सांसद शिबू सोरेन दिल्ली में झारखंडियों की एक सशक्त आवाज  -भाग 5

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सांसद शिबू सोरे दिशोम गुरु

सांसद गुरूजी को ( दिशोम गुरु शिबू सोरेन ) को एक झारखंडी का भावांजलि 

गुरूजी ( सांसद दिशोम गुरु शिबू सोरेन ), युगपुरुष ने 10वीं बार लोकसभा प्रत्याशी के रूप में पर्चा भरा, जो कि खुद में एक इतिहास है। झारखंड ख़बर इस महापुरुष के जीवन के कुछ यादगार पल आपके समक्ष रखने की धृष्टता करता रहा है – इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए इस लेख में 1970 का दौर खंगालने का प्रयास करेंगे।

1970 के दौर में गुरूजी ने कई स्कूल खुलवाये, बिजली के अभाव में उन्होंने बच्चों के बीच लालटेन वितरित किये और उसे जलाने के लिए मिट्टी तेल व करंज तेल मुहैया करवाए, ताकि हमारी पीढ़ी शिक्षा ग्रहण कर सके। अबतक पारसनाथ व टुंडी के क्षेत्र में ये इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि लोग इन्हें मुछों वाला न कहकर गुरूजी कहने लगे थे। ठीक उसी वक़्त आई.ए.एस. के बी सक्सेना धनबाद उपायुक्त के रूप में प्रभार ग्रहण किये। शायद वे गुरूजी की समाजिक कार्यों को देख कर उनकी मंशा को  समझ गए और प्रभावित हुए।

एक दिन की बात है -गुरूजी पारसनाथ के गोद में बसे कुखरा बस्ती में रुके हुए थे। सादे वेश में अचानक उनकी मुलाक़ात दारोगा घटक नायक से हो जाती है। सामने दुश्मन को पाकर गुरूजी चौकन्ने हो गए, जिसे दारोगा ने पढ़ते हुए कहा कि अब आपको वेश बदलने की आवश्यकता नहीं है, न ही हथियार उठाने की -गुरुजी भावशूल्य हो दारोगा की और देखने लगे मानो उनकी आँखें कह रही हो कि उन्हें पुलिस की जमात पर भरोसा नहीं। दारोगे ने आगे कहा कि वह उनके सामाजिक कार्यों से प्रभावित हो उनसे आशीर्वाद लेने आया है। साथ ही यह भी बताया कि गुरु की तारीफ़ स्वयं उपायुक्त साहेब मीटिंगों में करते है और कहते हैं कि वह व्यक्ति समाज को नयी दिशा दे सकते हैं, केवल भटका हुआ हैं।

यकायक गुरूजी ने कहा कि तब क्या आज्ञा है दरोगा साहेब, मै आपके सामने हूँ, आप मुझे गिरफ्तार कर सकते हैं, मैं चलने को तैयार हूँ। दारोगा ने कहा कि मैं आपको न गिरफ्तार करूँगा न ही आपके समाजिक कार्यों में रोड़ा बनुगा, बल्कि में तो आपकी सहायता करना चाहता हूँ। इतना कह घटक दारोगे ने अपने जेब से कुछ रूपये निकालकर गुरु के चरणों रख दिए और वापस चला गया। गुरूजी को समझ नहीं आ रहा था यह क्या हो रहा है, उन्होंने राहत भरी सांस ली और उन रुपयों को भागीरथ महतो के हाथों में दिए और अगले स्कूल के तरफ बढ़ गए – इस प्रकार यह सामाजिक कार्य ही उनके राजनीतिक जीवन की पहली सीढ़ी बनी और यह कहने कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वह आज सांसद के रूप में, दिल्ली में झारखंडियों के एक सशक्त आवाज हैं। …(शेष जीवनी आगले लेख में)      

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