झारखण्ड में हेमन्त सोरेन के कार्यकाल में क्षेत्रीय भाषाएं ले रही है नयी अंगड़ाई 

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झारखण्ड मे क्षेत्रीय भाषाएं ले रही है नयी अंगड़ाई 

झारखण्ड एक जनजातीय बहुल राज्य है. यहां बसने वाले 32 जनजातीयों की अपनी भाषाएं है. इसके अलावा राज्य में कई क्षेत्रीय भाषाएं नागपुरी, पंचपरगनिया, कुरमाली व खोरठा भाषा भी अपने अस्तित्व के साथ मौजूद है. लेकिन भाषाओं के संरक्षण के मद्देनजर पूर्ववर्ती सरकारों की अनदेखी त्रासदीय सच रही है. भाजपा के 5 वर्ष के शासन के दौर में भी, रघुवर दास की सोच स्थानीय भाषा के मद्देनजर कभी मैथली भाषा के आगे भोजपुरी तक भी नहीं बढ़ पायी. लेकिन मौजूदा हेमंत सरकार में क्षेत्रीय भाषाओँ ने नयी अंगडाई भरी है. 

ज्ञात हो, हेमंत सोरेन सरकार शुरूआती काल से ही जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, उसके संवर्धन को लेकर कदम उठाए जाने लगे थे. झारखंडी मानसिकता का सत्ता पर काबिज होते ही साफ़ हो गया कि हेमन्त सोरेन के कार्यकाल में क्षेत्रीय भाषाओं को संरक्षण मिलेगा. कई विशेष पहल जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं के लिए अलग-अलग विभाग का तैयार मसौदा इसके सबूत भी देने लगे थे. 

क्षेत्रीय भाषा को दरकिनार कर रघुवर दास ने झारखण्ड के प्रतिभावान अभ्यर्थियों को कहा था अयोग्य

छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री रघुवर दास बखान करते नहीं थकते थे. उनके द्वारा बनाई गई विशेष नीति से आदिवासी-मूलवासियों के लिए नौकरियों के द्वार खुलेगी. लेकिन सच्चाई से ठीक उलट झारखण्ड के संसाधनों पर धीरे-धीरे बाहरी हावी होते गए. देखते ही देखते प्लस टू (इंटरमीडिएट) विद्यालयों की शिक्षक नियुक्ति में 75% राज्य के बाहर के अभ्यर्थियों का दबदबा देखा गया. ऐसा प्रतीत होने लगा था कि प्रवासी मुख्यमंत्री का एक मात्र उद्देश्य था कि राज्य में बाहरियों को झारखण्ड में स्थापित करना. ताकि वोट बैंक में इजाफा हो सके. मसलन, भाजपा अपने एजेंडे को पूर्ण करने के लिए बेशर्मी से झारखण्ड के प्रतिभावान अभ्यर्थियों की योग्यता पर सवाल खड़े किए.

मुद्दे की जवाबदेही पर पूर्व शिक्षा मंत्री की दलीलें भी विवादस्पद रही थी 

झारखण्ड की पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ नीरा यादव ने स्पष्ट कहा कि जनरल केटेगरी में सरकार बाहरियों की नियुक्ति को नहीं रोक सकती हैं. हमारे राज्य के अभ्यर्थी भी झारखण्ड से बाहर नियोजित किये जाते हैं. स्थानीय भाषा की अनदेखी के तहत पूर्व शिक्षामंत्री डॉ नीरा यादव, मंत्री महोदया यह कहने से नहीं चुकी थी कि राज्य में योग्य अभ्यर्थियों की कमी के कारण, शिक्षक नियुक्ति में आधे से ज्यादा स्थान रिक्त रह गये थे.

क्षेत्रीय भाषाएं मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के ईमानदार नीयत के तले नयी अंगडाई ली  

झारखण्ड के लिए खुशखबरी है कि हेमंत सरकार में क्षेत्रीय भाषाओँ ने नयी अंगडाई ली है. अब जेएसएससी की परीक्षाओं में झारखण्ड की 12 स्थानीय भाषाओं में से किसी एक में ही पास करना अनिवार्य होगा. ज्ञात हो, पहले जेएसएससी में भाषा ज्ञान के अंतर्गत हिंदी और अंग्रेजी में क्वालीफाइंग मार्क्स लाना होता था. अलग-अलग 30 फीसदी अंक क्वालीफाइंग मार्क्स निर्धारित थे. इसमें संशोधन कर अब उत्तीर्ण होने के लिए हिंदी और अंग्रेजी भाषा में प्राप्त अंकों को जोड़कर 30 प्रतिशत अंक प्राप्त करना होगा. लेकिन, इस पत्र में प्राप्त अंक को मेधा सूची निर्धारण के लिए नहीं जोड़ा जाएगा.

हेमंत सरकार ने चिन्हित क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं में संशोधन करते हुए राज्य स्तरीय पदों के लिए 12 भाषायें निर्धारित की गई हैं. इनमें उर्दू, संथाली, बंगला, मुंडारी, हो, खड़िया, कुड़ुख, खोरठा, नागपुरी, उड़िया, पंच परगनिया और कुरमाली को शामिल किया गया है. जिसमे अभ्यर्थियों को किसी एक भाषा का विकल्प चुनना होगा. जबकि जिला स्तरीय पदों के लिए कार्मिक विभाग क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं को चिह्नित करके अलग से सूची जारी करेगा.

जनजातीय भाषाओं के लिए होगी अलग-अलग विभाग 

मुख्यमंत्री ने बजट सत्र के दौरान कहा कि राज्य के विश्वविद्यालयों में शीघ्र ही पांच जनजातीय भाषाओं के लिए अलग-अलग विभागों की स्थापना होगी. इन विभागों में शीघ्र ही शिक्षकों की नियुक्ति होगी. यह क्षेत्रीय भाषाएं संताली, खोरठा, कुडुख, कुरमाली व मुंडारी हैं. हेमन्त सोरेन का यह कहना कि यह मांग काफी पुरानी है, साबित करता है कि पूर्व की सरकारों ने इस मांग को नजरअंदाज किया है. 

हो, मुंडारी व उरांव के लिए हेमंत सोरेन केंद्रीय गृह मंत्री को लिख चुके है पत्र 

हेमंत सोरेन द्वारा जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के मुद्दे का गंभीरता से जिक्र उनकी मिट्टी से जुड़ाव को दर्शता है. हेमंत सोरेन का “हो” जनजाति भाषा के अलावा अन्य दो प्रमुख भाषाओं “मुंडारी” और “उरांव” को भी जोड़ना, संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रयास है. अगस्त 2020 को केंद्रीय गृह मंत्री को लिखे एक पत्र में उन्होंने “हो” के अलावा दो अन्य जनजातीय भाषा यथा “मुंडारी” और “उरांव/कुडूख” को आठवीं अनुसूची में शामिल की मांग इसकी स्पष्ट व्याख्या हो सकता है.

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