झारखंडी 1941 [‘ओलचिकी’ लिपि के आविष्कार काल] से अपनी भाषा के लिए सजग 

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1941 'ओलचिकी' लिपि के आविष्कार काल

झारखण्ड क्षेत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक दोहन के मद्देनजर असंतोष का घाव बहुत ( ‘ओलचिकी’ लिपि के आविष्कार काल ) पुराना है. बाहरियों के हित में संघीय ढांचा के अंतर्गत आने वाली तमाम अधिकारों का मौजूदा सरकार मान रख रही है. ऐसे में बाहरियों को केन्द्रीय दलों के उकसावे में न आते हुए झारखंडियों के अधिकारों का मान रखना चाहिए और मैत्री के नये अध्याय की शुरुआत करना चाहिए…

झारखंड आंदोलन भारत के छोटा नागपुर पठार और इसके आसपास के क्षेत्र में शुरू होने वाल जन आन्दोलन था. यह इस क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा देने की माँग के साथ शुरू हुआ था. इस आन्दोलन का कैनवास सामाजिक, सांस्क्रतिक, राजनीतिक व आर्थिक था. इसकी शुरुआत 20वीं सदी की में हुई. जिसके अगुवा कई महापुरुष रहे और अंततः दिशोम गुरु शिबू सोरेन के अगुवाई में बिहार पुनर्गठन बिल 2000 में पास होने के बाद इसे अलग राज्य, झारखण्ड का दर्जा प्राप्त हुआ.

झारखंड का अर्थ है “वन क्षेत्र”, झारखंड वनों से आच्छादित यह पठार क्षेत्र गंगा के मैदानी हिस्से के दक्षिण में स्थित है. झारखंड क्षेत्र में पुराने बिहार के दक्षिणी हिस्से, छत्तीसगढ, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के कुछ जिले शामिल हैं. इस क्षेत्र में नागपुरी, कुड़माली भाषा के आलावा मुंडा, हो, संताली, खोरठा व बंगला भाषा बोली जाती रही है. जो झारखण्ड आन्दोलन की भाषा भी रही. और आन्दोलन के सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकार भाषा से भी रही है. और आदिवासी-मूलवासी, तमाम झारखंडी अपनी भाषा को लेकर ओलचिकी’ लिपि के आविष्कार काल से मौजूदा दौर तक में सजग हैं.

 

1941, महान गुरु रघुनाथ मुर्मू द्वारा ‘ओलचिकी’ (संताली भाषा की लिपि) का आविष्कार के दौर से ही आदिवासी-मूलवासी अपनी भाषा को लेकर सजग 

इस आशय को समझने के लिए हमें 1941 में दौर में जाना होगा. जब महान गुरु रघुनाथ मुर्मू द्वारा ‘ओलचिकी’ (ओल लिपि) का अविष्कार किया गया. उस गुरु गोमके ने 1941 में कहा था कि -“अगर आप अपनी भाषा-संस्कृति, लिपि और धर्म भूल जायेंगे तो आपका अस्तित्व भी ख़त्म हो जाएगा.” 

रघुनाथ मुर्मू को मयूरभंज आदिवासी महासभा ने गुरु गोमके की उपाधि दी. स्वयं जयपाल सिंह मुण्डा ने उन्हें नृवैज्ञानिक और पंडित कहा. चारूलाल मुखर्जी ने रघुनाथ मुर्मू जी को संतालियों के धार्मिक नेता कहा. प्रो. मार्टिन उरांव ने उन्हें संतालियों का महान गुरु कह कर संबोधित किया. मसलन, जिस राज्य में गुरु गोमके द्वारा भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक एकता के लिए ‘ओलचिकी लिपि के माध्यम से चलाया गया आन्दोलन ऐतिहासिक माना जाता हो. वहां अन्य राज्य के भाषा को जबरन थोपा जाना कतई उचित नहीं माना जा सकता.

1845 में ईसाई मिशनरियों का आगमन के बाद भी  अपनी पारंपरिक – सामाजिक – धार्मिक आस्थाएँ कभी नहीं छोड़ी

ज्ञात हो 1845 में पहली बार ईसाई मिशनरियों का आगमन से इस क्षेत्र में हुआ. जिससे सांस्कृतिक परिवर्तन और उथल-पुथल भी मचा. आदिवासी समुदाय का एक हिस्सा ईसाईयत की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ. ईसाई स्कूल व अस्पताल खुले, लेकिन इसके बावज़ूद आदिवासियों ने अपनी पारंपरिक-सामाजिक-धार्मिक आस्थाएँ कभी नहीं छोड़ी. अपनी प्राकृत मान्यता, विचारधारा को कायम रखी, ये द्वंद हमेशा कायम रहा. ऐसे में इतने बलिदानों के बाद झारखंड पर अन्य राज्य के भाषा-बोलियों को थोपा जाना एक प्रकार का अन्याय ही तो है.

क्षेत्र में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व आर्थिक दोहन के मद्देनजर लोगों में असंतोष का घाव बहुत पुराना है 

1947 में आज़ादी मिलने के बाद इस क्षेत्र में व्यवस्थित रूप से औद्योगिक विकास पर बल दिया गया. खनिजों की खुदाई एक जरूरी हिस्सा मानी गयी. भारत सरकार की नीतियों के तहत स्थानीयों की जमीनें अनुचित मुआवज़े के अन्य हाथों में जाने लगीं. औद्योगीकरण का नतीजा हुआ कि इस क्षेत्र में बाहरी लोगों का दखल और भी बढ गया. बड़ी सँख्या में लोग कारखानों में काम के लिये इस इस क्षेत्र में आने लगे. सामाजिक, सांस्क्रतिक, राजनीतिक व आर्थिक दोहन के मद्देनजर क्षेत्र में स्थानीय लोगों में असंतोष की भावना उभरने लगी. उन्हें साफ़ दिखने लगा कि उनके साथ नौकरियों से लेकर तमाम क्षेत्रों में भेद-भाव हो रहा है. 1971 में बनी राष्ट्रीय खनन नीति इसी का परिणाम है.

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण झारखंड ने भाजपा की पिछली डबल इंजन सरकार में देखा. जहाँ रघुवर सरकार में नौकरियां तो बहुत कम निकाली, जो थोड़े बहुत निकली उसे भी बाहरियों को दे दिया गया. उस सरकार की तमाम नीतियां झारखंड के संसाधनों की लूट की कहानी कहती है. संघ की विचारधारा व बाहरियों के वोट बैंक के आसरे अस्तित्व में आयी भाजपा की लूट संस्कृति के लिए बाहरी भाषा को झारखंड में मुद्दा बनाना, उसके के लिए फायदेमंद है. वह अपनी राजनीति के लिए बाहरियों व झारखंडियों के बीच कभी न बुझने वाली आग लगाना चाहती है. ताकि उसे राजनीतिक लाभ मिलता रहे.

बाहरियों को राष्ट्रीय पार्टियों के उकसावे में ना आते हुए झारखंडियों के अधिकारों का मान रखे और मैत्री के नये अध्याय की शुरुआत करे 

मसलन, जब बिहार के क्षेत्रीय भाषाओँ के संरक्षण के लिए बिहार राज्य मौजूद है. ऐसे में वहां के क्षेत्रीय भाषाओँ के लिए झारखंड में उसका सवाल उठाना दादागिरी ही मानी जा सकती है. ऐसे में बाहरियों को भी समझना चाहिए कि जब मौजूदा सरकार की नीति संघीय ढांचा के तहत आने वाली उसकी तमाम अधिकारों का मान रख रही है. तो भाजपा व अन्य केन्द्रीय राजनीतिक दलों के उकसावे में आकर लोभी होने का मुजाहिरा क्यों कर रहे है? उन्हें चाहिए कि सरकार की नीतियों का आदर करे और झारखंडियों के साथ मैत्री के नये अध्याय की शुरुआत करे…

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