आरक्षण से क्या लाभ होगा जब देश में नौकरियाँ ही नहीं बचेगी

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आरक्षण

मोदी जी लगातार झूठी दाव चल रहे हैं। पहले झूठा दांव लगाया कि हर साल वे दो करोड़ नौकरियाँ पैदा करेंगे फिर चुनाव के बाद वह झूठ मक्कारी में बदल गई। मोदी जी ने बताया कि पकौड़ा तलना भी रोज़गार है और बेरोजगार युवाओं को नाले की गैस से चाय बनाने का बिजनेस समझा सरकारी विभागों को निजी हाथों में बेचने की प्रक्रिया तेज़ कर दी।

रेलवे में लगभग आधे पद खाली पड़े हैं, शिक्षकों के भी लाखों खाली पद  समेत तमाम विभागों में लाखों पद खाली पड़े हैं। ये पद खाली ही पड़े रहेंगे या फिर ठेके पर दे दियें जायेंगे। उत्तर प्रदेश में मोदी जी के सिपहसालार द्वारा बकायदे जी.ओ जारी करवा दिया है कि दो विभागों को छोड़कर चतुर्थ श्रेणी के पदों पर परमानेण्ट भर्ती नहीं होगी। मतलब यह कि एक तरफ रोज़गार बड़ी तेज़ी से ख़त्म किया जा रहा है और दूसरी तरफ मोदी जी ग़रीबों को आरक्षण देने की घोषणा जोर-शोर से कर रहे हैं। मतलब झूठ पर सफ़ेद झूठ!

अब आरक्षण के मुद्दे पर यह चुनावी मदारी इतनी चौं-चौं करेंगा कि अलग अलग जातिगत आधार पर बंटे समूह के नौजवानों तक को लगने लगेगा कि ‘आरक्षण’ मिल जाय या फिर ख़त्म हो जाय तो उनका कल्याण हो जायेगा। फिर नौजवान आपस में लड़ेंगे लेकिन कल्याण किनका होगा आप बेहतर समझ सकते हैं। इस घमासान के बीतने के बाद हर जाति के करोड़ों नौजवान सड़कों पर चप्पल फटकारते घूम रहे होंगे। निराशा, अवसाद के शिकार होकर पंखे से लटकने के लिए गमछा खोज रहे होंगे।

क्या हम इतनी बात नहीं समझ सकते कि खुलेआम दांव खेला जा रहा हैं। आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में लड़ना केवल जाल में फंसे रहने के बराबर है। जब ये उन नौकरियों को भी ख़त्म करते जा रहें हैं जो 90 के दशक के पहले थीं, जब नौकरियाँ ही बहुत कम हैं तो आरक्षण के होने या न होने से क्या फर्क पड़ेगा। आखिर हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि यह केवल नौजवानों को आपस में उलझाना का तरीका भर है ताकि देश के नौजवान जाति-धर्म से ऊपर उठकर ‘सबको रोज़गार’ के नारे पर सरकार व लूट पर टिकी इस व्यवस्था के ख़िलाफ एकजुट न हो सकें।

बहरहाल, देश के नौजवानों एकजुट होकर इस सरकार के खिलाफ अपना दांव खेलना चाहिये यानि इससे कहना चाहिए कि सबको रोज़गार दो! फिर देखिये इनकी पोल स्वतः खुल जायेगी। हमें उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के ख़िलाफ़ डटकर खड़ा होन पड़ेगा ताकि जिन नीतियों कि वजह से थोड़ी बहुत नौकरियाँ ख़त्म होती जा रही हैं बच सके। हमें इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ भी एक लम्बी लड़ाई के लिए कमर कसनी पड़ेगी।

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