विस्थापन झारखंडी आदिवासी-मूलवासी का पर्याय !

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झारखंडी आदिवासी-मूलवासी का विस्थापन

दशक, 1990 के आरम्भ से झारखण्ड राज्य (2001 के पूर्व बिहार) के नीतिगत ढाँचे में आये नवउदारवादी बदलाव के बाद से राज्य में प्रायोजित हिंसा बढ़ने से देश की अधिकांश आदिवासी-मूलवासी आबादी भीषण ग़रीबी के प्रभाव में रसातलिय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। आदिवासियों-मूलवासियों की जल, जंगल, जमीन, नदियों, चरागाह, गाँव के तालाब और साझा सम्पत्ति वाले संसाधनों पर जो अधिकार थे, वे विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) और खनन, औद्योगिक विकास, सूचना प्रौद्योगिकी पार्कों आदि से सम्बन्धित व अन्य ”विकास” परियोजनाओं की आड़ में लगातार निशाने पर है। साथ ही यह इलाके बड़े पैमाने पर अधिग्रहण के लिए अनेक कॉरपोरेशनों के निशाने पर भी हैं। इन्हीं वजहों से आज विस्थापन झारखंडी आदिवासियों–मूलवासियों का पर्यावाची शब्द और जीवन पद्धति बन गया है।

आज स्थिति यह है कि ज्यों ही हम इन इलाकों में विकास की बात या परिकल्पना करते हैं तो इस मॉडल में सर्वप्रथम आदिवासियों का विस्थापन होना तय हो जाता है। शायद यह आदिवासियों की खुशनसीबी के बजाय बदनसीबी ही है कि इनके जमीन की नीचे अनंत प्रकार के खनिज सम्पदा मौजूद है। यही वे वजहें हैं जिसमें विकास का माडल चाहे पूंजीवादी व्यवस्था हो, समाजवादी व्यवस्था हो या कोई अन्य व्यवस्था, आदिवासियों-मूलवासियों का विस्थापन होना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन इस विकास के मद्धेनजर होने वाले विस्थापन के बदले आदिवासियों-मूलवासियों को हिस्सेदारी की जगह मिलती है केवल विस्थापन और रसातलिय जीवन।

केंद्र की भाजपा सरकार काफी चालाकी से झारखण्ड की मौजूदा रघुवर सरकार के हाथों यहां के आदिवासियों एवं मूलवासियों को इनके जल, जंगल और जमीन से विस्थापन करने की राजनीतिक और नीतिगत साजिश रच चुकी है। “एलीफैंट कोरिडोर” बनाने की आड़ में हजारों आदिवासियों और मूलनिवासियों को विस्थापित करना शुरू भी कर दिया गया है। भूमि बैंक के तहत यह सरकार आदिवासी-मूलवासी को उनके ही गाँव के सामुदायिक जमीनों और जंगलों से विस्थापित कर पूंजीपतियों को सस्ते भाव में जमीन दे रही हैं। यही वजह है कि जंगलों में बसने वाले बासिंदे सरकार के खिलाफ आन्दोलन छेड़ने को मजबूर हो गये हैं। झारखण्डवासी, सरकार की इस साजिश को ढपोरशंखी लोक-लुभावन नारों-वादों के बीच नहीं समझ पा रहे हैं। लेकिन इसके परिणाम तो काफी घातक होंगे।

आदिवासियों-मूलवासियों के जमीनों पर शहर बना और कई निरंतर बन भी रहे हैं परन्तु विडंबना यह है कि उन शहरों में आदिवासी-मूलवासी न तो शासक बन पाया और न ही हिस्सेदार। वे भागीदार सुनिश्चित तो हुई, कदाचित शाषक के तौर पर नहीं बल्कि शोषित और प्रताड़ित दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में।

अलबत्ता, बढ़ती असमानता और सामाजिक वंचना तथा ढाँचागत हिंसा की समस्याएँ, जल-जंगल-जमीन से विस्थापित किये जाने के खिलाफ ग़रीबों के अहिंसक प्रतिरोध का राज्य द्वारा दमन किया जाना ही समाज में गुस्से और उथल-पुथल को जन्म देता है। और यही समस्या राजनीतिक हिंसा का रूप अख्तियार कर लेता है। समस्या के स्रोत पर धयान देने की जगह राजसत्ता ने इस समस्या से निपटने के लिए सैन्य हमला शुरू कर दिया है। हमारा मानना है कि गरीबों के बजाय ग़रीबी को खत्म किया जाना चाहिये, लेकिन रघुबर सरकार की कार्यशैली ठीक इसके विपरीत – गरीबी के बजाय गरीबों को शोषित करना जान पड़ती है। प्रदेश के आमजन और विपक्ष को चाहिए की एक जुट हो संघर्ष कर राज्य की विस्थापन समस्या से निजात दिलाये।

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