झारखंड में स्थानीय भाषाओं का बढ़ा मान, रोजगार में युवाओं को मिली प्राथमिकता 

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स्थानीय भाषाओं का बढ़ा मान

रांची : राज्य में कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की 10वी, 12वी और स्नातक की परीक्षा संचालन संशोधन नियमावली 2021 के तहत जनजातीय, स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं को अग्रिम पंक्ति में लाकर हेमन्त सरकार ने झारखंड के लोगों का मान-सम्मान बढ़ाया है. जबकि पूर्व की सरकारों में इन भाषाओं को उपहास मात्र की वस्तु बनाकर रखा गया था. 

हाल ही में मंत्रिपरिषद की बैठक में मुहर लगने के बाद से इन नियमावलियों को लेकर काफी चर्चा भी हो रही है. नियमावली में मैट्रिक, इंटरमीडिएट और स्नातक स्तर की परीक्षा में पहली बार झारखंड की स्थानीय, क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं को प्राथमिकता मिली है. दरअसल झारखंड, जहां बड़ी संख्या में ऐसे युवा है जो अपने क्षेत्र में बोली जानेवाली जनजातीय, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषाओं में ही सहज है उन्हे इससे फायदा होगा. 

राज्य के जनजातीय और स्थानीय युवाओं की पहुंच अब होगी नौकरियों में 

झारखंड में अभी तक जितने भी प्रतियोगी परीक्षाएं होती थी उसमें झारखंड के युवा पिछड़ जाते थे. केवल हिंदी व अंग्रेजी भाषा में की परीक्षा होने के कारण बिहार, यूपी व अन्य राज्यों के युवा प्रवेश परीक्षा में बाज़ी मार ले जाते थे. और राज्य के युवा पिछड़ जाते थे. नतीजतन, राज्य के युवाओं का  नौकरियों में चयन बहुत कम हो पाता था. राज्य के युवाओं पर बिहार, यूपी और दूसरे राज्यों के अभ्यर्थी भारी पड़ जाते थे. जिसका राजनीतिक फायदा उठाते हुए पूर्व की भाजपा सरकार ने राज्य के युवाओं को अयोग्य करार दिया था.

मसलन, राज्य के युवाओं के भविष्य के मद्देनजर निश्चित रूप से हेमन्त सरकार द्वारा लिया गया यह ऐतिहासिक व साहासिक फैसला है. नयी नियमावली से अब साफ़ दिखता है कि राज्य का परिदृश्य बदलेगा. राज्य के जनजातीय और स्थानीय युवाओं की पहुंच नौकरियों में होगी. वहीं हिंदी और अंग्रेज़ी को सिर्फ़ क्वालिफ़ाइंग रखने से युवाओं का विषय ज्ञान भी जाँचा जा सकेगा.

हिंदी भाषा के हटाये जाने पर सवाल क्यों 

कुछ लोग हिंदी भाषा को हटाये जाने पर सवाल उठा रहे हैं. हवा-हवाई मौके के तलाश में रहने वाली भाजपा भी सरकार के निर्णय पर हमलावर है. भाजपा नेता इसे बेतुका निर्णय बता रहे हैं. उनका कहना है कि उनके समय में जो नियम थे उसमें झारखंड के युवाओं के लिए ज्यादा मौके थे. लेकिन, वह जवाब नहीं दे पाते हैं कि उनके समय में स्थानीय, क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं को हाशिये पर क्यूँ रखा गया था? क्यूँ उन विषयों में लाए गए अंक मेधा सूची में नहीं जोड़े जाते थे? ऐसे कई गंभीर सवाल हैं जो भाजपा को झारखंड की जनता को देना होगा.

यह भी ग़ौरतलब है कि झारखंड के युवाओं की वर्षों से मांग रही है कि शिक्षा से लेकर नियोजन तक यहाँ के युवाओं को प्राथमिकता मिले. इसे लेकर लगातार आंदोलन भी होते रहे हैं. इस मामले पर पूर्ववर्ती सरकारों ने ढिंढोरा तो खूब पीटा पर किसी ने आगे बढाने की कोशिश नहीं की. दरअसल, उन्होंने झारखंड के लोगों के भावनाओं को लेकर राजनीति तो खूब की पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया. इसकी एक वजह यह भी रही कि झारखंड के युवा उनकी प्राथमिकता में थे.

नए परिदृश्य में सवाल हो सकता है – क्या यह नियमावली झारखंड के युवाओं को उनका हक़ दिला पायेगी? यह तो समय बतायेगा. मगर यह उम्मीद ज़रूर दिखती है कि सरकार के मौजूदा फैसले से जहां एक तरफ झारखंड की स्थानीय, क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं को सम्मान मिलेगा. वहीं इन भाषों को बालने वाले युवाओं को नौकरी के मौके.

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