DVC प्रकरण

DVC प्रकरण: झारखंड हित में राजनीतिक महत्वकांक्षा से परे क्या सोच पाएगी भाजपा?

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DVC से त्रस्त झारखंड, मुक्ति के मद्देनजर क्या हेमंत सोरेन की विपक्ष सहमति की मांग पूरी होगी?  राज्य हित में दिल्ली बैठे आकाओं की नाराजगी मोल लेने का साहस क्या दिखा पायेंगे भाजपा नेता- बड़ा सवाल?

भाजपा काल की भीगी बिल्ली DVC, आखिर कैसे गैर भाजपा सत्ता में शेर बन गया- कहीं षड्यंत्र की बनी अम्ब्रेला में, डीवीसी भी गांठ का हिस्सा तो नहीं? 

लोकतंत्र के लिए अच्छी बात हो सकती थी, यदि DVC अपनी स्वायत्तता का इस्तेमाल संविधान के मूल लकीरों के इर्द-गिर्द करती। लेकिन जब उसकी मंशा केंद्रीय सत्ता के लाभ में, षड्यंत्र के उस अम्ब्रेला का हिस्सा होने का संकेत दे। जहाँ वह गरीब राज्य के सपनों को रौंदे। नियम-क़ानून संरक्षण के इतर गरीबों पर कहर ढाए। कोरोना जैसे त्रासदी से उबर रहे झारखंड की जनता के हक ठीक वैसे वक़्त में लगातार काटे, जब उसके मिट्टी का कर्ज चुकाते हुए मदद पहुंचाने का वक़्त हो। तो गरीब राज्य का मुख्यमंत्री राजनीति भूल हर वह कदम उठा सकता है जो जनता के हित में हो। चाहे वह डगर विपक्ष सहमति के पड़ाव से ही हो कर क्यों न गुजरे।

ज्ञात हो, भाजपा के डबल-इंजन सरकार में जब DVC का सच हथियार डाल भीगी बिल्ली बनने की कथा से जुड़ा हो। जहाँ वह पूरे पांच वर्ष उधारी अदायगी के मद्देनजर, राशि कटौती तो दूर एक अदद चिट्ठी तक लिख पाने का साहस उस सत्ता से ना जुटा पाए। और लोकतांत्रिक मूल्यों को मिटाते हुए, गैर भाजपा सरकार में, यदि वही  DVC कोरोना त्रासदी से उबरते अपने मातृ राज्य के उस मिट्टी को परेशान करे, जिसके साथ उसका अस्तित्व जुड़ा हो। तो उसकी स्वायत्तता को लेकर केंद्र पर उठते झारखंडी सवाल कैसे नाजायज हो सकता है। 

और फिर यहीं से दूसरा बड़ा सवाल भी उभरता सकता है कि झारखंड के विपक्ष राज्य हीत में अपने केन्द्रीय आकाओं की नाराजगी मोल क्या लेगा?  क्यों नहीं ले सकता यदि मिट्टी का मान महत्वाकांक्षा से ऊपर हो? और वह भी तब जब लोकतंत्र में किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के फ्रेंचाइजी चला रहे नेताओं के लिए राज्य प्रेम की आकलन का कसौटी हो। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि मिट्टी के कर्ज उतारने के मद्देनजर झारखंडी भाजपा नेता खरे उतरते हैं या नहीं। 

DVC पर विकास कार्यों व मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान नहीं देने के गंभीर आरोप

बजट सत्र में सत्ताधारी व निजी विधायक सदन में डीवीसी पर आरोप लगाए कि समझौते के तहत विकास कार्य व मूलभूत सुविधाओं पर वह ध्यान नहीं दे रहा है। और मैथन पावर प्लांट के प्रदूषण उत्सर्जन के सच उभारे।  यह भी कहे कि डीवीसी झारखंड की जमीन, कोयला, पानी का उपयोग कर दिल्ली को सुविधा पहुंचा रहा है। जिसके अक्स में गरीब, दलितों,आदिवासी, अल्पसंख्यक की उपेक्षा का सच उभरे। मुख्यमंत्री कहने से चूके कि दामोदर घाटी निगम से राज्य त्रस्त है। वह आम को नहीं उद्योग को बिजली देता है। और अन्याय के खिलाफ कार्यवाही में वह विपक्ष से सहमति का आशा जताए। तो यह विपक्ष के समक्ष लूट या मिट्टी के मान के चयन को लेकर सवाल हो सकता है।

निजीकरण के बन रहे अम्ब्रेला में गैर भाजपा सरकारों के विरोध को साधने का है यह खेल 

केंद्र की मौजूदा सरकार के सानिध्य में, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और औद्योगिक इकाइयों को विनिवेश (निजीकरण) की बलि वेदी पर स्वाहा करने के मद्देनजर, देश में निजीकरण का जो अम्ब्रेला तैयार हो रहा है। जिसके अक्स में संस्थानों के कर्मचारी, मजदूर- किसान अपने विरोध के साथ आंदोलनरत हैं। और इस कैनवास में गैर भाजपा शासित राज्यों की सरकारों का उस विरोध के आन्दोलन साथ मजबूती से खड़े होने का सच। केंद्रीय सत्ता के काले मंसूबो में रोड़े अटकाए। तो जाहिर है केंद्र सार्वजनिक उपक्रमों का इस्तेमाल कर न तमाम सरकारों को साधने का प्रयास करेगी। झारखंड में DVC प्रकरण इसी गंदी राजनीति खेल का सच भर है।

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