झारखण्ड आंदोलन के संघर्ष के मर्म को समझे बिना मुख्यमन्त्री के बयान को नहीं समझा जा सकता

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झारखण्ड आंदोलन के संघर्ष के मर्म

मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन के एक मीडिया हाउस को दिए साक्षात्कार के बाद उनके कुछ वक्तव्यों को लेकर राजनीति गर्म है. दरअसल साक्षात्कार के दौरान उन्हें घेरने के लिए भोजपुरी, मगही जैसी भाषाओं को हटाने और इस पर सहयोगी पार्टियों की नाराजगी का सवाल उठाया गया. मुख्यमन्त्री ने कहा कि जब झारखण्ड आंदोलन के तहत अलग राज्य की लड़ाई चल रही थी तो उसमें आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के स्वर मुखर थें. 

हेमन्त सोरेन ने कहा कि झारखण्ड आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों के सीने पर पैर रखकर उन बाहरी भाषाओं में गालियां दी जाती थी. दूसरी बात दोनों बिहार की भाषाएं हैं झारखंड की नहीं. फिर झारखंड का बिहारीकरण क्यों? मुख्यमन्त्री के इस वक्तव्य को तोड़मरोड़कर और दूसरे संदर्भों में प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है. पर हकीकत इससे अलग है.

झारखंड सिर्फ क्षेत्र की नहीं बल्कि भाषा संस्कृति मान सम्मान की भी लड़ाई थी

बेहद ईमानदारी से मुख्यमन्त्री ने जिन तथ्यों की ओर इशारा किया उसे समझने की जरूरत है. झारखण्ड आंदोलन में झारखंड के आदिवासी और मूलवासी लोगों ने दशकों तक लंबा संघर्ष किया था. यह संघर्ष सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र के लिए नहीं था बल्कि अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने अस्तित्व, जीने के तरीके और मान सम्मान की लड़ाई भी थी. दशकों तक एक क्षेत्र विशेष के लोगों के साथ जो ऐतिहासिक अन्याय होता रहा उसके खिलाफ थी यह अलग राज्य की लड़ाई. 

इस आंदोलन में हजारों कुर्बानियां और कई दशक तक पीढ़ियों के संघर्ष के बाद यह इलाका अलग झारखंड राज्य बना. अलग राज्य के आंदोलन में मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन के पिता दिशोम गुरू शिबू सोरेन का संघर्ष और भूमिका महत्वपूर्ण रही थी. मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन उस आंदोलन, उन कुर्बानियों की तपिश को महसूस करते हुए बड़े हुए हैं, इसलिए जब वे झारखंड की बात करते है तो उनके शब्दों में छल-कपट या अवसरवादी राजनीति की बात नहीं झलकती है. उनके मुंह से वहीं निकलता है जिसे वो अनुभव करते रहे हैं.

मुख्यमन्त्री का बयान झारखंड की जनभावनाओं के अनुरूप

तो झारखंडी भाषाओं, यहां के लोगों और झारखंड की जनभावनाओं के अनुरूप मुख्यमन्त्री ने कहा कि यहां जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता दी गई है. मुख्यमन्त्री ने यह भी कहा कि हम उन भाषाओं (भोजपुरी मगही) को इग्नोर (उपेक्षा) नहीं कर रहे हैं. हम उन्हें भी अपनाने को तैयार हैं उनका इशारा उन क्षेत्रों की ओर था जहां ये भाषाएं बोली जाती है. मुख्यमन्त्री ने यह भी कहा कि शेर और बकरी को एक ही घाट पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इससे फिर बकरी सुरक्षित नहीं रहेगी. इस बात के मर्म को अगर समझा जाये तभी मुख्यमन्त्री के बयान को समझा जा सकता है. उन्होंने बिहार या बिहारियों के खिलाफ कोई बात नहीं कही है.

अंत में यह जानना-समझना जरूरी है कि जब भाजपा की सरकार थी तो उन्होंने भी भोजपुरी या मगही भाषाओं को नियुक्ति परीक्षाओं के लिए शामिल नहीं किया था. इसलिए मुख्यमन्त्री को इस मामले में सिर्फ ओछी राजनीति के लिए आलोचना करना सही नहीं है.

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