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गुरुजी 
गुरुजी - दुबेजी

गुरुजी गरीबों के पहरुआ हैं, आपकी तरह पंडिताई नहीं करते  

गुरुजी जैसा गरीबों का पहरुआ होना अलग बात है, पंडिताई  करना और बात 

हमारे देश में लोकतंत्र और ब्राह्मणवाद का तंत्र साथ-साथ कतई नहीं चल सकता। लोकतंत्र मनुष्यता की राह पकड़ता है तो मनुवाद मनुष्यता में विच्छेदन की। एक, समाज जोड़ता है तो दूसरा तोड़ता है। आपस में दोनों एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। इसका जीवंत उदाहरण हर कोई मनुवादी सांसद निशिकांत दुबे की बेलगाम जुबान से निकले शब्दों में बड़ी आसानी से महसूस कर सकते हैं।

एक मनुवादी अपने फायदे के लिए कितना निचे गिर सकता है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जिस बरगद के छाँव के रूप में हमें झारखंड प्राप्त हुआ और उसी झारखंड में चुनाव लड़ सांसद बन एक पतित कि भांति उसी बरगद रूपी दिशोम गुरु के खिलाफ अपशब्द बोलना निःसंदेह उनके गुरुकुल ‘संघ’ की पाठशाला में मिला ज्ञान दर्शाता है। झारखंडी संस्कार तो इस गुस्ताखी की इजाजत ही नहीं देता।

भाजपा के तो संस्कार ही यही है, अपने बुजुर्गों के पदचिन्हों पर खड़ा हो पूछना कि आपने क्या किया है? अडवानी जी के प्रति इनके रवैये से हम भली-भांति  परिचित हैं। ऐसे में गुरुजी जैसे वक्तित्व पर लांछन लगाना इनके लिए कोई बड़ी बात नहीं। इसलिए, झारखंड के आदिवासी-मूलवासी ग़रीब समाज के लोगों को ज्ञात है कि दुबे जी को किस बात कि टीस है। इस मनुवादी सांसद को यह खीज है कि इस एक आदिवासी नेता ने अम्बेडकर जी की भांति रात्रि पाठशाला चला आदिवासी और मूलवासियों को अधिकार बोध कराया था। मनुवादियों के महाजनी प्रथा रूपी मकड़जाल को भेद, शोषकों के खिलाफ काल बन खड़ा हो यहाँ की आवाम को अलग राज्य दिलाया था। क्या किसी मनुवादी को एक झारखंडी हितों का रक्षक कभी फूटे आँख सोहा सकता है भला? नहीं बिलकुल नहीं …!

दरअसल, निशिकांत जी वही मनुवादी विचारधारा के पोषक हैं जिसने समाज में शोषक प्रारूप को जीवंत रखने हेतु अपने गंदे पैर धुले पानी को अपने कार्यकर्ता को पिलाया और ताल ठोकते रहे कि वो खुद भगवान हैं, उनका चरणामृत पीना गरीब अवाम के लिए सौभाग्य की बात है।

बहरहाल, निशिकांत जी, सांसद पद येन-केन-प्रकारेण जीत लेना नेता होना नहीं है। जनसेवा बिज़नेस नही है, अपना धंधा बदल लें। आज आप सांसद हैं, कल नही रहेंगे, गोड्डा छूट जाएगा और दूकान बन्द! लेकिन गुरुजी जैसी शख्शियत खाट पर बैठी भी रहे तो झारखण्ड की राजनीति उनके स्वाँस के आलोम-विलोम से करवट बदलती रहेगी क्योंकि नेमरा के इस गरीब सोबरन-पुत्र शिबू सोरेन ने खुद की हड्डियाँ गला कर झारखंड को आकार दिया है, इसे अपने खून से सींचा है। इसे समझना आप जैसे संकीर्ण सोच वाले झारखंड विरोधी सांसद के बस की बात नहीं। बस यही निवेदन है कि आस-पास की कालिख पोछें (स्वक्षता अभियान को भी बल मिलेगा) और अपनी कथनी के प्रश्चित्त स्वरुप अपना मुँह काला कर लें।

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