बेरोज़गारी से त्रस्त झारखंडी युवा आत्महत्या को मजबूर

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बेरोज़गारी के आलम

बेरोज़गारी के आलम में छात्र कर रहे हैं आत्महत्या 

यदि सरकारी आँकड़ों की ही माने तो 2014 से 2016 के बीच देश के 26 हज़ार 500 युवाओं ने आत्महत्या कर ली। वैश्विक दौर के इस परिवेश में देश में 20 की उम्र से लेकर 30-35 वर्ष के नौजवान डिप्रेशन की बीमारी से ग्रसित होते जा रहे हैं, मौजूदा व्यवस्थायें इन युवाओं को जीने नहीं दे रही है। बड़े होकर कुछ करने का – समाज, माता-पिता, नाते-रिश्तेदार को कुछ कर दिखाने का दबाव इनपर बनता जा रहा है। युवाओं को इस उम्र में देश-दुनिया की परिस्थितियों, ज्ञान-विज्ञान और प्रकृति से परिचित होना चाहिए, बहसों में भाग लेना चाहिए, लेकिन यह नौजवान देश के तमाम शहरों में अपनी पूरी युवावस्था एक रोज़गार पाने की आस में काट रहे हैं। इसके बावजूद भी इन्हें रोज़गार नहीं मिल पा रहा हैं। ऐसी परिस्थिति में नये-नये प्रयोजनों, नयी-नयी गतिविधियों अपनाने को छोड़, यह छात्र-नौजवान असुरक्षा एवं सामाजिक दबाव झेलने में असमर्थ होने को विवश हो जाते हैं।

प्रयासों के बावजूद भी मौजूदा सरकार बेरोज़गारी के सम्बंध में अपनी विफलताएं छुपा नहीं पा रही है। ब्रिक्स देशों के सम्मलेन में प्रधानमन्त्री मोदी ने अपने भाषण में कहा था,”फ़ोर्थ इण्डस्ट्रियल रिवोल्यूशन में पूँजी से ज़्यादा महत्व प्रतिभा का होगा। हाई स्किल परन्तु अस्थायी वर्क रोज़गार का नया चेहरा होगा। मैन्यूफै़क्चरिंग, इण्डस्ट्रियल प्रोडक्शन डिजाइन में मौलिक बदलाव आयेंगे। डिजिटल प्लेटफ़ार्म, ऑटोमेशन और डेटा फ्लोस (प्रवाह) से भौगोलिक दूरियों का महत्व कम हो जायेगा। ई-कॉमर्स, डिजिटल प्लेटफ़ार्म, मार्केट प्लेसेस जब ऐसी टेक्नोलॉजी से जुड़ेंगे, तब एक नये प्रकार के इण्डस्ट्रियल और बिज़नेस लीडर सामने आयेंगे।”

इस भाषण से यह बात तो समझ में आ जाती है कि रोज़गार के सन्दर्भ में मोदी और भाजपा शाषित राज्यों की सोच क्या है? यहाँ युवा स्थायी रोज़गार की तैयारी में अपनी नौजवानी के दस-पन्द्रह साल हवन कर रहे हैं और सरकार इन्हें पकौडे तलने, पंचर बनाने, और पान की गुमटी लगाने की सलाह लगातार दे रही है।

भारत देश के तमाम राज्यों में बेरोज़गारी का आलम यह है कि तकरीबन 28 से 30 करोड़ युवा नौकरी की आस में सड़को की धूल फाँक रहे हैं और यह संख्या रोज ब रोज बढती भी जा रही है। प्लेसमेण्ट का सीजन इंजीनियरिंग कॉलेजों में शुरू हो चूका है लेकिन छात्रों के मुखड़े से हँसी ग़ायब है। दिन-भर लैपटॉप पर इण्टरव्यू रिज़ल्ट का इन्तज़ार, इन छात्रों की आँखें इंजीनियरिंग कॉलेजों के प्लेसमेण्ट की हालत खुद ब खुद बयाँ कर देती है। इसी कशमोकश के बीच झारखण्ड, रांची में एक छात्र ने खुदकुशी ( आत्महत्या ) कर ली।

गुरुवार, 13 सितम्बर रांची रेलवे स्टेशन के समीप एक नौजवान, दीपांकर किशोर (28 वर्ष) ने डिप्रेशन ना झेल पाने की स्थिति में खुदकुशी ( आत्महत्या ) कर ली। बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में एमटेक करने के बावजूद नौकरी न मिल पाने से परेशान था। ज्ञात हो कि हाल ही में बीआईटी मेसरा के मैकेनिकल इंजीनियरिंग के थर्ड ईयर के छात्र ने भी हॉस्टल में फांसी लगा आत्महत्या कर ली थी। दोस्तों ने पुलिस को बताया है कि दीपांकर डिप्रेशन की दवा भी खा रहा था। दीपांकर जैसे नजाने कितने युवा कतार में है। झारखण्ड प्रदेश का बेरोज़गारी दर के आंकड़े अत्यंत भयावह है क्योंकि जहाँ  देश का बेरोज़गारी दर 6.3 प्रतिशत है तो वहीं झारखण्ड राज्य का बेरोज़गारी दर 10 प्रतिशत है, लगभग दोगुनी दोगुनी।

बेरोज़गारी से लड़ने के नाम पर झारखण्ड की रघुबर सरकार ने मोमेंटम झरखंड जैसी योजनाओं एवं इनके विज्ञापन पर जमकर पैसा लुटाया, लेकिन यहाँ के युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में असफल रही। साथ ही बेरोज़गारी की असल वजह को जनता के सामने जाने भी नहीं दिया। बेरोज़गारी केवल मानवीय समस्या नहीं है, जिसका सामना बेरोज़गारों को करना पड़ता है। यह इस सरकार की मौजूदा व्यवस्था के उत्पादन बढ़ाने की अक्षमता को व्यक्त करता है।

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