विलुप्त हो रहे जनजातीय भाषाओं को बचाना मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की प्राथमिकता सूची में 

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झारखण्ड : हेमन्त सरकार द्वारा विलुप्त हो रहे जनजातीय भाषाओं को बचाने का सराहनीय प्रयास. स्कूल-कॉलेज में इन भाषाओँ की पढ़ाई के साथ व्याकरण पर भी जोर. ‘जनजातीय विश्वविद्यालय’ सीएम की सोच इसी मंशे का हिस्सा. प्रतियोगिता परीक्षा के विषयों में अनिवार्य भाषाओं के रूप में जनजातीय भाषाओं को शामिल किया जाना, सकारात्मक पहल…

राज्य में खुलेगा ‘जनजातीय भाषा एकडमी’.

रांची विवि में 9 जनजातीय भाषाओं के लिए अलग-अलग विभाग.

कोल्हान विवि में 159 शिक्षकों का पद सृजन की तैयारी.

झारखण्ड

रांची : देश के अन्य राज्यों की तरह ही झाऱखण्ड में भी विभिन्न जनजातीय समुदाय हैं. जिनकी अपनी भाषाएं है, जो इनकी विशिष्टता और संस्कृति को रेखांकित करते हैं. लेकिन आज देश का दुर्भाग्य है कि कई जनजातीय भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर है. आंकड़ों के मुताबिक पिछले 50 सालों में भारत की करीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं. ऐसे विलुप्त हो रहे भाषाओं से झारखण्ड भी अछुता नहीं रहा हैं. यहां भी जनजातीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली कई भाषाएं विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं. लेकिन हेमन्त सरकार ने इन्हें फिर संरक्षित करने की इच्छाशक्ति दिखाई है. 

इस दिशा में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन का व्यक्तिगत रूप से गंभीर होना राज्य व देश के लिए सुखद खबर हो सकता है. चूँकि वह स्वयं एक जनजातीय समुदाय से आते हैं और अपनी मिट्टी-संस्कृति से जुड़े आन्दोलन को बचपन काल से देखा है, इसलिए वह जनजातीय भाषा के संरक्षण का महत्त्व समझते है. मसलन, उन्होंने अपने दो सालों के कार्यकाल में हमेशा ही इस कार्य को प्रमुखता से प्राथमिकता में रखा है. उनके द्वारा जनजातीय भाषाओं के लेखकों-विद्वानों व रचनाकारों को सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जा रहा हैं. उनकी सरकार में स्कूली स्तर से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा में जनजातीय भाषाओं व उसके व्याकरण की पढ़ाई पर भी जोर देने की नीति पर काम किया जा रहा हैं. 

जनजातीय भाषाओं के रचनाकार को उनकी ऐतिहासिक रचनाओं के लिए दी गयी 1-1 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि 

इस उदेश्य का बड़ा उदाहरण 15 नवंबर 2021, राज्य स्थापना दिवस के मौके पर प्रोजेक्ट भवन में आयोजित कार्यक्रम में देखने को मिला. कार्यक्रम में सीएम हेमन्त सोरेन ने राज्यपाल के साथ मिलकर लुप्त होते राज्य के जनजातीय भाषाओं के व्याकरण और चित्रकथा पर लिखी गई किताबों का विमोचन किया. और उसके रचनाकारों को एक-एक लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि देकर सम्मानित भी किया. 

झारखंड के लुप्त हो रहे जिन 45 जनजातीय भाषाओं के किताबों और व्याकरण के किताबों का विमोचन किया गया उनमें मालतो, भूमिज, आसूरी, बिरहोरी आदि भाषा की किताबें शामिल हैं. इसमें खास बात यह रही कि इन किताबों को लिखने वाले सामान्य ग्रामीण लेखक हैं. जो घरेलू कामकाज के साथ डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के सहयोग से इस एतिहासिक कार्य को किया है.

जनजातीय विश्वविद्यालय से भाषाओं का हो सकेगा संरक्षण, संवर्धन व विकास

शीतकालीन सत्र के दौरान मुख्यमंत्री व सत्ता पक्ष के नेताओं के प्रयासों से राज्य में जनजातीय विश्वविद्यालय बनाने का विधेयक पारित हुआ. इस विश्वविद्यालय की स्थापना होने से जनजातीय भाषाओं को संरक्षण, संवर्धन व विकास का पूरा मौका मिलेगा. जिससे बदलाव के दौर में अपनी संस्कृति को भूल चुके जनजातीय युवाओं को अपनी भाषा-संस्कृति-इतिहास की गरीमा को फिर से जानने का, जीने का मौका मिलेगा. और वह अपने पूर्वजों के साहित्य से परिचित होंगे. वह समझेंगे कि क्यों उन्हें अपनी मातृभाषा को नहीं भूलना चाहिए.

प्रतियोगिता परीक्षाओं में जनजातीय भाषा को वैटेज दिए जाने से होगा फायदा

राज्य की प्रतियोगी परीक्षाओं में जनजातीय भाषाओं को पहले भी शामिल किया जाता रहा है. लेकिन हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में के होने के कारण अधिकांश अभ्यर्थी (विशेषकर जनजातीय समुदाय के बच्चे) जनजातीय भाषाओं को अपनाने से परहेज करते थे. लेकिन, मुख्यमंत्री के निर्देश पर बनायी गयी नियोजन नियमावली में पहली बार हिंदी और अंग्रेजी को केवल क्वालिफाइंग भाषा के श्रेणी में रखा गया है. यानी इन विषयों में केवल पास होना होगा, इनके अंक प्रतियोगिता परीक्षा के मैरिट लिस्ट में नहीं जोड़े जाएंगे. जिसका सकारात्मक प्रभाव जनजाति भाषाओँ पर पड़ेगा. अभ्यर्थियों का रूझान जनजातीय भाषाओं के तरफ बढेगा. 

राज्य में पहली बार जनजातीय भाषाओं के लिए गठित होंगे अलग-अलग विभाग

ज्ञात हो, रांची विश्वविद्यालय ने वर्ष 2022 के शुरूआत में ही जनजातीय भाषाओं के संरक्षण में बड़ा फैसला किया है. विश्वविद्यालय में 9 जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई नए रूप में शुरू होगी. पहले ग्रेजूएट से एम.ए स्तर के कोर्स में जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा विभाग के तहत होती थी. लेकिन अब 9 जनजातीय भाषाओं के लिए अलग-अलग विभाग गठित होगा. इसमें  विश्वविद्यालय में लैंग्वेज लैब की भी परिकल्पना शामिल है. जहां सभी क्षेत्रीय जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई एक छत के नीचे संभव हो पाएगी. 

जनजातीय भाषा एकडमी का होगा गठन, कोल्हान विवि में 5 जनजातीय भाषाओं के शिक्षकों की होगी नियुक्ति

हेमन्त सरकार में इस दिशा में एक और बड़ा फैसला लिया गया है. जनजातीय भाषाओं के लिए राज्य में अलग से जनजातीय भाषा एकडमी का गठन करने का फैसला लिया गया है. वहीं, चाईबासा स्थित कोल्हान विश्वविद्यालय में संताली, हो, कुडुख, कुरमाली तथा मुंडारी भाषा की पढ़ाई के लिए 159 शिक्षकों के पद सृजन के प्रस्ताव की स्वीकृति दे मुख्यमंत्री ने सकारात्मक सोच के साथ कदम बढ़ा दिया है.

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