झारखंड चुनाव

महाराष्ट्र में जबरदस्ती सत्ता में काबिज होना झारखंड चुनाव प्रभावित करना भर है

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महाराष्ट्र में सत्ता में काबिज होना झारखंड चुनाव प्रभावित करना है 

मौजूदा वक़्त में बीजेपी का सच तो यही हो चल है कि सत्ता होगी तो वह है और सत्ता न रही तो फिर वे  वह तमाम काम करेगी जिससे सत्ता बचायी जा सके। सत्ता न होने पर अस्तित्व की सच्चाई से ही उन्हें सिहरन हो रही है। माने या न माने देश का मिज़ाज तो कुछ यही है। इस का ताज़ा उदाहरण, झारखंड चुनाव को लेकर प्रचार में आये अमित शाह का स्वागत में महज 2 हजार की भाड़े के भीड़ ने उन्हें सत्य से डरा दिया।

डर का आलम यह था कि महाराष्ट्र में सत्ता के लिए लोकतंत्र पर फिर एक बार बट्टा लगाने से नहीं चुके। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि उन्होंने महाराष्ट्र में सरकार बनाया, महत्वपूर्ण यह है कि यदि फिर एक बार कर्नाटक के भांति फ्लोर्स टेस्ट में फेल होते तो सप्ताह-दो सप्ताह के सत्ता में वे दादा गिरी से काबिज हुए, ज़िम्मेदारी लेंगे। नहीं बिलकुल नहीं -उनका यह स्टंट केवल झारखंड चुनाव को प्रभावित करना भर है, ताकि वोटर डर जाए।

महाराष्ट्र प्रकरण केवल झारखंड चुनाव को प्रभावित करना भर है

जबकि झारखंडी जनता की त्रासदी यह है कि मौजूदा सत्ता के थपेड़ों ने इन्हें डर व लोभ से परे कर दिया है। यहाँ की जनता इस चुनाव में बदलाव मोड दिख रही है। तो ऐसे में सत्ता की फ़िक्र सत्ता बरकरार रखने की सोच से ज्यादा कुछ नहीं साबित होगी। सच भी यही है कि पीएमओ से लेकर नीति आयोग तक में बैठे नौकरशाह सिर्फ रुटिन कार्य कर रहे है। कई मंत्रालयों में तो सारे काम ठप पड़े है। या कहे सारे झारखंड की चुनावी जीत बरकरार रखने में सिमट चुके है। 

मसलन, जैसे कि सत्ता को लगता है वह अनंतकाल तक रहेगी, इसलिए वह जो चाहे वह कर रही है। लेकिन झारखंडी का मिज़ाज बताता है कि इस चुनाव में उनके सोच पर ज़ोरदार प्रहार होने वाला है। जनता बदलाव के बयार से सत्ता को रु-ब-रु करवा कर ही दम लेगी और देश भर को लोकतंत्र बचाने के लिए नयी दिशा देगी।

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