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सरना धर्म कोड

हेमंत सरकार के प्रयास से राज्य गठन के बाद दूसरी बार लाखों आदिवासियों ने मनायी खुशी

70 सालों तक रहा सरना आदिवासी धर्म कोड , लेकिन फिर हटा दिया गया, 60सालों से हो रही है मांग

राज्य गठन के बाद पहली बार किसी सरकार के विधायकों ने अपने मुख्यमंत्री से की मांग

रांची।* झारखंड राज्य बने हुए आज 20 साल पूरे होने को है। झारखंडी आदिवासी/मूलवासी के हितों के लिए इस राज्य का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ था। जब राज्य गठन हुआ था, तो उस दौरान राज्य के लाखों झारखंडी आदिवासी-मूलवासी लोगों ने खुशी मनायी थी। उस खुशी के बाद शायद झारखंडी जनता हंसना भूल गयी थी। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले 20 सालों से सत्ता में बैठी बीजेपी ने केवल आदिवासियों के नाम पर राजनीति ही किया। लेकिन झारखंडी जनमानस के हितों को टारगेट में रख काम कर रही हेमंत सरकार का ही यह प्रयास है कि करीब 20 साल बाद उन्हें दोबारा हंसने का मौका मिला है। दरअसल बुधवार को लंबे वर्षों से अलग सरना आदिवासी धर्म कोड की मांग को लेकर संघर्षरत आदिवासी समाज के हित में हेमंत सरकार ने बड़ा फैसला लिया। सरकार ने सरना आदिवासी धर्मकोड लागू करने के लिए विधानसभा के विशेष सत्र बुलाकर एक प्रस्ताव पास कर केंद्र को भेज दिया है। 

जानिये क्या है सरना धर्म कोड, क्यों राजनीति करती रही बीजेपी

पहले तो आपको बताते है कि अलग सरना धर्म कोड क्या है। हर 10 साल में होने वाली जनगणना के फॉर्म में एक धर्म का कॉलम भरा जाता है। वर्तमान में इस फॉर्म में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध सहित जैन धर्मो को 1 से 6 तक के कोड नंबर दिए गए हैं। अभी ज्यादातर गैर ईसाई आदिवासी के पास ऑफशन नहीं होने के कारण वे हिदू धर्म का कॉलम भरते हैं। लेकिन, झारखंड समेत कई राज्यों के आदिवासी वर्ग अपने आप को हिंदू नहीं मानता है। वे चाहते हैं कि जनगणना फॉर्म में उनके लिए धर्म का अलग कॉलम यानी कोड हो।

झारखंड के आदिवासी वर्ग का मानना हैं कि उनका धर्म ‘सरना’ है, इसलिए जनगणना फॉर्म में अलग से सरना धर्म का कोड होना चाहिए। हालांकि राज्य के लाखों आदिवासियों को जनगणना में अलग से धर्म कोड का प्रस्ताव को केंद्र सरकार पहले ही ठुकरा चुकी है। इस बात को लेकर कमोवेश लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति सत्ता में बैठी बीजेपी सरकार ने इस और विशेष ध्यान नहीं दिया। हां, उन्होंने इस पर अपनी राजनीति रोटी जरूर सेंकी। किसी भी चुनाव के पूर्व वोट मांगने की एवज में उन्होंने सरना धर्म कोड प्रस्ताव केंद्र को भेजने की बात की, लेकिन किया कभी नहीं। पहली बार हेमंत सरकार ने ऐसा कर राज्य के इन आदिवासियों को दोबारा खुशी मानने का मौका दिया। 

पहली बार किसी पार्टी के विधायकों ने अपने मुख्यमंत्री से की मांग  

झारखंडी आदिवासियों के हित के लिए कुछ दिन पहले ही सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने सीएम हेमंत सोरेन से मुलाकात की थी। प्रतिनिधिमंडल में कुल 9 नेता शामिल थे। सीएम से मुलाकात के दौरान इन्होंने सरना धर्म कोड बिल पारित कर केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने की मांग को लेकर एक ज्ञापन भी सौंपा था। राज्य गठन के बाद ऐसा पहली बार हुआ था कि जब किसी पार्टी के विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने अपने मुख्यमंत्री से इस प्रस्ताव की मांग की थी। 

करीब 60 सालों से सरना कोड की होती रही है मांग

लाखों आदिवासियों के द्वारा सरना कोड की मांग कोई पहली बार नहीं हुआ है। यह मांग करीब 60 सालों से हो रही है। जेएमएम नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने सीएम से मुलाकात के दौरान कहा था कि 1871 से 1951 तक की जनगणना में आदिवासियों का अलग धर्म कोड था। लेकिन 1961-62 के जनगणना प्रपत्र से आदिवासी धर्म कोड को हटा दिया गया। इतना ही नहीं 2011 के जनगणना में देश के 21 राज्यों के रहने वाले लगभग 50 लाख आदिवासियों ने सरना धर्म कोड लिखा था। ऐसे में 2021 के जनगणना में भी सरना धर्म कोड दर्ज करने का प्रावधान किया जाए।

कोरोना संक्रमण को देख पूरी सावधानी के साथ राज्यभर में मना जश्न

सरना आदिवासी धर्मकोड पारित होने की खुशी में आदिवासी संगठनों ने राजधानी सहित राज्य भर में जश्न मनाया। इस दौरान कई आदिवासी संगठनों ने जुलूस निकाला और खूब आतिशबाजी की। इस दौरान इन भोले-भाले आदिवासियों ने भी कोरोना संक्रमण से बचाव को लेकर पूरी ऐहियातन बरती। सभी लोग कोरोना को नजर में रखते हुए मास्क पहन कर इस जुलूस में शामिल हुए और जश्न मनाया।

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