बाबूलाल व दीपक प्रकाश बताएं, क्या पीड़ितों की आर्थिक मदद से ज्यादा जरूरी है, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट और 8,458 करोड़ का विमान ख़रीद?

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पीड़ितों की आर्थिक मदद

क्या नैतिकता के आधार पर कहा जा सकता कि केंद्र सरकार की तैयारी के अभाव में, कोरोना महामारी की दूसरी लहर में लाखों मौतें हुई? और अब जब पीड़ितों की आर्थिक मदद कर देश को संभालने की है जरुरत, तो मोदी सरकार की प्राथमिकता है महल बनाना.

जब जीएसटी से अरबों की हो रही वसूली, तो देश की आर्थिक हालत फिर खराब क्यों? 

रांची. केंद्र की मोदी सरकार ने अपनी गलत नीतियों से एक बार फिर विपक्ष को सवाल पूछने का मौका दिया है. ज्ञात हो, देश में फैली कोरोना महामारी से लाखों लोगों की जाने गयी. मृतकों के परिजनों द्वारा केंद्र से 4 लाख की आर्थिक मदद देने के बारे में पूछा गया. इस सम्बन्ध में केंद्र ने बताया है कि वह पीड़ितों को मुआवजा नहीं दे सकती. इसके पीछे तर्क दिया गया कि देश की आर्थिक हालत खराब है. ऐसे में मुआवजा देने से कोरोना से जंग के मातहत स्वास्थ्य सुविधा पर होने वाले खर्च पर असर पड़ेगा. 

ऐसे में देश के लिए सवाल हो सकता है कि मोदी सरकार जब महामारी में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में 20,000 करोड़ और विमान खरीदने में 8,458 करोड़ रुपये खर्च कर सकती है, तो फिर पीड़ितों को आर्थिक मदद देने में उसे परहेज क्यों? ऐसे में देशभक्त बाबूलाल मरांडी और दीपक प्रकाश का झारखंड में फर्ज बनता है कि वे नैतिकता के आधार पर निष्पक्ष राजनीति का उदाहरण पेश करते हुए, बताएं कि क्या मौजूदा दौर में कोरोना पीड़ितों को आर्थिक मदद देना ज्यादा जरूरी है या सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट और 8,458 करोड़ खर्च कर विमान की खरीदी?

आधारहीन है केंद्र सरकार का तर्क, आखिर जीएसटी वसूली का पैसा जा कहां रहा है?

कोरोना पीड़ितों को आर्थिक मदद मुहैय्या न कराने के पक्ष में केंद्र का तर्क बेबुनियाद प्रतीत होता है. वह भी तब जब, मोदी सरकार अरबों रुपये का खर्च महज दो योजनाओं में कर रही है. क्या महामारी के दौर में 8,458 करोड़ रुपये की दो बोइंग 777-300 ईआर विमान की ख़रीद ज़रुरी हो सकती है. केंद्र का यह तर्क इस कारण से भी आधारहीन लगता है कि जीएसटी के नाम पर राज्यों से ली जा रही अरबों रुपये का भुगतान पहले ही केंद्र नहीं कर रही है. आखिर वह पैसा जा कहां रहा है. 

पहली लहर के दृश्य देखने के बाद भी केंद्र द्वारा तैयारी नहीं करने का नतीजा है देश में लाखों लोगों की मौत 

मोदी सरकार भले ही दलील दे कि आर्थिक हालात खराब होने के कारण कोरोना पीड़ितों को आर्थिक मदद नहीं दे सकती है. लेकिन, कहने में परहेज भी नहीं कि पहली लहर की तुलना में कोरोना की दूसरी लहर ने ज्यादा लोगों की जान ली. जिसका एक बड़ा कारण मोदी सरकार द्वारा उचित तैयारी नहीं कर पाना रहा है. जनवरी में पीएम मोदी ने विश्व आर्थिक मंच की दावोस सभा में दुनिया को बुलंद आवाज़ में कहा था कि भारत ने कोरोना महामारी पर काबू पा लिया है. उन्होंने यह भी दावा किया था कि महामारी से निपटने के लिए उनकी सरकार ने एक मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली बना ली है. 

मसलन, चूँकि, मोदी सरकार बिना राज्यों के सलाह-मशवरे के फैसले लेती है, तो देश के कई राज्यों ने माना कि भारत खुद संकट का मुक़ाबला कर लेगा. विश्वास करने की दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि राज्यों ने सोचा कि प्रधानमंत्री तो झूठ नहीं बोल सकते. लेकिन, मोदी सरकार के अन्य जुमलों की तरह यह भी एक जुमला ही निकाला. क्योंकि कोरोना की दूसरी लहर ने देश को जो क्षति पहुंचाई, उससे मोदी सरकार को छोड़ पूरी दुनिया अचंभित है. 

लाशों के ढेर पर बनने वाला ये महल न बनता तो देश की स्थिति कुछ और हो सकती थी 

मोदी सरकार की गलत नीतियों के कारण लोग महामारी में तड़प-तड़प कर मरने को मजबूर हुए. जो बच गए उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो चली है. लेकिन, विडंबना है कि मोदी सरकार के सरोकार देश के ‘फिकरों’ से नहीं बल्कि सपनों का हवा महल बनवाने से है. ज्ञात हो, जब पहले लॉकडाउन में, प्रवासी पैदल चलते हुए मौत के मुंह में समां गए, उस वक़्त भी प्रधानमंत्री ने खुद के लिए 8500 करोड़ का विमान खरीदा था. जिसकी प्रति घंटा उड़ान का खर्च करीब 1 करोड़ 30 लाख रुपये है. 

अब भी जब देश का दम घुट रहा है, तब प्रधानमंत्री खुद के लिए अरबों खर्च कर नया आवास बनवा रहे हैं. परियोजना का नाम सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट है. वह ऐसे वक़्त में जब महामारी से देशवासियों की आर्थिक हालत खराब हो चली है. वह अपनी रोज़मर्रा के जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें जरूरी सरकारी सेवाएं भी नसीब नहीं हो पा रही है. मसलन, मोदी सरकार द्वारा ऐसे संकट के दौर में भी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के निर्माण को ‘जरूरी सेवाओं’ में शामिल किया जाना. देश को ज़रुर अचभिंत करता है. ऐसे में झारखंड भाजपा के बाबूलाल व दीपक प्रकाश को बताना चाहिए कि लाशों के ढेर पर बनने वाला ये महल न बनता तो शायद देश फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो सकता था!

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