चुनावी लोकतंत्र

चुनावी लोकतंत्र को संविधान के समक्ष युवा पूंछ कि बजाय सूंड से पकड़ पटखनी देंगे

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भाजपा के चनावी लोकतंत्र को युवा इसबार संविधान याद दिलाएंगे 

नये साल के महज तीसरे महीने में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए सात चरण में होने वाले आम चुनाव के दिन मुकर्रर किये गए, उम्मीद भी यही थी। ऐसे में जाहिर है कि सबसे बड़े लोकतंत्र के तमगे वाले देश के लिए जहाँ सबसे बड़ी चुनौती चुनाव होता है तो इसका सबसे बड़ा दुश्मन तानाशाह ही होता है। और अगर सत्ता अपनी चुनावी जीत को ही संविधान से ऊपर मानने लगे तो ऐसे में लोकतंत्र के निवासियों के समक्ष लोकतंत्र बरकरार रखने की चुनौती सर्वोपरी हो जाती है, जो कतई आसान नहीं होता।

झारखंड में यह खुलकर उभरा कि नक्सल के विरुद्ध बीजेपी की राजनीति जनता के समक्ष हार गयी। ठीक वैसे ही जैसे संतोषी सरीखे कईयों की जान पेट में अनाज न होने के कारण चली गयी, यहां के विकास की परिभाषा की लकीर इतनी छोटी कर दी कि संतोषी के माँ के शादरी शब्द ‘मुख्यमंत्री’ पर भारी पड़ गया। तो दूसरी ओर लगातार एकतरफ़ा विपक्ष अपने विधायक खोते रहे परन्तु भाजपा द्वारा खरीदे गए विधायक व फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर जीते कई मेयर पर आज तक कोई कार्यवाही न हो पाना भी महंगाई की भांति यहां की जनता को टीस मारती रही है।

जिस प्रकार यहाँ की ज़मीन-जंगल-खनिज-संपदा कौडियों के मोल देशी विदेशी उद्योगपतियों को दी गयी और एवज में राज्य के खज़ाने में गये महज तीन फीसदी व सत्ता को मुनाफे के तौर पर दस से बारह फीसदी मिले। अगर यही विकास की लकीर खुद के मुनाफे की जगह राज्य के कल्याण के मुताबिक खींची गयी होती तो इस राज्य का सूरते हाल कुछ और होता। लेकिन मौजूदा सरकार के चुनावी लोकतंत्र के पेंच में पेट भर अनाज मुहैया कराना भी भारी पड़ गया।

बहरहाल, राजनीति का पाठ तो यही कहता है कि भाजपा ने राजनीतिक जुमले गढ़ समाज के ताने-बाने को तार तार कर दिया, जिसमे संवैधानिक मूल्यों की हार हुई। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे बड़े नेता बड़े अरबपतियों के साथ बहुत ख़ुश नज़र आते हैं, मानो जैसे इन उद्योगपतियों ने देश के निर्धन जन की सेवा करके अरबों कमाए हों। इसलिए साहब ने इनके लिये देश के समस्त लोकतांत्रिक संस्थानों को ही नष्ट कर दिया। सच तो यह है कि मोदीजी-रघुवर दूसरों को आईना दिखाते दिखे पर ख़ुद कभी नहीं देखे। शायद यही वह वजहें रही जिसमे झारखंड संघर्ष यात्रा के दौरान उमड़ी युवाओं के भीड़ ने हेमंत सोरेन को यह कहने से नहीं चुके कि वे इस बार भाजपा के चुनावी लोकतंत्र को पूंछ से नही बल्कि सूंड से पकड़ संविधान के समक्ष जोरदार पटखनी देंगे।

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