स्मार्ट सिटी के आड़ में रघुबर सरकार द्वारा हो रही गाँवों की बदहाली

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स्मार्ट सिटी

भारत में स्मार्ट सिटी का प्रारूप केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत की गयी थी। जिसके अंतर्गत देश के सौ नगरों को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने का दावा किया गया था। इस प्रारूप द्वारा जारी किए गये सूची में शामिल नगरों में क्वालिटी ऑफ़ लाइफ के स्तर को बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया, जिसमे शामिल सभी नगरों में किफ़ायती घर, चौबीसों घंटे पानी और बिजली आदि और भी सभी सुविधायें प्रदत्त की जानी थी। परन्तु साल बदलते गए और स्मार्ट सिटीज की लिस्ट भी लंबी होती गई, लेकिन राज्य में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में न तो साफ नीयत नजर आई और न ही सही विकास हुआ।

लेकिन इसके विपरीत स्मार्ट सिटी के आड़ में गाँवों को नजरअंदाज किया जा रहा है। शौचालय, सफाई, साफ पानी, नियमित बिजली, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं भी गाँवों को नसीब नहीं हो सकीं है। ‘हल्की सी बारिश में डूबी सड़कें, जगह-जगह पड़े कूड़े के ढेर, टूटी सड़कों पर हिचकोले खातीं गाड़ियां और बजबजाती नालियों में मुंह मारते आवारा पशु।’ ऐसी तस्वीरें आज भी अख़बारों की सुर्खियां बन सकती है पर स्मार्ट सिटी के आड़ में भाजपा सरकार बड़ी चतुराई से इन समस्यायों से मूँह फेर रही है।

एक बात यह भी है कि भाजपा सरकार का कार्य स्मार्ट सिटी योजना के तहत आंकड़ों में भले ही ऊपर जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत सोच से कोसों दूर है। इसकी सूची में शामिल शहर तो स्मार्ट नहीं हुए हैं, लेकिन ‘स्मार्ट’ योजनाबद्ध रणनीति के तहत लोगों से पोल करवाकर ‘डिजिटल’ रिकार्ड्स में अपनी उपलब्धियों के ढोल पीट रहे हैं।

ऐसे में ख्वाबों की बुनियाद पर बनीं स्मार्ट सिटी योजना का हश्र देख उम्मीदों के साथ आशंकाएं भी बेचैन कर रही हैं। आज राज्य के ग्रामीण इलाके जिस कदर बदहाली में जकड़े हैं, जनता मूलभूत आवश्यकताओं के लिए जूझ रही है। ऐसे में देखना यह है कि सरकार की कौन सी जादू की छड़ी राज्य को स्मार्ट रूप देगी।

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