  मूल-अधिकारों का भी हनन नहीं करती तो फिर विकास समिति और आदिवासी विकास समिति के निर्माण की आखिर आवश्यकता सरकार को क्यों आन पड़ी। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार की मंशा में खोंट है जिसे यहाँ के भोले-भाले आदिवासी भली-भांति समझ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि उन्हें छला जा रहा है और उनके मानवाधिकारों का हनन हो रहा है।

आदिवासी चाहते हैं कि सरकार की यह जनविरोधी कानून को रोके। इसी उद्देश्य के तहत यहाँ जो विरोध पनपा उसी का नाम पत्थलगढ़ी आन्दोलन है।

इस आन्दोलन को कुचलने के लिए सरकार ने आदिवासी आन्दोलनकारियों पर गोली चलवाई और तो और इनके खिलाफ गोदी मीडिया के माध्यम से यह दुष्प्रचार भी करवा रही है कि ये गलत हैं और देशविरोधी है। सरकार ये कहने से क्यों डर रही है कि 70 वर्षों में भी अबतक यहाँ विकास क्यों नहीं पंहुचा? इनके विकास के लिए जो पैसा आता है उसका अधिकांश भाग बीच में कहाँ गायब हो जाता? सरकार क्यों नहीं मानती की इनका गुस्सा हर हद तक जायज है। सरकार क्यों नहीं बताती इन्हें जो शौचालय उपलब्ध कराया है उसमें वह पानी की व्यवस्था कब और कैसे करेगी? सरकार क्यों नहीं बताती कि इनकी मातृभाषा में इन्हें कब पढाया जायेगा जबकि दिख रहा है कि इनकी संस्कृति खत्म होने के कगार पर खड़ी है।

 सरकार और उनके मंत्रियों का क्या कहना है  

  • सरकार कहती है कि पत्थलगढ़ी आन्दोलन को हवा देश-विरोधी ताकतें दे रही है जबकि आदिवासियों का कहना है कि उनकी सारी बातें तो संविधान के अनुरूप है फिर कैसे देश-विरोधी हो गयी।
  • देश में ही छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार पत्थलगढ़ी आन्दोलन को सही कह रही है फिर झारखण्ड में इसका विरोधाभास क्यों?
  • सरकार कहती है यहाँ अफीम की खेती होती है इसी कारण से ये आन्दोलन है जबकि तथ्यों को देख कर ऐसा प्रतीत नहीं होता।
  • सरकार के मंत्री वीडियो बना कर गलत प्रचार कर रहें है कि आप जो संविधान का पाठ पढ़ा रहे हैं वो गलत है लेकिन संविधान की सही व्याख्याय क्या है वह यह क्यों नहीं बताते?

अंततः हम देखते हैं कि आन्दोलनकारियों को जेल में डालना सरकारों का सबसे पसंदीदा कार्य रहा है यह सरकार भी इस परंपरा को जीवित रखी है। सरकार ने मार्च 2018 में पत्थलगढ़ी आन्दोलन के आन्दोलनकारियों को भी जेल में डाल दिया। जिन्हें जेल में डाला गया है वे लोग काफी पढ़े-लिखे हैं और जिम्मेदार भरे पदों पर कार्य भी कर चुके हैं।

  • विजय कुजूर – (सिप्पिंग कॉर्पोरसन ऑफ़ इंडिया में मनेजर के पद पर कार्य कर चुके हैं) और ये आदिवासी महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं।
  • हर्मन किंडो – (आईएस रह चुके है।)
  • जोशेफ़ तिग्गा – ओंएनजीसी के एक्स एम्प्लोई रह चुके हैं।

 

 

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