शाह आदिवासियों को झुनझुना पकड़ा चलते बने!

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झारखण्ड में 11 जुलाई को भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का एक दिवसीय दौरा हुआ। उम्मीद के मुताबिक यहाँ के मीडिया द्वारा दिए गए शीर्षक – ‘शहंशाह’ ने आदिवासी नेताओं के साथ फोटो खिंचवाई, बंद 5 सितारे कमरे में आगामी चुनाव हेतु रणनीति की चर्चा की, राजधानी की सड़क पर शक्ति प्रदर्शन किया एवं गोमिया चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद मुरझाये हुए अपने बजरंगी कार्यकर्ताओं को उकसाने का प्रयास किया। हालांकि राज्य के पिछले 2-3 महीने के घटनाक्रमों को देख कर लग रहा था की महोदय उलीहातू में अपने पिछले दौरे के दौरान किए गए भूमि पूजनों की समीक्षा करेंगे तथा खूंटी में हुई पुलिसिया बर्बरता पर कुछ बोलेंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। यहाँ की जनता के मन में अनेकों सवाल थे जिस पर कुछ बोले बिना ही वे अपने उड़नखटोला पर सवार हो पटना को कूच कर गए। ज्ञात रहे कि कल्याण विभाग को उलिहातू में 136 आवास बनाने थे और इन आवासों को ग्रामीणों के बीच वितरण भी करना था। जबकि अब 10 महीने बीत जाने के उपरांत भी इस योजना पर कुछ नहीं हुआ है। अबतक इस योजना के तहत एक भी ईंट नहीं जोड़े जा सकी है परन्तु इस बार भी वे बड़े लोक लुभावन एवं गलत आंकड़ों की उपलब्धियों के सिवाय जनता को अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे सके और जनता के सारे ज्वलंत सवाल मन में ही धरे रह गए।

चूँकि बाबूलाल चिट्ठी प्रकरण में अमित शाह का नाम शामिल है तो जनता के मन में यह सवाल था कि इस प्रकरण में भी ये कुछ बोलेंगे या फिर अपना पक्ष रखेंगे, पर जनता को यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। वे रघुवर सरकार के घोटाले जैसे कंबल घोटाला, मोमेंटम झारखण्ड, टैब घोटाला, ज़मीन घोटाला, सेविका नियुक्ति घोटाला, स्कूल-ड्रेस घोटाला, सड़क निर्माण घोटाला, स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय घोटाला, छात्रवृति घोटाला, कोयला घोटाला आदि पर भी कुछ नहीं बोले। पत्थलगढ़ी आन्दोलन, अपने चहेते अडानी को 7,410 करोड़ का फ़ायदा पहुँचा कर राज्य को नुकसान पहुंचाने के आरोप एवं भूख के कारण हो रही मौतों, आदि पर भी उन्होंने चर्चा करना जरुरी नहीं समझा। इन सबसे उलट तथाकथित ‘शहंशाह’ रघुवर दास एवं उनकी सरकार का पीठ थपथपा कर चले गए और साथ में यह भी कह भी गए कि अलग झारखण्ड राज्य भाजपा की देन है।

रहा सवाल कि अलग झारखण्ड राज्य भाजपा की देन है तो फिर समरेश सिंह और इन्द्रसिंह नामधारी जब भाजपा के प्राथमिक सदस्य थे तब उन्होंने पार्टी फोरम में अलग झारखण्ड राज्य का मुद्दा उठाया था। तो फिर इस मुद्दे को उठाने के एवज में भाजपा ने उपहार स्वरुप उन दोनों को पार्टी से क्यों निकाल दिया था? यकीन नहीं तो अमित शाह जी उनसे पता करवा लें, वे अभी भी जीवित ही है। ऊपर वाला उन्हें दीर्घायु प्रदान करे। और अगर यह भाजपा की ही देन है तो फिर दिशोम गुरु शिबू सोरेन, बिनोद बिहारी महतो, चम्पई सोरेन, निर्मल महतो, झगरू पंडित, नलिन सोरेन, जयपाल सिंह मुंडा, सुरेश मंडल, हाजी हुसैन अंसारी आदि कुछ शहीद हो गए और कुछ जीवित है, ये कौन थे? क्या ये सब भी भाजपा के प्राथमिक सदस्य थे या हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी, अपनी हड्डियाँ गलाई एवं जेल भी गए?

इसलिए अमित शाह जी को ये सुझाव है कि वे झारखंडियों को झारखण्ड में अन्य राज्यों की तरह इतिहास का पाठ न पढ़ायें, क्योंकि झारखण्ड का इतिहास यहाँ के लोगों में बसा हुआ है।

वैसे भी देखा जाय तो फासीवादी ताक़तें हमेशा अपने नात्सी पिता गोयबल्स के तरीके को अपनाती हैं। हिटलर के प्रचार मन्त्री गोयबल्स ने एक बार कहा था कि “एक झूठ को सौ बार दुहराने से वह सच बन जाता है”। ख़ास तौर पर जब जनता की ज़िन्दगी के हालात बद से बदतर हो गये हों; वह महँगाई, बेरोज़गारी, ग़रीबी, कुपोषण और बेघरी से बेहाल हो, और उसके सामने कोई क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद न हो, तो वह इस प्रकार के फासीवादी झूठों को सच मान भी बैठती है। जब आम मेहनतकश आबादी इस प्रकार की थकान का शिकार हो तो वह ऐसे मदारियों पर अक्सर भरोसा कर बैठती है जो कि नैतिकता, सदाचार, मज़बूत नेतृत्व का ढोल बजाते हुए आते हैं और सभी समस्याओं का किसी जादू की छड़ी से समाधान कर देने का वायदा करते हैं! लेकिन अंततः होता वही है जो जनता वर्तमान में इस सत्ता-शासन का खेल साक्षत देख रही है।

 

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