मोदी सत्ता का सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट- क्या महामारी के दौर में देश को इसकी जरुरत है!

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सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को महामारी के दौर में ले कर आना झारखंड में बनी विधानसभा की नयी इमारत से जोड़ कर देखा जा सकता है। जो भाजपा सरकार और कॉर्पोरेट के बीच होने वाली लूट की पटकथा को साबित करती है!

महामारी के दौर में जब लोगों की बुनियादी ज़रूरतें तक पूरी नहीं हो पा रही, स्वास्थ्य सेवाएँ लचर और बेरोजगारी चरम पर हो, गरीब दो वक़्त की रोटी के लिए मुहताज हो, वहां देश के प्रधानसेवक द्वारा 20 हजार करोड़ रूपये का सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को लूट, बर्बादी व शर्मनाक प्रोजेक्ट से इतर क्या कहा जा सकता है। जन मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के क्रम में इस दफा केन्द्रीय सत्ता का यह नया पैंतरा ही हो सकता है। जहाँ 2022 के 75वें स्वतंत्रता दिवस को नये संसद भवन का उद्घाटन का शिगूफ़ा देश के दिमाग में भरी जाने वाली नयी खुराक भर हो सकता है। 

वर्तमान दौर केन्द्रीय सत्ता सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लाबाद ओढ़ कई नीतियाँ लागू करने की दिशा में बढ़ चुकी है। इस मामले में भी ऐसा ही देखा गया, जहाँ ना-नुकुर करते हुए देश के संसाधनों की भयंकर लूट और बर्बादी के इस शर्मनाक प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट ने हरी झण्डी दिखा दी है। जिससे मोदी सत्ता द्वारा लोगों के बीच ढिंढोरा पीटा जा सके कि बड़ी अदालत ने भी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सही ठहराया है।

इसे ही लोकतंत्र पर जोंकतन्त्र का हावी होना कहा जा सकता है 

जिस देश में 20 करोड़ लोग फ़ुटपाथ पर सोते हों और लगभग इतने ही झुग्गियों में रहते हों, वहाँ 971 करोड़ की नयी संसद बनाना क्या साबित करता है? शायद इसे ही लोकतंत्र पर जोंकतन्त्र का हावी होना कहा जा सकता है। जहाँ जनता के ख़ून-पसीने की गाढ़ी कमाई से 20 हजार करोड़ रुपये, जनता की छाती पर मूँग दल, सत्ता द्वारा उड़ा दिये जायेंगे। हालांकि, सवाल न उठे, इसके लिए गोदी मीडिया को माहौल बनाने के लिए लगा दिया गया है। वह नयी संसद की जरुरत जनता को अभी से ही समझाने लगे लगे हैं। रंग-रूप-आकृति की व्याख्या अभी से ही की जाने लगी है।

दरअसल, लोकतंत्र में भाजपा सत्ता का यह नया प्रचलन अपने कॉर्पोरेट आकाओं को कॉन्ट्रैक्ट देकर खुश करने की नयी जुगत भर है। इनका यह प्रयोग पहले वैसे राज्य में होता है जहाँ इनकी सत्ता होती है। उदाहरण के तौर पर झारखंड में बनी विधानसभा की नयी इमारत को लिया जा सकता है। जो भाजपा सरकार और कॉर्पोरेट के बीच होने वाली लूट की पटकथा को साबित करती है। जहाँ घोटाले की बू लिए यह इमारत जांच के पंक्ति आ खड़ा हुआ है। 

जबकि भारत का संसद भवन केवल 94 साल ही पुराना है और काफ़ी मज़बूत स्थिति में है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के संसद भवन इससे कहीं ज़्यादा पुराने हैं। इंग्लैण्ड का संसद भवन लगभग ड़ेढ़ सौ साल पुराना है और अमेरिका के संसद भवन को बने हुए दो सौ साल हो चुके हैं।

करोड़ों बेघरों के लोकतंत्र का राष्ट्रपति 340 कमरों के भव्य महल – राष्ट्रपति भवन में रहता है

ख़र्चीले जनतंत्र के बोझ से पहले ही देश की ग़रीब जनता कराह रही है। जहाँ करोड़ों बेघरों के देश का राष्ट्रपति 340 कमरों के भव्य महल – राष्ट्रपति भवन में रहता है, जो व्हाइट हाउस और बकिंघम पैलेस से भी से बड़ा है। 2007 में 100 करोड़ रुपये सालाना इसके रख-रखाव की लागत आँकी गयी थी, जो आज दोगुना हो चुकी होगी। राष्ट्रपति के स्टाफ़, घरेलू ख़र्चों और भत्तों पर करीब 75 करोड़ रुपये सालाना ख़र्च होते हैं। महामारी के दौर में ही मोदी सरकार ने 8000 करोड़ रुपये राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए दो नये आलीशान हवाई जहाज़ ख़रीदने पर उड़ा दिये है।

दैत्याकार नेताशाही और नौकरशाही के तंत्र का 90 फ़ीसदी से भी अधिक बोझ वह ग़रीब जनता उठाती है, जिसे बुनियादी ज़रूरतें तक नसीब नहीं होतीं। टैक्सों से होने वाली कुल सरकारी आय का 90 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा आम लोग परोक्ष करों के रूप में देते हैं। जबकि 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा पूँजीपतियों और सम्पत्तिशाली वर्गों का होता है। ऐसे में इस ख़र्चीले प्रोजेक्ट का बोझ भी उसी जनता को उठाना है, जिसके पास न तो रोज़गार की गारण्टी है, न घर की गारण्टी है और न ही स्वास्थ्य या शिक्षा की कोई गारण्टी है। जिसका प्रयोग केवल जनता को लूटने-खसोटने के लिए नये-नये क़ानून बनाने के लिए यह सत्ता करती आयी है।

यह प्रोजेक्ट एक तीर से कई निशाने साधने वाला साबित होगा 

मसलन, केंद्र सरकार यह प्रोजेक्ट एक तीर से कई निशाने साधने वाला है, यह प्रोजेक्ट वास्तव में सेण्ट्रल भ्रष्टाचार प्रोजेक्ट है। सरकार के चहेते बिल्डरों और कम्पनियों को हज़ारों करोड़ के ठेके मिलेंगे और सत्ता की भी पाँचों उँगलियाँ घी में होंगी। इस प्रोजेक्ट का निर्माण पूरा होने के बाद संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के आसपास की खाली जगह भी ख़त्म हो जायेगी और जनता के लिए संसद भवन के पास जाकर विरोध-प्रदर्शन करना लगभग नामुमकिन हो जायेगा।

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