झामुमो के अलावे अन्य राजनैतिक दल आदिवासियों के लिए आवाज क्यों नहीं उठा रहे?

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झामुमो

झामुमो के अलावे कोई भी दल या आदिवासी विधायक सांसद आदिवासियों के लिए आवाज क्यों नहीं उठा रहे

भाजपा ने अपने शासनकाल में जाती-पाति में निहित ऊंच नीच के भेद-भाव को नया आयाम दिया, लगभग 20 लाख से अधिक आदिवासी भाई बहनों के परिवार को जंगल से विस्थापित होने को विवश कर दिया है। हर हिन्दुस्तानी जानता है कि आदिवासी और जंगल अनादि काल से एक दूसरे का पूरक रहे हैं। यदि वे हैं तो जंगल हैं और जंगल हैं तो इन आदिवासियों का अस्तित्व है। शायद यही वे वजहें हैं जिसे हिंदुस्तान के वन क्षेत्र में लूटेरे पूँजीपतियों और माफियाओं के काली नज़रों के बावजूद अब भी थोड़े बहुत जंगल और उसके गर्व में खनिज सम्पदा बचे रह पाए हैं। लेकिन उच्च न्यायालय के इस फैसले से जंगल के अस्तित्व के साथ-साथ आदिवासियों के अस्तित्व एवं पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में अहम् भूमिका निभाने वाले अनेक जिव जंतुओं के जीवन पर भी खतरे मंडराने लगे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में प्रदूषण और ज़हरीली हवा की वजह से भारत में एक लाख (1,00,000) बच्चों की मौत हो गयी, और दुनिया भर में छह लाख बच्चे काल के मुँह में समा गये। मुम्बई, बैंगलोर, चेन्नई, कानपुर, त्रावणकोर, तूतीकोरिन, रांची सहित तमाम ऐसे शहर हैं, जहाँ खतरनाक गैसों, अम्लों व धुएँ का उत्सर्जन करते प्लांट्स, फैक्ट्रीयाँ, बायोमेडिकल वेस्ट  प्लांट, रिफाइनरी आदि को तमाम पर्यावरण नियमों को ताक पर रखते हुए गरीबों के बस्तियों और बेजुबान आदिवासियों क्षेत्रों में लगाया जाता है। मुनाफे की अंधी हवस में कम्पनियाँ न सिर्फ पर्यावरण नियमों का नंगा उल्लंघन करती, बल्कि सरकारों, अधिकारियों को अपनी जेब में रखकर मनमाने ढंग से पर्यावरण नियमों को कमज़ोर भी करवाती हैं। ऐसे में लाज़मी सवाल यही है की आखिर सरकार आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर कौन सी नीति लाना चाहती है?

मौजूदा सरकार के शासन काल में ही झारखण्ड, महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र. आदि जैसे राज्यों में अडानी के पॉवर व अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए संविधान को ताक पर रख कर वन कानूनों को तोड़-मरोड़ कर विशाल स्तर पर उन्हें जंगल सौंपे गये। उत्तरांचल जैसे राज्य में पतंजलि के लिए भी पर्यावरण नियमों की धज्जियाँ उड़ायी गयीं। नियामगिरि, तूतीकोरिन, बस्तर, दंतेवाड़ा में वेदांता के लिए वहाँ की जनता को मयस्सर आबोहवा में किस प्रकार ज़हर घोला गया, जगजाहिर है। ऐसे में एक साल में एक लाख बच्चों का वायु प्रदूषण की वजह से दम तोड़ देना और झारखण्ड समेत देश भर में 20 लाख लोगों को जंगल से बेदखल किये जाना कौन सी आश्चर्य की बात है। आश्चर्य की बात तो तब होती है जब मोदी जी अपने भाषण में कहते हैं कि “आदिवासियों की एक इंच ज़मीन भी नहीं छीनी जायेगी”!

अलबत्ता, आश्चर्य की बात यह ज़रूर है ऐसे विषम परिस्थिति में झारखंड के “झारखंड मुक्ति मोर्चा” ( झामुमो )और चंद आदिवासी हितों के हिमायती संस्था को छोड़ कर कोई भी अन्य दल या आदिवासी विधायक/सांसद अगर अपने और अपने भाइयों के हितों लिए आवाज़ नहीं उठा सकते तो उन्हें अब वोट माँगना बंद कर देना चाहिए और राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। सबसे बड़ा आश्चर्य तो इस बात का है कि भाजपा के समस्त आदिवासी विधायक/सांसद भी लोभ वश चुप्पी साध रखी है। ऐसे में समाज के लोगों को ही कम से कम पर्यावरण के नाम पर ही सही एकजुट हो झामुमो के साथ मिलकर इन बेजुबानों के दबी आवाज़ से अपनी आवाज़ मिलानी चाहिए। साथ ही इससे सीख लेते हुए समाज को भविष्य में अपने हितैषी दल का पहचान कर ही वोट करना चाहिए।

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