झारखंडी सम्मान, हमारी बहनों की बेइज्जती होने पर भी सुदेश क्यों नहीं बोलते 

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झारखंडी सम्मान

आंगनबाड़ी बहने नहीं हमारी झारखंडी सम्मान की बेइज्जती है 

झारखंड में आंगनबाड़ी वर्कर्स, गुलाबी साड़ी में नेवी ब्लू रंग की पाड़ वाली महिलाओं का झुंड, यूँ कहें कि झारखंड भर के शिशुओं की माँ, अपने खुद के बच्चों को बिलखते छोड़, अपने घरों को बेसहारा छोड़, जीने के आम शर्तों के लिए तकरीबन सवा महीने से गाँधीवादी तरीके से हड़ताल पर थी, जब सरकार की कानों में जूँ न रेंगी तो तेरह दिनों से भूख हड़ताल पर बैठी रही, फिर भी जब सरकार टस से मस नही हुई, बल्कि उन्हें चयन मुक्त करने का फरमान सुना दिया अंत में ये बहने मुख्यमंत्री रघुवर दास को अवगत कर उनसे मिलने निकली ही थी, सामने झारखंड पुरुष पुलिसकर्मी दीवार बन खड़ी हो गयी, एक भी महिला पुलिसकर्मी नहीं। लगे इन अबलाओं पर लाठियाँ भांजने, कोई बेहोश हुई, किसी का सर फूटा तो किसी के हाथ-पाँव, यहाँ तक कि इनके कलाई तक पकड़ी गयी। निर्दयता की पराकाष्ठा यह थी कि इन घायल बहनों को अस्पताल ले जाने तक की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई गयी। 

सुबूत के तौर पर वायरल वीडियो में यह देखा जा सकता है कि इन महिलाओं पर लाठी चार्ज के वक्त पुलिस की टीम में कोई महिला पुलिसकर्मी नहीं है, सारे-के-सारे पुलिसवाले पुरुष हैंप्रदर्शन कर रही महिलाओं पर ये लाठी चलाते, छीनाझपटी करते देखे जा सकते हैं इससे परेशान हो एक आंगनबाड़ी बहन पुलिसवाले से तू-तू मे-मे करती है तो वह पुलिसकर्मी उसे ज़ोर-ज़ोर से लाठी मारता है, जब पीटते हुए लाठी जमीन पर  गिर जाती है. तब वो उस महिला को घूंसे से मारता है। विडंबना यह है कि इन बहनों के साथ झारखंड के कई राजनीतिक दलों में केवल झारखंड मुक्ति मोर्चा ही अब तक खड़ी दिखी है। दिलचस्प बात यह है कि आजसू पार्टी के अध्यक्ष सुदेश कुमार महतो जो सत्ता के साथ कंधे से कंधे मिलकर चल रहे हैं, चुनाव के वक़्त चुल्हे का दीया जलाने की बात करते हैं, जो महिलाओं को स्वावलंबी बनाने की बात करते हैं, उनके मुँह से घटना के 72 घंटे बीत जाने बाद भी एक शब्द नहीं निकला है। वाह रे झारखंड का संस्कारी पुत्र तुझे सलाम!

मसलन, अब जनता को ही तय करना है कि कौन है झारखंड के असली माटी पुत्र -एक तरफ हेमंत सोरेन ने भूख हड़ताल पर बेठी अपनी बहनों के लिए पंखे, कंबल, चादर, सफाई आदि का व्यवस्था करवाई। यही नहीं घटना के बाद अपनी बदलाव यात्रा को बीच में छोड़ अपनी बहनों को मिलने आये और उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए कहा कि वे उन पुलिसकर्मियों को सजा जरूर दिलवाएंगे, जबकि वहीँ दूसरी तरफ सुदेश महतो सरकार के गोद में अबतक बैठे हैं। ये न सीएनटी/एसपीटी के वक़्त बोले थे, न जब झारखंडी बेटे रघुवर की लाठी खा रहे थे तब बोले थे और न ही अब बोले जब झारखंडी सम्मान, हमारी बहने लाठी खा रही थी। झारखंड के मुसीबत के वक्त ये आखिर  क्यों खड़े नहीं होते?     

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