झारखंड बना “झा” खंड  -रामदेव विश्वबंधु (सामजिक कार्यकर्ता सह चिन्तक)

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झा -खंड

भाजपा ने झारखंड को “झा” खंड बना दिया 

एक लम्बे संघर्ष व शहादत के बाद अलग झारखण्ड राज्य का निर्माण हुआ। 15 नवम्बर, 2000, अमर स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के जन्म दिन को झारखंड राज्य देश के 28 वे राज्य के रूप में भारत के मानचित्र पर अवस्थित हुआ। झारखण्ड के शहीदों का अरमान था कि एक न्याय पूर्ण राज्य का निर्माण हो, जिसमे सामाजिक व आर्थिक न्याय से लेकर पलायन और विस्थापन से मुक्ति से लेकर प्राकृतिक संसाधनों तक का उचित उपयोग हो, जिसमे स्थानीय लोगो को रोज़गार उपलब्ध हो सके। झारखण्ड दलित-आदिवासी बहुल राज्य है, इस राज्य में दलित-आदिवासी का आबादी 40% है। साथ ही देश का 40% खनिज संसाधन का मालिक भी यही राज्य है। 81 विधान सभा सदस्यों में  37 दलित-आदिवासी समुदाय से हैं जो सुरक्षित सीट से आते हैं।

झारखण्ड के 19 साल के इतिहास में भाजपा तकरीबन 16 साल तक किसी न किसी रूप में शासन में रही और आज भी हैं। जब भी बीजेपी शासन में रही तो टॉप लेवल अधिकारी ब्राह्मण ही रहे। आज जब इस राज्य के मुख्यमंत्री पिछड़ी जाति से हैं तो झारखण्ड के मुख्य सचिव डी के तिवारी हैं, झारखण्ड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष सुधीर त्रिपाठी हैं, पुलिस विभाग के हेड डी.जी.पी. डी. के. पाण्डेय हैं, झारखण्ड स्टेट लाइवलीहुड प्रोमोशन सोसाइटी के निदेशक परितोष उपाध्याय हैं जो भारतीय वन सेवा से हैं। सरकार के अधिकांश सचिव झा जी, तिवारी जी, मिश्रा जी या कोई उपाध्याय जी हैं। यहाँ तक कि यदि भाजपा विधायक वाले जिलों को टटोलें तो, गिरिडीह जिले के उपायुक्त राजेश पाठक, एस.पी सुरेंद्र झा… अभी हाल में चुनाव के पहले बोकारो जिला के उपायुक्त शैलेश कुमार चौरसिया (पिछड़ा वर्ग ) से थे को तबादला कर उनके जगह पर कृपानंद झा को लाया गया, सभी ब्राह्मण हैं।

इस परिस्थिति के अक्स तले आज प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह की याद आती है, जिन्होंने 1990 में द सन्डे अंग्रेजी साप्ताहिक में “ब्राह्मण पॉवर” शीर्षक से एक लेख लिखा था। उन्होंने विभाग वार तौर पर ब्राह्मण की उपस्थिति का आंकड़ा हमारे बीच रखी थी। उन्होंने बताया था की ब्राह्मण मात्र 3.5% है लेकिन संसद, राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय सचिवालय, कुलपति, जज आदि सभी पद पर ब्राह्मण का कब्ज़ा है।

     आज तीस साल बाद भी संदर्भित परिस्थितियों में कोई ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। अभी हाल में ही फ़रवरी 2019 के समयांतर (हिंदी मासिक) में संपादक पंकज विष्ट लिखते हैं – अंग्रेजों ने देश को एक कर दिया, ब्राह्मणों को तैयार माल मिल गया, और ये अब देश पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि भारत रत्न के 48 लोगों में 23 ब्राह्मण है। उसी तरह साहित्य अकादमी अवार्ड में अधिकतर ब्राह्मण हैं।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पूर्व कार्यकर्ता संजीव सिन्हा संजू बताते हैं कि किसी भी राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद, नागपुर से 2-3 लोगों को सरकार के साथ लगा दिया जाता है। उन्हीं के इशारों पर राज्य की भाजपा सरकारें काम करती है या उसे मजबूरन करना पड़ता है। झारखण्ड सचिवालय में अधिकतर नौकरशाह ब्राह्मण हैं और बाहरी भी। नतीजतन, अभी हाल ही में हुई हाई स्कूल शिक्षक बहाली में 75% (प्रतिशत ) बहाली में अधिकतर सवर्ण थे और बाहरी थे। सबसे अधिक बुरा हाल तो झारखण्ड लोक सेवा आयोग का है, भ्रष्टाचार से आकंठ डूबा हुआ। 19 साल के झारखण्ड में छठी परीक्षा भी अबतक क्लियर न हो सकी है।

हालांकि कहने को तो मुख्यमंत्री रघुवर दास पिछड़े वर्ग से आते हैं, लेकिन वे काम पिछड़ों के विरोध में करते दिखते हैं। आर एस एस के एजेंडा पर ही काम करते मालूम पड़ते रहे हैं। अपने शासनकाल में वे धर्म परिवर्तन एवं ईसाई के खिलाफ खूब बोलते दिखे हैं।

मसलन, कुल मिलाकर देखे तो झारखंड “झा” खंड बन गया है “र” ग़ायब हो गया है। र का अर्थ Revolution (क्रांति ) से है, जो झारखंड की पहचान रही है और जिससे अलग झारखण्ड का अर्थ संभव हो सकेगा।

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