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साहेब की धार्मिक सत्ता

साहेब की धार्मिक सत्ता के बीते वर्षों में क्या हुआ भूले तो नहीं ?

बीते वर्षों में साहेब की धार्मिक सत्ता में देश तीतर-बीतर हो गया 

आज रामनवमी के अवसर पर आडम्बर से भरे रामभक्तों को देख कृष्णकाल की वृतांत याद आ जाती है, जब आज के प्रधान नेता के ही भांति उस वक़्त भी किसी को इतना घमंड हो गया था कि वह विष्णु का वेषभूषा धारण कर जनता को कहने लगा कि, वह ही भगवान है और लोग उसकी पूजा करे, लेकिन उस वक़्त भी उसका संहार हुआ और सच सामने आया। क्योंकि पांच वर्ष के धार्मिक सत्ता में धर्म के भाव ही नहीं दिखे और ऐसा भी लगने लगा कि यदि आप मुसलमानों को मारते हैं तो ही हिन्दू है? क्या यह कभी भी हिन्दू धर्म की भावना हो सकती है? -नहीं और यदि आप सच्चे राम भक्त हैं तो…

बीते चार बरस में साहेब की धार्मिक सत्ता में क्या हुआ आप भूले तो नहीं है? -भारत में मोबलिंचिंग के दौर में अबतक पेहलु-अख्लाख-रकबर से ले कर 60 लोगों हत्या हो गयी तो 108 लोगों की मौत नोट बंदी के दौर में लाइन में खड़े रहने से हो गयी। जबकि इसी दौर में दलितों को भी यकीन हुआ कि भाजपा केवल ऊँची जातियों की पार्टी है और ऊँची जातियों के बीच भी यह डर उभरा कि कहीं भाजपा दलितों के वोट मोह में दलित प्रेमी तो नहीं हो गयी -क्या 10 प्रतिशत आरक्षण व एससी-एसटी एक्ट में नरमी लाने की प्रयास इसलिए हुई? मतलब इसको उसका डर उसको इसका डर होगा, किसी में सोचा था कि हिंदुस्तान में ऐसा होगा? देश हित में सोचियेगा ज़रूर कि यही हमारे देश का अब भविष्य होगा। क्योंकि साहेब ने आज देश को ही बाजार में तब्दील कर दिया है।

मसलन, आज़ादी के बाद से अबतक देश में किसानों की तायदाद 18 करोड़ बढ़ गयी, लेकिन उनकी स्थिति जस की तस है। जबकि तीन करोड़ मुसलमानों की तायदाद बढ़ते-बढ़ते 20 करोड़ तक पहुँच चुकी है और 3.5 करोड़ दलित अब तकरीबन 23 करोड़ है, लेकिन आज तक इनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति वैसी ही है -मतलब उनके भीतर की ग़रीबी, गरीबी रेखा के नीचे का जीवन यापन उसी अनुपात में बढ़ा है। ऐसे में सवाल फिर वही हैं -साहेब फिर किस विकास की बात करते हैं?

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