झारखंड के संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है जयपाल सिंह मुंडा एक योद्धा

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जयपाल सिंह मुंडा

जयपाल सिंह मुंडा जैसे योद्धा के सम्मान में हेमंत सरकार योजना लाई है जिसके तहत 10 आदिवासी छात्र विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे

झारखंड की मिटटी की खुशबू गवाह है कि जब भी झारखंडियों ने कुछ ठाना तो उसे पूरा किया या फिर अंतिम साँस तक प्रयास कर क्रान्ति के रूप में उस चेतना को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया। उदाहण भरे पड़े पड़े हैं, भगवान बिरसा का पुरुषार्थ हो या किसी अन्य झारखंडी महापुरुषों का सब झारखंड की धरती के आन के लिए अंत तक लडे। 

जब भी झारखंडियों को मौका मिला वह पीछे नहीं हेट बल्कि अपना परचम लहराया। जयपाल सिंह मुंडा जब होकी खेले तो स्वर्ण पदक जीते। देशा के पटल पर, संविधानसभा तक पहली बार आदिवासियों की त्रासदी को पहुंचाया, अलग झारखंड की मशाल को लेकर आगे बढ़े। बाद में उसी मशाल को अपनी जवानी दे दिशूम गुरु शिबू सोरेन व विनोद बिहारी महतो जैसे झारखंडी बेटों ने अंजाम तक पहुंचाया। महेंद्र सिंह धोनी, दीपिका कुमारी जैसे शख्सियतों की काबलियत किसी का मोहताज़ नहीं। 

अब झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन यही परंपरा को दोहराते दीखते हैं। उन्होंने सत्ता सम्भाते ही न केवल कोरोना जैसे संकट से बखूबी लड़ा, बल्कि झारखंड के सम्पूर्ण विकास के लिए नयी राह तैयार की। आज झारखंड के महापुरुष जयपाल सिंह मुंडा का जयंती है। चूँकि झारखंडी महापुरुषों को इतिहास में शब्द मिले हैं इसलिए झारखंडी कलम को लिखना चाहिए।

बहुत पुराना है झारखंड का संघर्ष 

अंग्रेज के लिए झारखंडियों से जबरन टैक्स वसूलना आसान नहीं था। जब भी वे टैक्स के लिए दबाव बनाते, वे छोटानागपुर की पहाड़ियों में शरण ले लेते थे। उस वक़्त जो टैक्स नहीं देता, उनके ऊपर जुल्म ढाहा जाता, जमीने ले ली जाती, प्रतिबंध लगा दिया जाता। नतीजतन उस शासन व्यवस्था के प्रति नफरत-आक्रोश फैलता गया और अंग्रेजी शासन व्यवस्था लागू होने के दो साल के भीतर ही क्षेत्र में विद्रोह हो गया। चुआड़ विद्रोह (1769-1805), चेरो ने 1810 में, 1819-20 में रुदु कोंता के नेतृत्व में मुंडाओं ने, 1831-32 में कोल विद्रोह, 1855 में सिद्धकान्हू, चाँद-भैरव के नेतृत्व में संताल विद्रोह हुआ।

आदिवासियों का मानना था अंग्रेजों को उनके जमीनों पर दखल देने का कोई अधिकार नहीं

आदिवासियों के लिए सबसे बड़ी समस्या उनकी जमीन और लगान थी। उनका मानना था कि जंगल को साफ कर उन्होंने जमीने तैयार की है और अंग्रेजों को उनके जमीनों पर दखल देने का कोई अधिकार नहीं। 1854 में छोटानागपुर कमिश्नरी का गठन हो चुका था। कमिश्नर की नियुक्ति हुई और बाद में वहाँ महाजन भी पहुँच गए। फिर शुरू हुआ शोषण का दौर। इससे संताल परेशान हो गए। पारसनाथ पहाड़ी के पास रहनेवाला मोरगो माझी नामक एक संताल राजा ने संतालों के लिए एक अलग राज्य घोषित करने का प्रयास किया, पर वह असफल रहा।

देश में सन् 1857 एक अलग इतिहास ही नहीं,  विशेष महत्व भी रखता है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद, जिसके राज्य में सूर्यास्त ही नहीं होता था, के खिलाफ प्रथम राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध व चेतना की शुरुआत हुई। इस काल खंड में समूचे देश में एक साथ कई जगहों पर किसान-मजदूरों के सहयोग से कंपनी शासन के सिपाहियों और राजे-रजवाड़ों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजाया। विडम्बना है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के साथ यह भयंकर त्रासदी रही। अंग्रेजों ने इसे सिपाही विद्रोह ठहराया, तो नेहरू ने इसे ‘गदर’ की संज्ञा दी। जबकि यह जनक्रांति थी जो किसान-असंतोष और अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे दमन से उपजी थी। जिसने न केवल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बल्कि एक होकर किसी भी संघर्ष के खिलाफ खड़े होने को प्रेरित किया।

 पहली बार झारखंड अलग राज्य की माँग 

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड कैसे पीछे रहता जबकि यहाँ का विद्रोह का इतिहास इससे भी पुरानी थी। ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पांडेय गणपत राय, टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी, नादिर अली, जयमंगल सिंह और नीलांबर-पीतांबर ने अंग्रेजों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। तो टाना भगतों ने अंग्रेजों को कभी चैन से नहीं रहने दिया। बंगाल का बँटवारा हो चुका था और बिहार अलग राज्य बन चुका था और ओडिशा को बिहार का ही हिस्सा माना गया था। ऐसा माना जाता है कि यही वह दौर था जब पहली बार झारखंड अलग राज्य की माँग उठी। इसका कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है पर ऐसा माना जाता है।

अखिल भारतीय आदिवासी महासभा का गठन

उन्नति समाज बाद का एक धड़ा किसान सभा किसान सभा के रूप में अस्तित्व में आ चूका था। और 1937 में बिहार विधानसभा के लिए चुनाव हुए। बिहार में कांग्रेसी मंत्रिमंडल का गठन हुआ, लेकिन छोटानागपुर से किसी भी नेता को शामिल नहीं किया गया। 30-31 मई 1938 को राँची में उन्नति समाज, कैथोलिक सभा और किसान सभा की एक बैठक हुई जिसमें अखिल भारतीय आदिवासी महासभा का गठन किया गया। इस महासभा का उद्देश्य छोटानागपुर और संताल परगना को मिलाकर एके राय अलग झारखंड राज्य का गठन करना था। थियोडोर सुरीन इस महासभा के अध्यक्ष और पाल दयाल सचिव चुने गए।

अबतक जयपाल सिंह मुंडा आदिवासियों के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने आ चुके थे

जब छोटानागपुर को बिहार से अलग कर राज्य बनाने की माँग हो रही थी, तत्कालीन गवर्नर सर एमजी हैलेट ने 1938 में इसे अविचारणीय कह कर इस माँग को ही खारिज कर दिया। आंदोलनकारी हतोत्साहित नहीं हुए और उन्होंने आंदोलन को आगे बढ़ाने का फैसला किया। अखिल भारतीय आदिवासी महासभा को किसी चमत्कारिक नेता की कमी खल रही थी। 1939 में यह कमी जयपाल सिंह मुंडा जैसे अध्यक्ष के रूप में पूरी हुई। 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में जयपाल सिंह ने सुभाषचंद्र बोस से मुलाकात की और अलग झारखंड राज्य की चर्चा की। इस बीच जयपाल सिंह आदिवासियों के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने आ चुके थे।

1950 में आदिवासी महासभा ही झारखंड पार्टी बना 

31 दिसंबर, 1949 और 01 जनवरी, 1950 को आदिवासी महासभा का नाम बदल कर झारखंड पार्टी कर दिया गया। जब 1952 में पहली बार बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ तो झारखंड पार्टी 32 सीट जीतकर सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में सामने आई। यह जयपाल सिंह का ही करिश्मा था। इसी से यहाँ के लोगों में विश्वास जागा था कि अब झारखंड राज्य बन जाएगा। अभी तक अलग झारखंड राज्य की माँग पर आम धारणा यह थी कि यह सिर्फ आदिवासियों की माँग है। जिस मिथ्या को पहले जयपाल सिंह फिर बाद में आदरणीय शिबू सोरेन ने गैर-आदिवासियों को एकजुट कर तोड़ दिया।

श्रीकृष्ण सिंह, केबी वनोदानंद झा ने जयपाल सिंह मुंडा को गलत संदेश भेजवाया

राज्य पुनर्गठन आयोग की टीम 2 फरवरी, 1955 को राँची आई। टीम ने खूटी, चक्रधरपुर, चाईबासा, सरायकेला, जमशेदपर, पुरुलिया धनबाद का दौरा किया। इस दौरान जयपाल सिंह को पुनर्गठन आयोग के समक्ष अलग राज्य के पक्ष में तर्क देने के लिए राँची में रहना था। लेकिन, बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, केबी वनोदानंद झा ने जयपाल सिंह को संदेश भेजवाया कि प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें दिल्ली बुलाया है। जयपाल सिंह दिल्ली चले गए, वहाँ उन्हें पता चला कि प्रधानमंत्री की ओर से ऐसा बुलावा नहीं आया था। राज्य पुनर्गठन आयोग की टीम जयपाल सिंह की अनुपस्थिति में सुशील कुमार बागे, थियोडोर बोदरा और जगन्नाथ महतो कुरमी से  बात करने से इनकार कर दिया।

फिर राज्य में आन्दोलन का दौर आगे बढ़ा, अबतक शिबू सोरेन गोला छोड़ संताल आ चुके थे। इस आन्दोलनकारी का धूम चरम पर थी। उनकी महाजनी प्रथा से लड़ाई अब अलग झारखंड के आन्दोलन का रूप ले लिया था। इन्होंने आगे बढ़कर जयपाल सिंह की मशाल को थामा और एक अजय योद्धा के रूप में हमें अलग झारखंड दिया … यह लेख जयपाल सिंह मुंडा को उनके जयंती पर समर्पित व आगे की कहानी अगले लेख में पहेंगे।  

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