फ़क़ीर प्रधानमंत्री का क्या झोला उठा कर चलने का वक़्त आ गया है !

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फ़क़ीर प्रधानमंत्री

भाजपा द्वारा जारी लगातार धुआंधार प्रचार, फ़क़ीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगभग 161 सभाएँ- रैलियाँ और अरबों करोड़ के चुनावी खर्च के बावजूद लोकसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन चारों खाने चित्त होते दिख रही है। सारा हाईटेक प्रचार और मीडिया प्रबंधन धरा का धरा रह गया है। अपने ‘विकास’ के दावों के ब्यौरा देने के बजाय आचार संहिता का धज्जियाँ उड़ाते हुए सेना के नाम पर खूब वोट माँगे गए। यहाँ तक कि ख़ुद प्रधानमंत्री अपने पद के गरिमा तक को तार-तार करने से नहीं चुके। फिर भी नतीजे भाजपा के माकूल नहीं दिखती। पिछले दिनों पहली मोदी जी प्रेस कांफ्रेंस में बैठे ज़रुर लेकिन उनके द्वारा पत्रकारों का जवाब न देना और उनकी बॉडी लैंग्वेज भी इसी संभावना की ओर इशारा कर रही थी।

दलील यह दी जा रही है जो कि बेबुनियाद भी नहीं है कि आम मतदाता किसी पार्टी की नीतियों की अच्छाई-बुराई जाँच कर वोट नहीं करता। जातिगत और धार्मिक आधार पर होने वाले ध्रुवीकरण के अलावा पैसे और ताक़त का जोर भी वोट डलवाने में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन सभी परिस्थितियों के  बावजूद यह ध्रुवीकरण भाजपा गठबंधन के पक्ष में क्यों नहीं होता दिख रहा, जबकि भाजपा के चुनाव प्रबंधकों ने हर हथकंडा आज़माने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। पैसे की ताक़त के साथ ही समाज के दबंग और प्रभुत्वशाली तबक़ों का भी अधिक समर्थन इसी दल के साथ हैं।

इस आम चुनाव में बुद्धिजीवियों व तमाम प्रगतिशील जमातों का एक बड़ा हिस्सा इस बात को लेकर बेहद खुश दिखा कि भारतीय जनता पार्टी के रूप में एक सांप्रदायिक फासीवाद की पराजय होने वाली है जिससे देशभर में बढ़ते उत्पात पर लगाम लग सकेगी। इसमें कोई शक नहीं कि यदि भाजपा हारती है तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा और भाजपा में आंतरिक कलह का एक दौर शुरू हो जाएगा। फ़क़ीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने तमाम पुराने और स्थानीय नेताओं को जिस तरह से किनारे करते हुए सारा प्रचार अभियान अपने को आगे करके चलाया है  हार की गाज भी उन्हीं पर गिरना तय है। जिसका उदाहरण शत्रुघ्न सिन्हा जैसे दिग्गज नेताओं ने पार्टी छोड़ दे दिया है।

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