झारखंडी जनमानस के हितों के मद्देनज़र मुख्यमंत्री सोरेन ने रोज़गार व मुआवजा न मिलने तक लगायी भूमि अधिग्रहण पर रोक

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झारखंडी जनमानस

राज्य गठन के बाद झारखंडी जनमानस के हितों के मद्देनज़र केंद्र से भूमि अधिग्रहण के बदले मुआवजा लेने वाली भी पहली सरकार है हेमंत सरकार

कोल ब्लॉक नीलामी प्रकरण में भी इस सरकार ने झारखंडी जनता के हितों को दी प्राथमिकता

राँची। झारखंड की हेमंत सत्ता झारखंडी जनमानस के हितों को अधिक प्राथमिकता देती दिखती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा शुक्रवार को हज़ारीबाग़ के कर्णपुरा (पकरी-बरवाडीह) कोल परियोजना के तहत एनटीपीसी द्वारा होने वाली भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को, तब तक के लिए रोक लगा दिया गया है, जब तक कि कंपनी रोज़गार और मुआवज़े को लेकर अपना रूख स्पष्ट नहीं करती है। अलग झारखंड के गठन के इतिहास में हेमंत सोरेन पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनके द्वारा राज्य व झारखंडी जनता हित को प्राथमिकता देते हुए यह निर्णय लिया गया है। 

दरअसल, एनटीपीसी के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक शुक्रवार को मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे थे। एनटीपीसी अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री के समक्ष परियोजना से सम्बंधित कई तथ्यों पर अपनी राय रखी। हालांकि, सीएम यह नहीं चाहते कि परियोजना पर कोई परेशानी आए। लेकिन, उन्होंने स्पष्ट किया कि खनन कार्य से उत्पन्न समस्याओं का ख़ामियाज़ा स्थानीय गरीब निवासियों को भुगतना पड़ता है। और यह दबे-कुचले, गरीब ग्रामीणों और आदिवासी-मूलवासी के विकास में बाधक साबित हुआ है।

अलग झारखंड के इतिहास में यह भी एक बदनुम दाग है कि ज़मीन अधिग्रहण का ख़ामियाज़ा हमेशा से गरीब झारखंडियों को भुगतना पड़ा है। क्योंकि, ज़मीन अधिग्रहण के बाद झारखंडी की गरीब जनता को न तो मुआवजा मिला और न ही रोज़गार। मुलाक़ात के दौरान श्री सोरेन द्वारा रखे गए तथ्य कंपनियों के लिए साफ़ संकेत हो सकते हैं कि उनकी सरकार में अब पुरानी रुढ़िवादी व लूट मानसिकता के प्रश्रय का खात्मा होगा। 

मसलन, मुख्यमंत्री केवल जमीन अधिग्रहण के बाद झारखंडी जनमानस को क्षतिपूर्ति  के रूप में मिलने वाले मुवाजा व रोज़गार न मिलने से ही चिंतित हैं। बल्कि खनन कार्य से उत्पन्न समस्याओं से राज्य के पर्यावरण को होने वाले नुकसान के प्रति भी गंभीर हैं।

झारखंडी भूमि के अधिग्रहण के एवज में केंद्र से मुआवजा वसूलने वाली पहली सरकार बनी हेमंत सरकार 

राज्य गठन के बाद हेमंत की सरकार पहली ऐसी सरकार है, जिसने खनन कार्य के लिए कोल इंडिया द्वारा अधिग्रहित झारखंडी भूमि के बदले मुआवजा राशि की वसूली की है। केंद्रीय कोयला मंत्री के राँची दौरे के दौरान सीएम उनसे मुआवज़े राशि के करीब 298 करोड़ रुपये लेने में सफल हुए। 298 करोड़ की इस राशि में मुआवज़े के तौर पर 250 करोड़ और अलग-अलग जिलों के लिए 48 करोड़ की राशि शामिल है। 

हालांकि, यह राशि केवल ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। क्योंकि, कोल इंडिया ने अपने खनन कार्य संचालन के लिए झारखंड की कुल 19,594 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया है। जिसका कुल मुआवजा राशि करीब 8,226 करोड़ है। अब तक न कोल इंडिया ने स्वेच्छा से भुगतान किया और न ही राज्य की पिछली भाजपा सरकार में वसूलने की कोई कवायद हुई। लेकिन, हेमंत सोरेन केंद्र पर हावी हो पहली कोल इंडिया के जबड़े से राज्य के बकाया राजस्व व मुआवजा राशि हासिल करने में सफल हुए हैं।

राज्य के साथ इतनी बेवफ़ाई करने के बावजूद केंद्र को कोल ब्लॉक के आड़ में येन-केन प्रकारेण  और झारखंडी ज़मीन चाहिए। ऐसे में झारखंडी जनमानस के अधिकारों की रक्षा के लिए हेमंत सरकार जनता और केंद्र की जनविरोधी नीतियों के बीच ढाल बन खड़ी है। जहाँ हेमंत सरकार ने जनता का पक्ष लेते हुए केंद्र पर दबाव बनाया है कि अधिग्रहित भूमि के एवज में  रैयतों को समुचित मुआवजा एवं पुनर्वास की समस्या सुलझाए बिना उसकी गाडी आगे नहीं बढ़ सकती। 

कोल ब्लॉक नीलामी : झारखंडी जनमानस के हित में हेमंत केंद्र की नीतियों के खिलाफ पहुंचे न्यायालय 

मसलन, सीएम सोरेन केंद्र की गलत नीतियों से झारखंडी जनमानस के हितों के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोकने की लड़ाई हर मोर्चे पर मज़बूती से लड़ रहे हैं। बीते दिनों कोल ब्लॉक नीलामी प्रक्रिया को रोकने के लिए वे सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े को खटखटाने से भी नहीं हिचके। 

हेमंत सरकार की कार्यशैली केंद्र की भाजपा सत्ता को स्पष्ट संकेत देती है कि राज्य में अब न ही डबल इंजन रही और नहीं उनके रिमोट रघुवर दास की। राज्य में अब राज्य में झारखंडी सरकार है। इसलिए जो कोई भी झारखंडी जनमानस के हितों के विपरीत जाकर काम करेगा उसे पहले हेमंत रूपी दीवार से टकराना पड़ेगा। 

बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि श्री सोरेन के प्रयासों का ही परिणाम है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मुद्दे में सीएम का दलील है कि खनन कार्य शुरू करने के पहले केंद्र को एक राज्यव्यापी सर्वे कराना चाहिए था। जिससे पता चलता कि कितने लोगों को इससे फायदा हुआ और कितने को नहीं। अगर नहीं हुआ, तो क्यों नहीं हुआ और हुआ तो लाभ क्यों नहीं मिला? और राज्य सरकार को केंद्र की नयी नीति पर फैसला लेने में सहूलियत होती। 

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