भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक-2017, धर्मांतरण बिल-2017 जैसे काले अध्याय के मुकाबले “लैंड म्यूटेशन बिल-2020” एक ऐतिहासिक पहल

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भाजपा द्वारा थोपे गए “भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक -2017”, “धर्मांतरण बिल -2017” जैसे काले अध्याय के मुकाबले हेमंत सरकार का “लैंड म्यूटेशन बिल -2020” एक ऐतिहासिक पहल

जनविरोधी नीतियों को सत्य ठहराने हेतु बीजेपी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक को नहीं बख्शा था

राँची। 2017 में भाजपा की डबल इंजन सरकार द्वारा आदिवासी-मूलवासी के सुरक्षा घेरे को भेदने के लिए दो ऐसे बड़े कानून थोपने का प्रयास किया गया, जिन्हें राज्य के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता रहेगा। भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल- 2017 और झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017। 

दस्तावेज़ बताते हैं, इन दोनों ही अधिनियमों का पूरे राज्य में ज़ोरदार विरोध हुआ था। जनता द्वारा दर्ज विरोध में भाजपा पर आरोप था कि वह अपने कॉपोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाने के लिए, पहले से बने मजबूत कानून में संशोधन कर, राज्य के आदिवासी-मूलवासी, किसान, विस्थापितों व गरीब जनता के सुरक्षा घेरे को भेदने का प्रयास किया था। जो झारखंडी जनता के साथ होने वाले बड़े धोखों में एक था। जो राज्य में जनता के बीच व्याप्त भाईचारगी में कटुता की सम्भावना बढ़ा देने वाला था। और समाजिक विद्वेष भी। 

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राज्य की वर्तमान हेमंत सरकार आदिवासी-मूलवासी के जमीन को भू-माफ़िया व ऑनलाइन दाखिल-खारिज में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने के मद्देनज़र जनहित कानून के रूप में “लैंड म्यूटेशन बिल-2020” की स्वीकृति दी है। जिसका प्रदेश भाजपा अपने आईटी सेल के माध्यम से भ्रम फैला कर विरोध करने का प्रयास करती दिख रही है।  

भाजपा पर पूंजीपति मित्रों के लिए सोशल इंपैक्ट के प्रावधानों के खात्मा का लगा था आरोप

2017  में लाये संशोधित भूमि अधिग्रहण अधिनियम को विपक्ष व जनता के जबरदस्त विरोध के बावजूद तत्कालीन रघुवर सरकार ने 2018 में पास कर दिया। दावे किए गए कि इससे राज्य के विकास कार्यों में तेजी आएगी। जबकि अब भी विपक्ष व जनता अपने कथन पर कायम थी कि भाजपा का मंशा अपने पूंजीपति मित्रों को लाभ पहुंचाना है। जो आगे चलकर सिद्ध भी हुआ। गोड्डा में अडानी द्वारा किए गए अत्याचार इसके स्पष्ट उदाहरण हो सकते है।

दरअसल, रघुवर सरकार द्वारा कानून के एक महत्वपूर्ण भाग में बड़ा संशोधन करने का प्रस्ताव रखा गया था। संशोधन प्रस्ताव में सरकारी परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित किए जाने वाली भूमि के लिए सोशल इंपैक्ट एसेसमेंट (एसआइए) को दरकिनार कर दिया गया था। और केवल ग्राम सभा और स्थानीय प्राधिकारी के परामर्श से ही भूमि अधिग्रहण संभव होने की बात कही गयी थी। ज्ञात हो कि 2013 में यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार द्वारा इस एक्ट में संशोधन कर सोशल इंपैक्ट के प्रावधान को जोड़ा गया था। 

जनता के साथ होने वाले षडयंत्र को समझते थे हेमंत, तभी तो कहा था, ‘जान देंगे, ज़मीन नहीं’

उस वक़्त के जेवीएम समेत तमाम विपक्षी पार्टियाँ व आदिवासी संगठनों ने बीजेपी द्वारा लाए गए कानून का विरोध किया था। इस सूची में केवल आजसू व उसके सुप्रीमों सुदेश महतो ने खुद को अलग कर सरकार के साथ खड़ा किया। यही वह दौर था जब सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व जनता द्वारा इस कानून को काला अध्याय करार दिया गया था। 

हेमंत सोरेन

ज्ञात हो कि राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उस वक़्त विपक्ष के नेता थे। उन्होंने बीजेपी के इस षडयंत्र को शुरूआती दौर में ही भांप लिया था। अखबारों की सुर्खियों व दस्तावेज़ों में दर्ज है कि उन्होंने यहां तक कहा था कि ‘जान देंगे, ज़मीन नहीं’। हेमंत ने कहा था, “जल, जंगल, ज़मीन इस राज्य की आत्मा रही है। और बीजेपी राज्य के सीधे-साधे आदिवासी-मूलवासी, किसान, विस्थापितों व गरीब जनता की ज़मीनें उद्योगपतियों को दोहन करने के लिए देना चाहती है। उसके मंसूबे को कभी सफल होने नहीं दिया जाएगा”।

सत्ता के घमंड में चूर तानाशाह रघुवर सत्ता ने संविधान के मूल भावनाओं का भी अपमान किया

तत्कालीन भाजपा की तानाशाह सत्ता ने “भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक-2017” के भाँती “धर्म स्वतंत्र विधयेक-2017” को अगस्त में, संविधान के मूल भावनाओं को पर चोट करते हुए मंजूरी दी। इस बार सरकार ने दावे किए कि इस क़ानून से राज्य के वनवासियों की जबरन हो रही धर्मांतरण पर रोक लगेगी। लेकिन, बाद के घटनाओं ने साबित किया कि यह केवल जनता के मौलिक अधिकारों के हनन करने वाले अध्याय था। 

उस वक़्त विपक्ष का कहना था कि देश की जनता को संविधान के तहत किसी भी धर्म मानने का अधिकार है। लेकिन, सत्ता के घमंड में चूर तानाशाह रघुवर को संविधान की गरिमा से कहाँ लेना-देना था। भाजपा के काले एजेंडे को सही ठहराने के लिए उन्होंने ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम को भी अपमानित किया। ज्ञात हो कि इस मुद्दे पर तत्कालीन भाजपा विधायक राधाकृष्ण किशोर ने भी कहा था कि इस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है।

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हेमंत पर जनता के बढ़ते विश्वास को पचा नहीं पा रही है भाजपा

मसलन, मौजूदा दौर में, एक तरफ भाजपा द्वारा धर्म के पुंछ पकड़ने के बावजूद भी झारखंडी जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुकी है, और दूसरी तरफ उसके विधायक दल के नेता बाबूलाल जी ने संघी होने का सबूत देकर खुद को आदिवासी नेता होने का अधिकार को दिया। जबकि इन दोनों अध्यायों के विपरीत हेमंत सरकार ने अपने कार्यों से जनता के हृदय में विश्वास के बीज बोने में काफी हद तक सफल हुई है। इसी दौरान हेमंत सरकार में झारखंडी जनता के हित की सुरक्षा के मद्देनजर “झारखंड लैंड म्यूटेशन बिल-2020” को हरी झड़ी दी है। 

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कुछ यादें

सरकार ने यह बिल गरीब आदिवासियों व झारखंडी जनता की लूटी जा रही जमीनों को देखते हुए रोक-थाम हेतु लाई है। निस्संदेह, इस सरकार ने भाजपा सरकार के विचारधारा को उसी के हथियार से परास्त करने का सटीक व अचूक दाव चली है। विधेयक के विधानसभा से पारित हो जाने से जमाबंदी की प्रक्रिया सरल हो जाएगी। ऑनलाइन जमाबंदी की प्रक्रिया को भी मान्यता मिलेगी। अवैध और दोहरी जमाबंदी रद्द हो सकेगी। जाहिर है इससे भाजपा के कॉर्पोरेट मित्रों की मुश्किलें बढ़ेगी। ऐसे में झारखंड के ज़मीनों को बपौती समझ कर लूटने-लूटाने वालों को यह कैसे पचेगा। इसलिए हो सकता है कि “झारखंड लैंड म्यूटेशन बिल-2020” को आने वाले वक़्त में जमीन दलालों का विरोध का सामना करने पड़े।  

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