मारंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृति योजना के लिए चुने गए छह मेधावी विद्दार्थी

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मारंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृति योजना

मारंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृति योजना से उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित होंगे आदिवासी समाज के युवा 

मारंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा के इंग्लैंड प्रवास के 100 साल पूरे हो गये हैं. जयपाल सिंह मुंडा देश के पहले आदिवासी और उन गिने चुने भारतीयों में से एक थे जिन्हें उस दौर में ऑक्सफोर्ड में पढ़ने का मौका मिला था. जयपाल सिंह मुंडा उच्च शिक्षित व्यक्ति थें और उन्हें आदिवासी समाज, मारंङ गोमके (महान लीडर) के उपनाम से संबोधित करता है. यह सुखद संयोग है कि झारखंड सरकार ने मारंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा पारदेशीय छात्रवृति योजना की शुरूआत की है. 

योजना के तहत, झारखंड के आदिवासी समुदाय से छह प्रतिभाशाली विद्यार्थियों का पहला बैच इंग्लैंड व आयरलैंड के विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए जा रहा है. मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार का यह निर्णय आदिवासी समाज के युवाओं के लिए बड़े अवसर खोलने जा रहा है.

खूंटी के टकरा से ऑक्सफोर्ड तक पहुंचे जयपाल सिंह मुंडा 

प्रसंगवश बता दें कि मारंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा खूंटी के टकरा गांव के निवासी थे. वे रांची के संत पॉल्स स्कूल में पढ़ते थे जहां, उनकी प्रतिभा को स्कूल के तत्कालीन प्रिंसिपल कॉसग्रेव ने पहचाना था.  1918 में जब कॉसग्रेव रिटायर हुए तो वे अपने साथ जयपाल सिंह मुंडा को भी इंग्लैंड लेते गये. 1922 में संत कॉलेज ऑक्सफोर्ड से जयपाल ने मैट्रिक की परीक्षा पास की. 1926 में उन्होंने पीपीई की परीक्षा पूरी की.

हॉकी ब्लू के खिताब से नवाजे गये

वे कॉलेज के डिबेट सोसाइटी के सचिव और प्रेसीडेंट भी चुने गए थे. उनकी हॉकी में काफी रूचि थी और 1926 में यूनिवर्सिटी की हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व भी किया. खेल में उनकी प्रतिभा की वजह से उन्हें हॉकी ब्लू के सम्मान से नवाजा गया था. 

आईसीएस में हुआ चयन, ओलंपिक में हॉकी में दिलाया देश को गोल्ड 

जयपाल सिंह का चयन उस समय प्रतिष्ठित आईसीएस के लिए हुआ. लेकिन हॉकी से प्रेम की वजह से उन्होंने आईसीएस को छोड़ दिया. जयपाल सिंह मुंडा ने 1928 के ओलंपिक में भारत का नेतृत्व किया जिसमें भारत ने गोल्ड जीता था. अपनी मेधा, उच्च शिक्षा तथा काबिलियत की वजह से जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में आदिवासी समुदाय के उत्थान और उनकी विशिष्ट पहचान को लेकर तर्कपूर्ण ढंग से बात रखी. 

अलग झारखंड राज्य के आंदोलन की शुरूआत की

उन्होंने झारखंड अलग राज्य के आंदोलन की शुरूआत की और उसे दिशा दी. आदिवासी महासभा और बाद में झारखंड पार्टी का गठन कर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी. जयपाल सिंह मुंडा, हमेशा झारखंडी समाज के लिए एक महान नेतृत्वकर्ता और प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में याद किए जाते रहेंगे. 

उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित होंगे युवा, समाज के साथ राज्य को भी होगा फायदा

उनकी स्मृतियों को सहेजते हुए झारखंड सरकार की छात्रवृति योजना राज्य के आदिवासी युवाओं के लिए बड़े बदलाव का वाहक बनेगी. इससे युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने को प्रेरित होंगे. दूसरी ओर चयनित युवा जब शिक्षा प्राप्त कर वापस लौटेंगे तो उनकी प्रतिभा से राज्य व समाज को भी फायदा होगा. आज से पहले किसी भी सरकार ने इस तरह के कदम नहीं उठायें.

भाजपा सरकार सिर्फ भावनाओं से खेलती रही

पूर्व की भाजपा सरकार तो आदिवासियों की भावनाओं से खेलती रही. हकीकत यह है कि उस सरकार ने आदिवासी समाज के उत्थान के लिए कोई भी ठोस पहल नहीं की. बहरहाल, झारखंड में आदिवासी समाज के युवाओं के लिए इस बड़े बदलाव की योजना को शुरू करने का श्रेय हेमन्त सरकार को जाता है.

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