मेरी जेलयात्रा – वर्ष -2010, सुदिव्य कुमार सोनू (गिरिडीह, झामुमो विधायक)

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मेरी जेल यात्रा

“मेरी जेलयात्रा” – यह आत्मकथा (Autobiography) सुदिव्य कुमार सोनू द्वारा राजनीतिक जेल यात्रा के उपरान्त, वर्ष 2010 में लिखा गया. इस कालखंड में लेखक झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के जिलाध्यक्ष थे. साथ ही गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र 32 के प्रत्याशी भी चुने जा चुके थे. संस्मरण में सुदिव्य कुमार सोनू द्वारा अपने राजनीतिक-सामाजिक व जेल के अनुभवों का सजीव चित्रण किया गया है. आत्मकथा के केन्द्र में स्वयं लेखक है. लेखक का दृष्टिकोण वर्तमान परिस्थितियों में इतना प्रासंगिक है कि मानो अभी के काल-खंड में लिखा गया हो. आशा है कि प्रस्तुत आत्मकथा “मेरी जेलयात्रा” से आप जुड़ेंगे और संवाद कायम करेंगे…

झारखंड खबर

मेरी जेलयात्रा…

10 दिसम्बर दिन के 2ः30 बजे जैसे ही न्यायालय में यह वाक्य उच्चारित हुआ की “आपकी जमानत अर्जी खारिज हो गयी है और आप 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजे जाएंगे.’’ यह सुनते ही मैं पूर्णतः स्थिर चित्त हो गया और चुनाव से सम्बन्धित सारे व्यस्त भाव तिरोहित हो गये. विधानसभा के एक प्रत्याशी के तौर पर जैसी उद्विग्नता मेरी चेतना पर हावी थी अचानक ही वह विलीन हो गयी और मैनें निःश्वास छोड़ते हुए स्वयं से कहा की चलो एक और जेल यात्रा का शुभारंभ हो गया. तत्काल ही मुझको कोर्ट हाजत की ओर ले जाया गया, वहां कोर्ट परिसर में उपस्थित लोगों के चेहरों पर विस्मय और कौतुहल का भाव था और लोगों का अभिवादन स्वीकारते मैं कोर्ट हाजत पहुंच गया. 

कोर्ट हाजत के एकाकी क्षणों में मेरे मस्तिष्क ने सारी घटनाओं पर चिंतन शुरू किया. समाहरणालय परिसर में जिले की गिरती हुई कानून व्यवस्था की स्थिति और निर्दोष लोगों को पकड़कर थाने में अमानवीय यातना देने के विरोध में किये गये पूर्णतया शान्तिपूर्ण आन्दोलन और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर राष्ट्रपति शासन की निरंकुश शासन सत्ता ने जो दमन चक्र चलाया वह विस्मयकारी था. मैं स्तब्ध था कि जिला स्तर के सर्वदलीय राजनैतिक नेतृत्व और चेम्बर के पदाधिकारी जिनमें समाज के गणमान्य लोग भी थे उनके विरूद्ध अगर शासन बदले की भावना से ऐसी कठोर कार्रवाई कर सकता है तो पीरटांड़ के सूदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बसने वाले लोगों के विरूद्ध प्रताड़ना एवं दमन के स्तर क्या होगें ? जिला स्तर के राजनैतिक तौर पर साधन एवं शक्ति सम्पन्न लोगों के विरूद्ध अगर पूर्वाग्रह ग्रस्त ऐसी कार्रवाई संभव है तो उन सदूरवर्ती इलाके के असहाय और निर्बल लोग जिनके पास प्रतिकार की क्षीण सी शक्ति भी न हो वह शासन सत्ता के बर्बर दमनचक्र में तो पूर्णतः निरूपाय होगें ?

अचानक विचार का तारतम्य टूटा और कैदी वाहन से हमें जेल भेज दिया गया. जेल पहुंच कर औपचारिकताएं पूरी हुई तो मुझसे पूछा गया कि क्या शारीरिक अस्वस्थता के मद्देनजर जेल के अस्पताल या सामान्य वार्ड में रहना है? वहीं यह भी पता चला भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशी चन्द्रमोहन दा भी जेल के अस्पताल में हैं. मैं सोच विचार में पड़ गया कि सामान्य दिनचर्या में पूर्णतः स्वस्थ एवं उर्जावान दिखने वाले नेतागण जेल जाने की स्थिति आते ही सीने में दर्द की शिकायत कर अस्पताल का रूख करते हैं, और सामान्य जन चटखारे लेते हुए इस विषय में उपहास करते है. मैनें तत्क्षण ही यह निर्णय ले लिया कि सामान्य बंदी की तरह वार्ड में ही रहना है और कंबल (शीट) पर ही सोना है. 

वार्ड में पहुंचकर वार्ड अन्य बंदियों को मैनें अपना परिचय देते हुए अभिवादन किया. तत्काल ही अपरिचय की बर्फ पिघल गयी और तमाम बंदियों के साथ मित्रवत् माहौल में मैं भी उनका हिस्सा बन गया. छोटे – छोटे समूहों में बैठकर बातचीत के क्रम मुझे पता चला कि मेरा जेल पहुंचना उनके लिए अपेक्षित था परंतु यह उनके लिए भी अप्रत्याशित था की मैं उनके बीच में ही रहूंगा. इस बीच शाम के 7ः30 बज चुके थे और बंदियों ने मुझसे भोजन का आग्रह किया, मैनें हामी भर दी और जेल के रसोई घर का बना भोजन परोस दिया गया. भोजन की मात्रा यथोचित प्रतीत होती थी परंतु गुणवत्ता के बिन्दु पर शायद गुणवत्ता भी अपने शाब्दिक मायने भूल जाय. उन बन्दियों के आग्रह और अनुग्रह ने गुणवत्ता की इस कमी को पाट दिया और उनके गर्मजोशी के आग्रह में मैनें भी जैसे – तैसे दो रोटियां हलक से नीचे उतार कर भोजन करने के कर्तव्य की इतिश्री कर ली. पिछले कई दिनों के हाड़तोड़ परिश्रम और नियति से साक्षात्कार ने निश्चिंतता के भाव में मेरी आंखों में नींद भर दी और मैं बेसुध सो गया. 

सुबह किसी ने मेरा कंधा पकड़ कर हिलाया तो मैं अनमना सा उठा. देखा घड़ी 05ः30 बजा रही है, उठाने वाले की तरफ देखा तो सुबह की प्रार्थना में शामिल होने का हवाला दिया गया. ईश्वर का नाम सामान्य दिनों में भी प्रेरणादायक है ही, परंतु बन्दी अवस्था में तो शायद सर्वाधिक प्रेरणास्रोत प्रतीत होता है. पूरी तन्मयता के साथ मैं भी भजन में सम्मिलित हो गया. कुछ समयोपरांत भजन की समाप्ति हो गयी. साथी बन्दी ने कहा कि अब आप पुनः सो सकते हैं, परंतु मेरी नींद पूरी हो गयी थी. मैं 06ः00 बजे का इन्तजार करने लगा की कब वार्ड का गेट खुले और मैं बाहर निकलूं. 

अन्ततः अपने नियत समय पर वार्ड का द्वार खुला और मैं दिनचर्या से निवृत होकर जेल के अस्पताल में जेल के नियमों के अनुसार अपने स्वास्थ्य से संबंधित विवरण देने पहुंचा. जेल के अस्पताल के मुख्य द्वार पर ही चन्द्रमोहन दा से मुलाकात हो गयी. मैनें सामान्य शिष्टाचारवश उनसे वार्तालाप आरंभ किया और उनका हाल समाचार पूछा. इसी क्रम मैं जब उनसे पूछा की रात में आप आराम से सोये या नहीं तो उनका जवाब था ’’मच्छरों के बीच यहां आदमी सो सकता है क्या’’? इस बीच जेलकर्मियों ने यह सूचना दी कि स्वास्थ्य कारणों से चन्द्रमोहन दा का स्थानांतरण जेल के अस्पताल से सदर अस्पताल गिरिडीह हो गया है. मुझे तत्काल ही यह आभास हुआ की आंदोलन के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष स्वरूप को स्पष्ट रेखांकित कर दिया गया है. सार्वजनिक मंचों से शासन के विरूद्ध जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति बनने वाला नेतृत्व यदि पिछले दरवाजे से शासन के सामने नतमस्तक होकर  व्यक्तिगत सुविधाएं हासिल करता है तो यह तय है कि नेतृत्वकारी साथी अपने कृत्यों से ही चरित्र का स्पष्ट वर्गीकरण कर रहे हैं. ऐसे व्यवहार से जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं जाता है. फिर मुझे यह लगा की जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व वह करते हैं उसे छद्म आंदोलन या येन-केन-प्रकरेण सुविधा हासिल (शायद शुल्क चुका कर भी) करने में कुछ भी अनैतिक नहीं दिखता है. इन विचारों को झटक कर मैनें उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की शुभकामनाएं दी और वे सदर अस्पताल चले गये. 

कुछ समय बाद ही मुलाकातियों का आना प्रारंभ हो गया और मैं उनके साथ ही व्यस्त हो गया. इसी क्रम में मेरे घर से मेरे लिए भोजन आ गया, रात्रि के भोजन की स्मृति शेष थी. मैनें स्पष्ट रूप से अपने सहयोगियों को यह निर्देश दिया कि मेरे लिये घर से खाना लाने की कोई आवश्यकता नहीं हैं. जेल में 900 बंदियों के बीच मैं विशिष्ट सुविधाएं हासिल करके उनके और अपने बीच विभाजन की रेखा नहीं खींचना चाहता था. साथ ही जेल में बंदियों को दिये जा रहे भोजन की गुणवत्ता को व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का यह एक उपयुक्त अवसर था. इस कदम से मैं जेल प्रशासन को यह संदेश भी देना चहता था की बंदियों को दिये जा रहे भोजन की गुणवत्ता और मात्रा मेरी जानकारी में भी है. मैने सोचा शायद इस प्रयास से भोजन की गुणवत्ता में कुछ तो गुणात्मक परिवर्तन आ जाय. 

इसके बाद वार्ड में जाते ही मैनें जेल की तमाम परिस्थितियों का विश्लेषण करना शुरू किया. बहुतेरे बंदी मिलने को आये अपनी समस्याओं से अवगत कराया साथ ही मदद की अपेक्षा भी रखी. मैने यथोचित सहायता का आश्वासन भी दिया. मेरे दल के साथी भी जो अन्य मामलों में जेल में थे वह भी मिले. बंदियों से बातचीत के क्रम में कुछ आश्चर्यजनक तथ्य भी सामने आये. एक बंदी के मामले में पिछले 14 महीनों से साक्षी के नहीं आने के कारण मुकदमा यथास्थिति में था. बहुतेरे जमानत के मामले काण्ड दैनिकी समय पर न्यायालय नहीं पहुँचने के कारण लम्बित थे. असमर्थ गरीबों की मदद के लिए गठित विधिक सेवा प्रधिकार भी प्रभावी ढंग से कार्यरत प्रतीत नहीं होता था. जिस सक्रियता और तत्परता से हमारी पुलिस मुकदमा दर्ज कर आरोपियों को जेल भेजती है, मुकदमों के निष्पादन के बिन्दु पर सारी तत्परता और सजगता न जाने कहां तिरोहित हो जाती है. यहां बंद लोगों में 70 प्रतिशत लोग भ्रष्ट पुलिसिंग, विलम्बित न्यायिक प्रकिया और गांव की राजनीति के शिकार थे. जेल में बंदियों की दशा भी कई मामलों में अजीब थी. जेल में उपयोग होने वाले कुल मानवश्रम में यदि सुरक्षा को छोड़ दे तो 95 प्रतिशत कार्य विचाराधीन बंदियों से कराये जाते है, इन कार्यों को श्रेणी के अनुरूप बांटा गया है. दबंग बंदी अपेक्षाकृत बेहतर कामों में जुड़ते है और सामान्य और निम्न श्रेणी के बंदी ज्यादा मेहनत और गन्दे कामों के लिए बाध्य किये जाते है. शुरूआती ना – नुकूर और हल्के विरोध के बाद सामान्य या कमजोर बंदी इन कामों को करने के लिए अभ्यस्त हो जाते है. इन तमाम बंदियों को जेल का तंत्र किसी न किसी तरह से उपकृत करता है. उपकृत करने के तरीके भी अलग – अलग है, किसी बंदी को कामों के एवज में अच्छा या ज्यादा भोजन दिया जाता है तो कुछ को अवैध वसूली में से हिस्सा प्राप्त होता है. व्यवहार रूप में विचाराधीन बंदी के रूप में जेलों में उपलब्ध मानवश्रम की बहुलता का उपयोग रचनात्मक हो तो यह स्वागत योग्य है, परंतु उन्हें उपकृत करने की कोई पारदर्शी या सरकारी व्यवस्था न हो तो इससे जेलों के अंदर भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है. सश्रम करावास की सजा पाये लोगों के लिए मानदेय तय है, पर विचाराधीन बंदियों के मामले सर्वथा भिन्न है. वार्ड में एक बेड (जिसे शीट कहते है) के लिए अमूमन एक हजार रूपये नये व्यक्ति जिसे आमद कहते है से वसूल किया जाता है. इस राशि का बंटवारा होता है. व्यवस्था तो यह होनी चाहिए कि यदि जेल विभाग जेल के अंदर ऐसे कामों के लिए नये नियोजन न कर पा रहा हो तो विचाराधीन बंदियों को निर्धारित मानदेय सरकारी कोष से दिया जाना चाहिए. इस कदम से जेल के अंदर अवैध वसूली के जो आरोप लगते है उन्हें रोकने का सार्थक प्रयास किया जा सकता है. 

जेल में बंदियो के देय भोजन के मामले तो काफी गंभीर है. निर्धारित मात्रा और गुणवत्ता का भोजन बंदियों को मिले यह दिवास्वप्न से कम नहीं हैं. आपूर्तिकर्ता से लेकर गुणवत्ता नियंत्रण एवं वितरण के पूरे तंत्र को आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्कता है. कतिपय आपूर्तिकर्ताओं और भ्रष्ट अफसरों के गंठजोड़ ने उन निरीह बंदियों के मुंह से निवाला छीनने का काम किया है, इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए. विचाराधीन मामलों की बढ़ती संख्या ने जेलों की स्थापित क्षमता के विरूद्ध दोगुणे से भी अधिक बंदियों को समायोजित कर संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव बढ़ा दिया है. 400 बंदियों के क्षमता वाले कारागार में सीमित संसाधनों में 900 बंदियों को रखना कहां तक समीचीन है. राज्य सरकार को इस संबंध में भी यथा शीध्र आवश्यक निर्णय लेने की आवश्कता है. 

जेल में ’’मुलाकात’’ (जेल में मिलने आने वाले व्यक्ति) शब्द के बड़े मायने हैं. सामान्य जीवन जी रहे व्यक्ति या हमारे जैसे लोग जो हफ्ता या दस दिनों में जमानत पर रिहा हो जाते हैं, इस शब्द की महत्ता को नहीं समझ सकते. लम्बे समय से जेल में बंद लोगों के लिए मुलाकात का आना किसी उत्सव से कम नहीं होता, चूंकि समाज और दुनियां से कटे व्यक्ति को मुलाकात के माध्यम से ही परिवार के समाचार और जेल में सामान्य जीवनयापन की वस्तुएं यथा साबुन, तेल इत्यादि खरीदने के पैसे मिलते है, इसलिए मुलाकात के नाम पर बंदी पूरे उल्लास के साथ चमकते चेहरे लेकर जाते है. इसी समय इस पूरे प्रकरण का सबसे विद्रूप चेहरा सामने आता है, बिना निश्चित शुल्क चुकाये पर्ची अंदर नहीं जाती है और मुलाकात में बंदी को मिलने वाले पैसे का बड़ा भाग कहीं रास्ते में गुम हो जाता है. बुझे हुए चेहरे लेकर व्यवस्था को कोसता हुआ वह बंदी जब वार्ड में लौटता है तो पुराने बंदी उसे ढांढस बंधाते हैं.

महिला वार्ड में स्थिति कुछ भिन्न नहीं ही होगी. परंतु मुझे स्वयं न तो महिला बंदियों से बात करने का अवसर मिला न ही एक बंदी के रूप में महिला वार्ड के अंदर प्रवेश कर सकता था. परंतु एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख आवश्यक है. मुलाकातियों के लगातार आने के कारण एक बार मैं जेल कार्यालय में बैठा था. एक महिला बंदी दो बच्चों के साथ कोर्ट जाने के लिए आयी. उसके बड़े पुत्र की उम्र लगभग पांच वर्षों की रही होगी. कार्यालय में कार्यरत एक विचाराधीन बंदी ने उस अबोध बालक से सहज भाव से पूछा “यहां (जेल) काहे आया’’? उस बच्चे ने तोतले शब्दों में स्पष्ट कहा “मर्डर करके आया’’. मैं स्तब्ध होकर उस बालक का चेहरा देख रहा था और सोच रहा था कि सभ्य समाज में जिस वाक्य का उच्चारण एक गर्हित कृत्य है, यह अबोध बालक गौरवान्वित होकर इसकी घोषणा कर रहा है. उसकी माँ दोषी होगी या निर्दोंष यह तो विवाद का विषय हो सकता है, पर उस बालक का बालपन तो कतई दोषी नहीं हो सकता. हमारे नीति नियंताओं को कानूनी प्रक्रिया के दौरान बचपन को पिसने से बचाने से उपाय खोजने होगें. 

चरम वामपंथी विचारधारा के समर्थकों से भी मुलाकात हुई, शायद जेल के बाहर उनसे कभी मुलाकात भी न हो पाती और जिस निश्चितता के भाव के साथ उनसे वैचारिक बहस हुई इसकी तो सम्भावना ही निर्मूल थी. आज झारखण्ड के बड़े भूभाग में उनकी समानांतर सत्ता चलती है. यह जानने के गंभीर प्रयास होने चाहिए कि देश में चल रही लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था पर उनके दृष्टिकोण क्या है? इन्ही मुद्दों को लेकर मैनें उनके साथ कई बैठकें की परंतु सिद्धांत कार्यनीति और इस लोकतांत्रित शासन पद्धति के विकल्पों पर उनके विचार शायद मेरी अल्प बुद्धि के कारण मुझको पूर्णतया स्पष्ट नहीं हो पाये, हाँ यह अवश्य ही समझ में आया कि संवेदनहीन भ्रष्ट राजनैतिक नेतृत्व, रीढ़विहीन अफसरशाही, संस्थागत न्यायिक प्रक्रिया के दोष और राजनैतिक चेतना शून्य जनता ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी विसंगतियों को पनपने का मौका दिया कि उनके फलाफल में आज असंतुष्टों की एक बड़ी जमात अपने हक-हकूक के मुद्दों पर सभ्य समाज से युद्ध करने को सन्नद्ध खड़ी है. यह विचारणीय और ज्वलंत प्रश्न आज मुँह बाये खड़ा है और हमें शीध्रातिशीध्र इनके उत्तर और समाधान खोजने होगें. 

जेल की व्यवस्था में संतुष्ट होने के लायक कुछ कारण भी थे. पूरे कारा परिसर में पेड़-पौधों की बहुलता थी, जिससे प्राकृतिक पर्यावास महसूस होता था. इन पेड़-पौधों में पक्षियों का बसेरा था और उनकी छाया में बैठने पर मन को शांति मिलती थी. जेल का पुस्तकालय भी समृद्ध था, जिसमे हिन्दी साहित्य की पुस्तकों का अच्छा संकलन था. मैनें सात-आठ पुस्तकें पढ़ने का भी सौभाग्य भी पाया, क्योंकि बाहर की भागदौड़ की जिंदगी में इतना भी अवकाश नहीं मिलता. साफ – सफाई के बिंदु पर भी हालात संतोषजनक दिखते थे. पूरे परिसर में गंदगी नहीं के बराबर दिखती थी. जितने दिन मैं रहा बंदियों और जेलकर्मियों के सम्बंधों को अनुशासित और सामान्य पाया. 

जिला मुख्यालय से चार किलोमीटर दूर बसे इस 900 व्यक्तियों के एकाकी समाज में अधिकांशतः लोग शोषित और पीड़ित है जिनके प्रति सभ्य समाज को दया और सहायता की पहल करनी चाहिए. बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे पर व्यवस्था परिवर्तन और बंदियों की हालत में जरा सा भी सुधार कर पाने की उत्कट इच्छा लेकर मैं जमानत के उपरांत मंडल कारा से रिहा हुआ. यह लेेख मैनें जो देखा या भोगा उसी को आधार बनाकर लिखा है, यदि मेरी किसी पंक्ति या वाक्य से किसी भी व्यक्ति या संगठन की भावना को ठेस पहुंची है तो मैं करबद्ध क्षमाप्राथी हूँ.

सुदिव्य कुमार “सोनू’

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र 32 -विधायक

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