एनआरसी

एनआरसी के कोड़े खाने व विदेशी बनने के लिए झारखंडी विस्थापित तैयार रहें 

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आपको याद होगा एनआरसी के तहत असम में रह रहे 40 लाख से अधिक लोगों की भारतीय नागरिकता छीन ली गयी थी। जिसका मतलब था कि  वे कानून किसी भी देश के नागरिक नहीं रह गए थे! 3.29 करोड़ आये निवेदन में केवल 2.89 करोड़ निवेदन ही माने गये थे। रद्द निवेदनों की संख्या चालीस लाख से अधिक थी। इस सूची में मुसलमानों के अलावा हिंदुओं की भी संख्या भारी मात्र में थी। जिसका सीधा अर्थ है कि वह हिन्दू आबादी, जिसमे झारखंड के भी विस्थापित शामिल हैं, जो वहां के चाय बगानों में काम कर रहे थे, सरकार के उदार नीतियों के कारण विस्थापित थे। भारतीय राज्य के मुताबिक़ ये लोग “विदेशी” हैं। जबकि ये दशकों ही नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से यहाँ रहते आये थे, जिन्हें फासीवादी राजनीति की साजि़शों ने पल भर में पराया बना दिया गया। 

झारखंड के दौरे पर आये गृह मंत्री अमित शाह से यहाँ के लोगों कि आशा थी कि वे मंदी से झूझ रहे राज्य को कोई राहत देंगे। लेकिन उनका यह कहना कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) को यहाँ भी लागू किया जायेगा, कहना डराने वाला हो सकता है। वे इस राज्य से घुसपैठियों की आड़ में किसे खदेड़ना चाहते हैं।  यह कटु सत्य है कि देश भर में झारखंड ही वह राज्य जहाँ उदार नीति के अंतर्गत संसाधन की लूट के कारण सबसे अधिक लोग विस्थापित हुए हैं इनका मतलब साफ़ है कि झारखंड के वे तमाम आदिवासी-मूलवासी-दलित जो विस्थापित हैं बहुत जल्द विदेशी घोषित किये जायेंगे। साथ ही रघुवर दास सरकार केंद्र के एजेंडे को इस राज्य में खुल कर उतारी है कह तारीफ़ करना यही दर्शाता है कि मुख्यमंत्री जी कभी झारखंडियों थे ही नहीं, वह तो केवल मोदी सरकार के एजेंट भर थे

बहरहाल, भविष्य के झारखंड में ऊँट किस करवट बैठता है, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन इतना पक्का है कि यहाँ मुसलमानों के साथ-साथ आदिवासी-मूलवासी- दलितों पर आने वाले वक़्त में उनके धर्म, भाषा, क्षेत्र, नस्ल के आधार पर दमन काफ़ी बढ़ेगा। यही नहीं इस राज्य में असम के भांति अन्य राज्यों से आये लोगों को भी दमन का सामना करना पड़ेगा।

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