इतिहास में दर्ज हुआ आदिवासी हितों के लिए बुलाया गया विधानसभा विशेष सत्र, केवल हेमंत सरकार ही ऐसा कर सकती थी

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हेमंत सरकार

सरना कोड पर राजनीति कर 2019में वोट मांगने वाली बीजेपी, आज हेमंत सरकार के आदिवासी हितों के लिए किये गए ईमानदार पहल को राजनीति षड्यंत्र बताने से नहीं चूक रही

हेमंत ने कहा, “प्रकृति पर आधारित आदिवासियों के पारंपरिक-धार्मिक अस्तित्व की रक्षा जरूरी”

रांची। झारखंड के लाखों आदिवासियों के सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान को बचाने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा बुधवार को विशेष सत्र बुला कर की जाने वाली पहल, निश्चित रूप से राज्य के  ऐतिहासिक पन्ने व आदिवासियों के स्मृति में अमिट अक्षर बन दर्ज हो गया है। क्योंकि, झारखंड विधानसभा ने 11 नवम्बर 2020, बुधवार को ‘सरना आदिवासी धर्म कोड’ लागू करने के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेज दिया है। 

ज्ञात हो कि सरकार पहले इस प्रस्ताव को आदिवासी/सरना धर्मकोड के नाम से भेजना चाह रही थी, लेकिन विशेष सत्र में गहन चर्चा के बाद सर्वसम्मति से उक्त नाम में संशोधन कर “सरना आदिवासी” धर्मकोड के नाम से प्रस्ताव भेजे जाने का निर्णय हुआ। आदिवासी हितों के लिए आज जो राज्य में पहल की गयी है उसके लिए आदिवासी समुदाय लम्बे समय से झारखंड में आंदोलन कर रही थी। जिसे आखिरकार हेमंत सरकार ने आदिवासियों के उम्मीद पर खरा उतरते हुए अंजाम तक पहुंचाया। यह भी सत्य है कि भाजपा द्वारा लम्बे समय से किये गए वादाखिलाफी के बाद राज्य के आदिवासी वर्ग को अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए केवल हेमंत सरकार पर ही भरोषा था। क्योंकि यह समुदाय जानती थी कि केवल हेमंत ही उनकी मांग पूरी कर सकते थे और उन्होंने किया। 

भाजपा के सभी नेता सरना कोड को लागू करने के अपने वादों को क्यों भूल गये?

मुख्यमंत्री ने जहां लाखों आदिवासियों के स्वरूप व सरना आदिवासी धर्म कोड से उन्हें प्राप्त होने वाले फायदे को विधानसभा सभा के पटल पर खूबसूरती से व्याख्या किया, वहीं अब तक सरना धर्म कोड के नाम केवल वोटबैंक के लिए आदिवासियों की राजनीति करने वाली बीजेपी को राजनीतिक पाठ भी पढ़ाया। ज्ञात हो कि 2014 में आदिवासियों को ठगने के बाद जब पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान लोहरदगा पहुंचे थे तो उन्होंने पुनः आदिवासी समुदाय से वादा किया था कि अगर बीजेपी फिर सत्ता में आयी तो, तो वर्ष 2021 में होने वाली जनगणना में आदिवासियों की पुरानी मांग सरना कोड को लागू किया जाएगा। लेकिन, विधानसभा चुनाव में हार मिलते भाजपा के सभी नेता अपने वादों को भूल गये।

हेमंत सोरेन झारखंड के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने विधानसभा पटल पर आदिवासी संस्कृति व उनके संघर्ष के गौरवपूर्ण इतिहास के साथ न्याय करते हुए खूबसूरती से रखा 

निस्संदेह,  हेमंत सोरेन राज्य के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने विधानसभा के विशेष सत्र के पटल पर आदिवासियों के हितों से संबंधित कई सत्य को तर्कपूर्ण तरीके से रखा है। उन्होंने राज्य के लाखों आदिवासियों की संस्कृति, उनकी आदिवासियत पहचान, धर्म व उनके संघर्ष-दर्द की ऐतिहासिक गौरव गाथा को न्याय देते हुए तर्कपूर्ण तरीके से पटल पर रखने में सफल हुए। जो निश्चित रूप से इस संघर्षरत आदिवासी समाज के दर्द को भी कम किया होगा। 

मुख्यमंत्री –  आदिवासी प्राचीन परंपराओं एवं प्रकृति के उपासक हैं। सरना धर्म की संस्कृति, पूजा पद्धति, आदर्श व मान्यताएं अपने आप में अलग व खूबसूरत है। जिसके अस्तित्व की रक्षा के लिए यह समुदाय लम्बे वक़्त से संघर्षरत हैं। प्रकृति पर आधारित आदिवासियों के पारंपरिक-धार्मिक अस्तित्व की रक्षा वर्तमान में एक चिंतनीय विषय बन चुका है, जिसकी रक्षा करना सामाजिक व प्राकृतिक तौर पर अति जरूरी है। मसलन, सरना धर्म कोड की मांग उठना इसलिए भी वाजिब हो जाता है क्योंकि प्रकृति उपासक आदिवासी सरना धर्मावलंबी को समाज में उनके सांस्कृतिक पहचान के साथ मान्यता मिलना उनके मौलिक अधिकार भी है। 

धर्म की राजनीति करने वाली बीजेपी को मिला जवाब

हेमंत सरकार द्वारा की गयी यह ऐतिहासिक व विशेष पहल शायद बीजेपी नेताओं को नहीं पचा है। नतीजतन इस ऐतिहासिक कार्य का गवाह बनने के बजाय भाजपा नेता मुख्यमंत्री पर राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं। विडम्बना यह है कि भाजपा में मौजूद आदिवासी समुदाय से आने वाले नेता भी ऐसा कहने से नहीं चूके। जिस समुदाय ने भाजपा को झारखंड में दो मुख्यमंत्री व केंद्रीय मंत्री तक दिए, उसकी उपेक्षा करना निश्चित रूप से समुदाय को चौंकता है।

हालांकि, हेमंत ने विपक्ष के लगाये आरोपों का भी माकूल व तार्किक जवाब देने में सफल रहे। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार लाठी के जोर पर सत्ता चलाने में विश्वास नहीं रखती है। इसलिए हम प्रस्ताव में संशोधन कर सरना आदिवासी धर्मकोड की मांग को लेकर केंद्र को प्रस्ताव भेज रहे है। दरअसल, हेमंत का जवाब नीलकंठ सिंह मुंडा के उस बयान को लेकर था, जिसमें उन्होंने कहा था – “मुझे शक है, यह षड्यंत्र लग रहा है। सब ठीक है, पर सरकार आदिवासी और सरना के बीच में ऑब्लिक(/) लगाकर राजनीति करना चाहती है”।

सरना आदिवासी धर्मकोड से वंचित आदिवासी समुदाय को पहुँचने वाले फायदे को हेमंत ने खूबसूरती से रखा 

विधानसभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री ने न केवल आदिवासी हितों के लिए सरना आदिवासी धर्मकोड प्रस्ताव को पास कराया। बल्कि इससे उस वंचित समुदाय तक भविष्य में वर्षों बाद पहुंचने वाले कई फायदे भी बताये। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रस्ताव के केंद्र से स्वीकृति मिलने के बाद राज्य के लाखों आदिवासियों की गिनती स्पष्ट रूप से जनगणना के द्वारा हो सकेगी। जिससे उनकी जनसंख्या का स्पष्ट आकलन होगा। संविधान द्वारा आदिवासी समाज को जितने अधिकार दिए गए हैं वह उसे सहुलियत के साथ मिल सकेगी। साथ ही आदिवासियों की भाषा, संस्कृति व इतिहास भी संरक्षित किये जा सकेंगे।

ज्ञात हो कि मुख्यमंत्री ने वर्तमान में राज्य की तमाम जनता के हित में कई नीतिगत व निर्णायक फासले लिए हैं। जिसमे से यह भी एक है।

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