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 झारखंडी बेरोजगार युवाओं की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुवर दास
 झारखंडी बेरोजगार युवाओं की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुवर दास

झारखंडी बेरोजगार युवा में नौकरी पाने की योग्यता नहीं है : मुख्यमंत्री रघुवर दास

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 झारखंडी बेरोजगार युवाओं की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं प्रदेश के मुख्यमंत्री रघुवर दास

मोदी जी के साथ-साथ झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास जी ने बेरोज़गारी से लड़ने के नाम पर स्किल इण्डिया, स्टार्टअप इण्डिया, वोकेशनल ट्रेनिग जैसी तमाम योजनाओं के विज्ञापन पर जमकर पैसा लुटाया। साथ ही खुद मियां-मिट्ठू की भूमिका निभाते हुए अपनी सरकार की कई उपलब्धियों में एक के रूप में शंखनाद करने का प्रयास के बावजूद परिणाम वही ढाक के तीन पात साबित हुआ। अर्थात पानी की तरह पैसा बहाने के बावजूद अबतक ये यहाँ के युवा को अपने मुताबिक योग्यता के सांचे में नहीं ढाल सके। मतलब बेरोजगारों की संख्या तो एक तरफ बढ़ी लेकिन वे तमाम झारखंडी बेरोजगार स्किल्ड ( योग्यता ) नहीं हुए। ऐसे शब्दों का प्रयोग हमें इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री जी को राज्य के रिक्त पदों को भरने के लिए स्किल्ड उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। इनका यह बेशर्मी से कहना कि झारखंड में रोजगार की कमी नहीं, बहाली के लिए यहाँ के उम्मीदवारों में योग्यता नहीं हैं! कहीं-न-कहीं खुद को ही कठघरे में खड़ा करने के बराबर है। 

मुख्यमंत्री रघुवर दास जी खुद की कारिस्तानियों की समीक्षा करने के बजाय अपनी नाकामियों का ठीकरा अब यहाँ के युवाओं के सर मढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री जी का तो मतलब साफ़ है क्यूंकि ये आज स्कूल बंद कर रहे है और कल झारखण्ड में योग्य अभ्यर्थी तलाशेंगे। यह बयान देने से ज्यादा अच्छा होता कि जनता को यह बताते कि राज्य में चार सालो से झारखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षा आखिर क्यों झूली पड़ी है! या फिर यही बता देते कि यहाँ की प्रतिभा ( योग्यता  ) मजबूरीवश बाहर जा कर रोजगार कैसे प्राप्त कर लेते हैं! यह तो ठीक मेमने और शेर वाली कहानी हो गयी जिसमें  अकेले मेमने को पानी पीते देख शेर के मुँह में पानी आ जाता है। फिर शेर कई प्रकार से उस पर झूठा आरोप लगा अंत में अपना निवाला बना ही लेता है।

बहरहाल, बेरोज़गारी महज़ एक मानवीय समस्या नहीं है, जिसका सामना बेरोज़गारों को करना पड़ता है। यह मौजूदा व्यवस्था के उत्पादन बढ़ाने की अक्षमता को व्यक्त करता है। साथ ही प्रदेश का मुखिया के लिए इन दलीलों की आड़ में बाहरियों को थाली में सजाकर नौकरियां परोसने के साजिश को छुपाना भर हो सकता है। बेअसर होती एंटीबायोटिक दवाईयों की तरह इस सरकार की भी सारी दलीलें अब जनता के समक्ष बेअसर हो गयी है। अब यहाँ की  जनता को बेरोजगारी के असली कारक को तलाशते हुए इस ‘थोथा चना बाजे घना’ वाली सरकार को झारखण्ड की धरती से उखाड़ फ़ेंक बताना होगा कि यहाँ के झारखंडी बेरोजगार युवाओं के साथ-साथ तमाम जनता कितनी योग्य है।  

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