हेमन्त सरकार में जनजातीय भाषाओं के विकास के खुले द्वार, संविधान में शामिल कराने की मांग सहित पहली बार रोज़गार और पढ़ाई में मिला स्थान

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जनजातीय भाषाओं के विकास के खुले द्वार

झारखण्ड में मुख्यमंत्री के प्रयास से पहली बार हुआ संभव – जहाँ जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई करने से बड़े पैमाने पर मिल सकेगा रोजगार 

सरकारी स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर संथाली, हो, मुंडारी, कुड़ुख, करमाली और खोरठा भाषाओं को किया गया अनिवार्य

रांची : जनजातीय बहुल झारखंड की अपनी एक अलग पहचान है. यहां पर जितनी संख्या में जनजातीय भाषाएं बोली जाती है, शायद ही देश की किसी अन्य राज्य में बोली जाती है. इसमें संताली, मुण्डारी, कुडुख, कुरमाली, खोरठा, हो जैसी भाषाएं शामिल हैं. झारखंड बनने के बाद सरकारी नौकरियों में एवं सरकारी विद्यालयों में ऐसी भाषाओं की पढ़ाई को स्थान दिया जाता था. लेकिन यह भी कटु सत्य है कि यह केवल सीमित स्तर पर था. दरअसल प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक शासन करने वाली भाजपा ने भोले-भाले आदिवासियों को छलावा में रखा कि वह उनकी भाषाओं को हर स्तर पर प्राथमिकता देगी. 

भाजपा का उद्देश्य था, राज्य में बाहरी लोगों को ज्यादा रोजगार उपलब्ध करना

भाजपा के इस छलावा का उद्देश्य यह था कि राज्य के बाहरी लोगों को रोजगार में प्राथमिकता मिले. लेकिन जब से राज्य की बागडोर हेमन्त  सोरेन ने संभाली हैं, तब से जनजातीय भाषाओं को सही मायने में  तरजीह देने का काम शुरू हुआ है. इसकी शुरूआत तो उस पत्र से ही हो गया था, जो मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखा था. अब स्थानीय नीति, रोजगार और पढ़ाई में भी जनजातीय भाषाओं को तरजीह देकर हेमन्त  सोरेन ने अपनी मंशा साफ कर दी है.

मुंडारी, कुड़ुख एवं उरांव भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की हुई मांग

सर्वविदित है कि संविधान के 92वें संशोधन (2003) में राज्य की एक मात्र जनजातीय भाषा संताली को संविधान की आठवीं अनुसूची में जोड़ा गया था. विधानसभा चुनाव के दौरान सीएम ने कहा था कि उनकी सरकार हो भाषा को भी शामिल कराने का प्रयास करेगी. सत्ता में आने के बाद सीएम ने न केवल ‘हो’ बल्कि अन्य जनजातीय भाषाओं को संविधान में शामिल कराने की मांग की. .

इसके लिए अगस्त 2020 को मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा. पत्र में सीएम ने गृहमंत्री अमित शाह से आग्रह करते हुए कहा, कि झारखंड की हो के अतिरिक्त मुंडारी, कुड़ुख जैसी जनजातीय भाषा को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करें. इन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में अगर शामिल किया जाएगा तो विकास का मार्ग और सरल होगा. 

जनजातीय भाषाओं को सरकारी रोजगार और स्कूलों में पढ़ाई में तरजीह देने का हुआ काम शुरू

इसके साथ ही अब मुख्यमंत्री ने सरकारी रोजगार और सरकारी स्कूलों में स्थानीय स्तर पर पढ़ाई के लिए जनजातीय भाषाओं को तरजीह देने का काम शुरू किया. बीते दिनों अपनी नयी स्थानीय नीति में हेमन्त सरकार ने जनजातीय भाषाओं को सरकारी नौकरी का प्रमुख आधार बनाकर झारखंडियों के लिए रोजगार का द्वार खोल दिया है. 

सोमवार को मुख्यमंत्री ने जनजातीय भाषाओं को तरजीह देने के लिए दो अहम फैसला किये :

  • पहले निर्णय के तहत चाईबासा स्थित कोल्हान विश्वविद्यालय में संथाली, हो, कुडुख, कुरमाली तथा मुंडारी भाषा की पढ़ाई के लिए शिक्षकों का पद सृजित किया गया है. पदों की संख्या 159 है. पद सृजित के प्रस्ताव की सीएम ने अपनी स्वीकृति दे दी. विश्वविद्यालय अंतर्गत संचालित 14 महाविद्यालयों में 135 और स्नातकोत्तर केंद्रों में 24 शिक्षकों के पद सृजित किये जाएंगे. सीएम के मुताबिक राज्य के विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा की पढ़ाई सुनिश्चित करने की दिशा में उठाया गया कदम है. 
  • दूसरे निर्णय के तहत अब सरकारी स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं को अनिवार्य करने की भी मंजूरी मुख्यमंत्री ने दी है. इन भाषाओं में संथाली, हो, मुंडारी, कुड़ुख, कुरमाली और खोरठा शामिल हैं.

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