न्याय व्यवस्था शंकर के त्रिशूल पर बसी कांशी सरीखे नहीं

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न्याय व्यवस्था

हमारी न्याय व्यवस्था पर भी मौजूदा सरकार में प्रश्न उठे!

लोगों में आज भी यह भ्रम हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी काशी के समान है। जबकि इस मौजूदा सरकार में यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि हमारी न्याय प्रणाली भी लोकतंत्र में व्याप्त शोषण और विषमता के अंग है। चाहे लैंड बैंक हो या फिर भूमि अधिग्रहण संशोधन के विरोध में चले आंदोलन में सुप्रीम कोर्टका रवैया, या अब देश भर के तकरीबन ग्यारह लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से बेदखल करने के के आदेश, इसी पेर्सेप्सन का पुष्टी करता  है।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति के तनिक मात्र भी जानकार इस सत्य को जानते हैं कि जंगल आदिवासियों का अनादिकाल से बसेरा रहा है। उनकी पूरी जीवन प्रणाली, अर्थ व्यवस्था खेती से लेकर जंगल के पदार्थों पर ही निर्भर है। हालांकि ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के तथ्यों को माने तो ऋषि मुनियों के इनके वन क्षेत्रों में दखल के बाद अंग्रेजों ने क़ानून बना दखल किया। 1765 में नवाब मीर कासिम की पराजय के बाद बंगाल, बिहार और ओड़िशा की दीवानी अंग्रेजों के हिस्से आ गयी, छोटानागपुर उस वक्त बिहार का हिस्सा था। अंग्रेज सरकार ने जंगल बचाने के नाम उनपर अधिकार कायम किया।

लेकिन 1902-08 के सर्वे सेटलमेंट के दौरान जंगल पर आदिवासियों के परंपरागत अधिकारों को चिन्हित करते हुए उन्हें अपना घर बनाने के लिए, उसकी मरम्मत के लिए, कृषि औजार, आदि के लिए लकड़ी काटने का अधिकार दिया। साथ ही जंगल में मवेशी चराने, घास काटने, महुआ और अन्य फलदार वृक्षों से गिरने वाले फल-फूल को चुनने या एकत्रित करने का भी। पूरा इतिहास खंगालने पर भी यह नहीं मिलता कि किसी शासन प्रणाली के न्याय व्यवस्था ने कभी भी जंगल में बसने वाले आदिवासी गांवों को उजाड़ने या जंगल से बेदखल करने कि ऐसी क्रूरता दिखायी हो जैसा कि हमारी तथाकथित संस्कारपूजक, प्रथापुजक, धार्मिक ठेकेदार, कारपोरेट पोषक भाजपा ने दिखाया है, नहीं दिखता।

अंग्रेजों के जाने के बाद उनके बनाये जंगल संबंधित कानून में बदलाव हुए, 2006 में केंद्र सरकार द्वारा पारित वन अधिकार कानून के तहत पारंपरिक रूप से जंगलों में निवास करने वाले प्रत्येक परिवार को 4 एकड़ भूमि देने का प्रावधान किया। इसके बाद झारखंड में ग्रामसभा के अनुमोदन पर 107187 आदिवासी परिवार एवं 3569 अन्य पारंपरिक वन्य निवासियों ने और देशभर में अनुमानित 1127446 आदिवासी एवं अन्य वन निवासियों ने जमीन के पट्टे के लिए सरकार के समक्ष दावा पेश किया। जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने  खारिज करते हुए उन लाखों आदिवासियों को वहां से बेदख़ल करने का आदेश सुना दिया है।

मसलन, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से देश के वन क्षेत्र कॉर्पोरेटों को सौपने का रास्ता प्रशस्त हो गया है। इस का ताज़ा उदाहरण हरियाणा में देखने को मिलता है जहाँ पर अरावली की पहाड़ियों के द्वार जिस प्रकार पर्यावरण को ताक पर रख कॉर्पोरेटों के लिए खोले दिए गए। दरअसल, बाॅक्साईट के तमाम खदान विशाखापटनम से रायगढ़ तक फैले नियमगिरि पर्वतमाला क्षेत्र में हैं। झारखंड में यूरेनियम और सोने के नये खदान वन क्षेत्र में ही हैं। और यह सभी इलाके आदिवासियों के प्राकृतिक निवास क्षेत्र हैं साथ ही वे खनन के खिलाफ आंदोलनरत भी हैं। इन रेखाओं के बीच शातिराना तौर पर ऐसी रेखा खिंची गयी जिसमे चित भी और पट भी भाजपा की ही हुई।

अब सवाल यह है कि क्या आदिवासी समाज या देश के लोग जो मानवता पर आज भी थोड़े बहुत विश्वास करते है आसानी से इस फैसले को स्वीकार कर लेंगे? नहीं बिलकुल नहीं झारखंड के झामुमो कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने विरोध का बिगुल फूंक दिया है।वह इसका सर्वत्र विरोध कर रहे है। इस बार सरकार न सिर्फ कारपोरेट के लठैत के रूप में ‘देशप्रेम’ से लबरेज सुरक्षाकर्मियों के साथ विरोध को कुचलने के लिए जोरदार रूप से खड़ी रहेगी क्योंकि उनके हाथ में हमारी न्याय व्यवस्था से मिला फैसला भी है।

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