केन्द्रीय बजट – गरीब अब चंदा करना शुरू करें, देश अब चुनाव से नहीं सिक्कों से बचेगा!

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केन्द्रीय बजट

क्योंकि पार्लियामेंट विक्रेता केंद्र बन चूका है। क्योंकि देश में पूंजीपति ही अब राष्ट्रभक्त हो सकता है – यदि आपके पास पूँजी है तभी आप देशभक्त हो सकते हैं – केन्द्रीय बजट साफ़ तौर से यही बताता है

…सौगंध मुझे है  इस मिट्टी की, देश नहीं बिकने दूँगा… के बीच आम बजट जब ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करे। जहाँ भारत एक देश नहीं, एक सामान हो और धूल-कण तक बिकने को तैयार हो। जहाँ भाजपा व संघ के मापदंड पर आधारित देशभक्ति (पूंजीपति) का सर्टिफ़िकेट पेश कर देश ख़रीदा जा सकता हो। जहाँ यह सत्य भी उभरे कि आप से बड़ा देशभक्त आपके खरीदे देश-कण को भी ख़रीद सकता हो, बसरते वह बड़ा पूंजीपति (देशभक्त) हो। और सरकार उसके सहूलियत के लिए नया क़ानून तक बना सकती हो। तो आप क्या कहेंगे…

आपको जो कहना है कहें लेकिन केन्द्रीय बजट यही बताता है कि देश ऐसे ही मुहाने पर आ खड़ा हुआ है। जहाँ केवल सिक्के ही निर्धारण कर सकते हैं कि देश किसका है। बजट के भाषण की शुरुआत केंद्र सरकार के गरीबों की हरसंभव मदद की झूठे दंभ से हो। जहाँ प्रवासी मजूरों का सड़क पैदल नापने के सत्य को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाए। तो किसान आंदोलन के बीच वित्त मंत्री के बजटीय भाषण का असलियत जनता के भावनाओं का बाज़ारीकरण के उभार को साफ़ दर्शा सकता है। 

केन्द्रीय बजट – पांच लाख रूपए से ऊपर जमा वाले खाता धारकों को सोचना पड़ेगा 

निस्संदेह केंद्र सरकार हिम्मती है, जहाँ वह मानती है बैंकों का डूबना निश्चित है। इसके लिए बचाव कदम के तौर पर साफ़ कहती है कि LIC समेत दो बैंकों को पूँजी को हाथों बेच देगी और बैंक डूबने की स्थिति में वह खाता धारकों को 5 लाख दे देगी। शायद पांच लाख रूपय से ऊपर जमा वाले खाता धारकों के लिए सोचने का समय आ गया है।     

बीमा क्षेत्र में सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सीमा (FDI) को 49% से बढ़ाकर 74% करेगी। क्योंकि कोरोना महामारी के कारण लोग में जीवन रक्षा को लेकर बीमा के प्रति रुझान है। ऐसे में क्यों LIC बीमा करेगा, इसके लिए भाजपा को कमीशन व चंदा देने वाले कॉर्पोरेट मित्र चाहिए। और इस एजेंडे के लिए LIC पोदीना -धनिया के रूप में पूंजीपतियों को दिया जा सकता है, लेकिन वह सरकारी कम्पनी है इसलिए व्यवसाय नहीं केवल डूब सकती है!

चुनावी सड़क का बजटीय सच 

केन्द्रीय बजट तय करता है कि अब चुनावी प्रदेशों में ही टैक्स के पैसों से गरीबों की ज़मीनों को हड़प कर सड़के बनेगी। क्योंकि, सड़कें जनता के भावना के अनुकूल विकास का व्याख्याय करती है। चूँकि आने वाले वक़्त में बंगाल, तमिलनाडु, असम जैसे राज्यों में चुनाव है तो 1.03 लाख करोड़ का 3500 किलो मीटर की लंबाई वाला हाईवे गिफ्ट मिलेगा। जिसे बाद में पूँजीपतियों को बेच दिया जाएगा।  

मोदी के प्रधान सेवक बनते ही कहा गया था कि देश में सड़को का जाल बिछाया जाएगा। प्रोजेक्ट को नाम दिया गया था भारत माला प्रोजेक्ट, जिसके तहत 13000 किलोमीटर सड़कें बनाने का दावा 5 लाख 35 हजार करोड़ के खर्च में किया गया। सड़के बनी 3800 किलोमीटर खर्च हो गए 3 लाख 30 हजार करोड़। और अभी चुनावी सड़क बनने हैं 6975 किलोमीटर जिसपर बताया गया कि खर्चा आएगा 2 लाख 66 हजार करोड़। मौजूदा दौर में कैसे संभव हो सकता है और इसके बावजूद भी 2225 किलोमीटर बनना शेष रह ही जाता है। ऐसे में सवाल है कि क्या भारत की जनता को यह सरकार बेवकूफ समझती है।    

15 वर्ष पुराने कॉमर्सियल वाहन फिट होने की स्थिति में कानून कवाड 

दुनिया भर में वाहन की उम्र का आकलन फिटनेस टेस्ट करती है, लेकिन नई वाहन स्क्रैप पॉलिसी  के अंतर्गत अब वाहन को उसकी उम्र ही पुराना बताने के लिए काफी होगा। 15 वर्ष पुराने कॉमर्सियल वाहन अब कानून कवाड होगा। क्योंकि, गरीबों का वह रोजो-रोटी का जरिया जो होता है। यदि वह नया वाहन नहीं खरीदेगा तो वह कर्जदार कैसे होगा। पूंजीपतियों का मुनाफा कैसे होगा।  

केन्द्रीय बजट में Imposition of Agriculture Infrastructure and Development Cess अर्थात कृषि सेस का सच 

Imposition of Agriculture Infrastructure and Development Cess अर्थात कृषि सेस, गजब की बाजीगरी, पेट्रोल पर ढाई रुपये प्रति लीटर और डीजल पर चार रुपये प्रति लीटर कृषि सेस तो लगेगा, लेकिन उपभोक्ता को असर नहीं पड़ेगा। मसलन, चंद दिनों के लिए बेसिक एक्‍साइज ड्यूटी और एडीशन एक्‍साइज ड्यूटी के रेट को कम कर दिया जायेगा। लेकिन, भविष्य में जब टैक्स बढ़ाया जाएगा तो कहेंगे कि कहाँ बढ़ाया है, यह तो उतना ही है जितना पिछले सालों में थी।

गैर-भाजपा शासित राज्यों के गरीब जनता को केन्द्रीय बजट में सिरे से खारिज 

केन्द्र के ‘‘प्रयासों” में गैर-भाजपा शासित राज्यों को दरकिनार करते हुए सिरे से खारिज कर दिया गया है। पिछली बजट में तो कम से कर झारखंडी आदिवासियों को म्युज़ियम में रखने लायक समझा भी गया, लेकिन इस बार वह भी नहीं। आम जनता, मध्यमवर्ग और किसानों तो दूर कि कौड़ी है। क्योंकि, गरीब जनता के हक में झारखंड के मुख्यमंत्री की 17 मांगो को ठुकरा कर बजट में, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों की लागत में महज 18 करोड़ की बढ़ाया जाना, अपने पार्टी के नेता को खुश व प्रोजेक्ट करना हो सकता है, लेकिन जनता के हित में कतई नहीं हो सकता।  

मसलन,  श्री सोरेन का कहना कि केंद्र सरकार ने लोगों की जेब पर बोझ बढ़ा दिया है। जहाँ नौकरीपेशा वालों की खैर नहीं है। जहाँ आम जनता पर महंगाई की बोझ बढ़ा दिया गया हो। जहाँ डिवेडेंट में हिस्सेदारी लेने की तैयारी केंद्र सरकार द्वारा कर ली गयी हो। मनरेगा के गरीबों को जीवन में कोई बदलाव नहीं हुआ हो। किसानों को हासिये पर धकेल दिया हो। वहां सीएम हेमंत सोरेन का कहना कि केंद्र सरकार की आत्मनिर्भर भारत अब आत्मबेचो भारत हो गया है। सत्य ही तो है।

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