बिहार की भाषाओं को लेकर जब महाराष्ट्र, बंगाल, तमिलनाडु में सवाल नहीं तो झारखण्ड में क्यों?

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बिहार की भाषाओं को लेकर जब महाराष्ट्र, बंगाल, तमिलनाडु में सवाल नहीं तो झारखण्ड में क्यों?

झारखण्ड आन्दोलन का उद्देश्य इस क्षेत्र के वंचित-दमित को उसके क्षेत्रीय भाषाओं के साथ अधिकार दिलाना रहा है. ऐसे में बिहारी क्षेत्रीय भाषाओं को झारखंड में स्थान मिलना उस आन्दोलन के साथ नाइंसाफी होगी

बिहार की भाषाओं को लेकर सवाल  – यू हेव स्पोकन अबाउट इन्करेजिंग आदिवासी लैंग्वेजेज बट यू हेव लेफ्ट आउट भोजपुरी एंड मगही? एंड योर कोलिजन पार्टनर कांग्रेस इज क्वाईट अपसेट? 

आपने आदिवासी भाषाओं को प्रोत्साहित करने की बात की है लेकिन भोजपुरी और मगही को छोड़ दिया है? और आपका कोलिजन पार्टनर कांग्रेस मुद्दे पर अपसेट है?

हिन्दुस्तान टाइम्स की पत्रकार कुमकुम चड्डा के सवाल ने कुरेदा झारखण्ड आन्दोलन के पीछे की टीस. खुद की आपबीती… आदिवासी-मूलवासी समुदाय का दर्द, लगभग हर त्रासदी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आँखों के सामने रेंगने लगी. झारखण्ड की मौजूदा स्थिति सिखाता है कि कोई भी व्यवस्था सनातनी नहीं होती. शोषित समाज बदलता है. मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन का वक्तव्य, उस पत्रकार को दिया गया जवाब इसका जीता जागता उदाहरण हो सकता है. जिस झारखंड आन्दोलन के दम पर हम आज अलग झारखंड में सांस ल रहे हैं. उस आन्दोलन के उपज के पीछे, शोषण की त्रासदी रही है. जिसकी भाषा बिहार की क्षेत्रीय भाषा एक पहचान के तौर पर रही है. 

झारखण्ड में पुलिसिया रौब को बिहार की क्षेत्रीय भाषा की गाली ही सार्थक बनाती है

झारखंड में आज भी जहाँ पुलिसिया रौब को बिहार की क्षेत्रीय भाषाओं की गाली ही सार्थक बनाती हो. वहां आन्दोलन के दौर में इस तीर की तीक्ष्णता कितनी रही होगी अंदाजा लगाया जा सकता है. वाक्या- 27 नवम्बर, 1957, क्षेत्र धान कटनी में व्यस्त था, सोबरन मांझी (शिबू सोरेन के पिता) भी अपने खेत में धान काटने पहुंचे. अबकी बार मन बना हुए थे कि धान बेचकर वह साहूकार से ज़मीन छुड़ा लेंगे. लेकिन बरलंगा के साहूकार ने औरंगाबाद से पहलवान बुलाकर रात के अँधेरे में उनकी हत्या कर गुरूजी को अनाथ कर दिया. न जाने कितनी रातें, कितने पहर उस खेत की मेड पर बुद्ध की भाँति समाधि में बिता दिए. 

ऐसी ही कितनी न जाने बेरहम अतीत की यादें झारखंडियों से जुडी है. सन् 1987 में जमशेदपुर के बिष्टुपुर, चमरिया गेस्ट हाउस के सीढ़ियों पर गोली मारकर निर्मल महतो (निर्मल दा) की हत्या कर दी गयी. दिशोम गुरु शिबू सोरेन और निर्मल महतो ने एकता के साथ झारखण्ड आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे. आदिवासी- कुर्मी मिलकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ रहे थे और निर्मल दा ने अपना सर्वस्व आन्दोलन पर न्यौछावर कर दिया था. आज की पीढ़ी भले ही उन्हें ठीक से न जानती हो, लेकिन आंदोलन के दिनों के उनके मित्र और झारखंडी जनता न केवल आज भी उन्हें ह्रदय से याद करते हैं, बल्कि उस त्रासदी को भी याद करते हैं. 

विस्थापन झारखंडी आदिवासियों-मूलवासियों का पर्यावाची शब्द

दरअसल, झारखंड आन्दोलन का मूल कारण बिहार का क्षेत्रीय भेदभाव रही है. पूर्व बिहार के नीतिगत ढाँचों में नवउदारवाद के बाद आये बदलाव से, मौजूदा झारखंड के क्षेत्रों में  प्रायोजित हिंसा बढ़ी. जिससे आदिवासी-मूलवासी आबादी ग़रीबी के प्रभाव में रसातलीय जीवन जीने को अभिशप्त हुए. यहाँ के जल, जंगल, जमीन, नदियों, चारागाह, गाँव के तालाब और साझा सम्पत्ति वाले संसाधनों पर जो क्षेत्रियों के अधिकार थे. वह विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) और खनन, औद्योगिक विकास, सूचना प्रौद्योगिकी पार्कों आदि से सम्बन्धित विकास परियोजनाओं की आड़ में लगातार निशाने पर रहे. जिससे इस इलाके में बड़े पैमाने पर ज़मीन अधिग्रहण के लिए लोग विस्थापित हुए. और यहीं से विस्थापन झारखंडी आदिवासियों-मूलवासियों का पर्यावाची शब्द बन गया है.

झारखण्ड आन्दोलन का उद्देश्य इस क्षेत्र के वंचित-दमित को उसके क्षेत्रीय भाषा के साथ अधिकार दिलाना

मसलन, अलग झारखंड आन्दोलन झारखंड में ठीक वैसा ही अस्तित्व रखता जैसे देश में स्वतंत्रता आन्दोलन. इस आन्दोलन में भी अंग्रेजी-हिंदी की भांति झारखंडी व बिहारी भाषाओँ के बीच विद्वेष का भाव रहा है. झारखण्ड आन्दोलन का उद्देश्य इस क्षेत्र के वंचित-दमित को उसके क्षेत्रीय भाषा के साथ अधिकार दिलाना रहा. ऐसे में बिहारी क्षेत्रीय भाषा को झारखंड में स्थान मिलना उस आन्दोलन के साथ नाइंसाफी होती.

ऐसे भी बिहार के क्षेत्रीय भाषाओँ को संरक्षण देने के लिए ऐतिहासिक राज्य बिहार मौजूद है. तो फिर झारखंड में उसे क्यों क्षेत्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए. नैतिकता के तौर पर भी यह सही नहीं हो सकता. महाराष्ट्र में भी मराठी मानुष के पीछे की भी यही धरना है. जब महाराष्ट्र, बंगाल, तमिलनाडु में बिहार के क्षेत्रीय भाषा को लेकर सवाल नहीं तो फिर झारखण्ड में क्यों? जबकि वहां भी संख्या में बिहारी बसते हैं. रही बात बंगाली भाषा की तो झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्र में मूलवासी-आदिवासियों द्वारा बंगला भाषा का उपयोग होता है. 

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