भाजपा का अस्तित्व ही भीड़तंत्र के आसरे टिका है – मंडल से कमंडल का सफ़र हो या मोदी काल की सच्चाई

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इससे बड़ी विडंबना समाज के लिए और क्या हो सकती है जहाँ भीड़तंत्र का शुरुआत करने वाली भाजपा आज इस मुद्दे पर राजनीति भी कर रही है और गैर बीजेपी सत्ताओं को घेरने का प्रयास भी कर रही है. ऐसे में समाज ही तय करे कि उसे भाजपा -संघ के फैलाए धुंध में गुम होना है या फिर उसे क़ानून के आसरे आगे बढ़ना है.

यह पूरा समाज ही जैसे एक प्रकार उदासी से गुज़र रहा है. लोग भीड़ में अकेले हैं, अपने आप में खोये हुए, खुद से बातें करते हुए, ज़ि‍न्दगी की जद्दोजहद से थके हुए, उचाट और उदास है. अपने आसपास निगाहें दौड़ाइए, आपको ऐसा ही कुछ देखने को मिलेगा. ज़्यादा लोगों के पास कहने को कुछ भी नहीं और ढेरों चुप्पियाँ है. आसपास के भागते-दौड़ते अजनबी चेहरों के बीच ऐसा कोई नज़र नहीं आता, जिससे दिल की चन्द बातें की जायें और हाथ में हाथ दिये कुछ देर तक चुपचाप बैठा जाये. समाज में फैले अलगाववाद ने सभी को एक दूसरे से अजनबी बना दिया है.

स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक 30 करोड़ से ज़्यादा लोग गम्भीर डिप्रेशन से ग्रस्त

बिना शोर-शराबे के चुपचाप एक महामारी ने लम्बे समय से दुनिया को अपनी चपेट में लिये हुए है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक 30 करोड़ से ज़्यादा लोग गम्भीर डिप्रेशन से ग्रस्त हैं. इनमें से 2.3 करोड़ लोगों को शीज़ोफ़्रेनिया है. नतीजतन, लगभग 8 लाख लोग हर साल आत्महत्या कर लेते हैं. मगर भारत में यह समस्या और भी भीषण रूप में मौजूद है जहाँ विकृत भाजपा-संघ विचारधारा और पुराने, बंद समाज की विकृतियों का घालमेल एक ओर मानसिक जटिलताएँ पैदा कर रहा है तो दूसरी ओर इन समस्याओं को सँभालने के लिए न तो समाज तैयार है और न ही स्वास्थ्य तंत्र.

पूरी दुनिया में होने वाली आत्महत्याओं में क़रीब एक तिहाई हिस्सा भारत का

क्या आप इस तथ्य से वाकिफ़ हैं कि पूरी दुनिया में होने वाली आत्महत्याओं में क़रीब एक तिहाई हिस्सा भारत का है? चिकित्साविज्ञान की प्रसिद्ध पत्रिका ‘लांसेट’ के अनुसार दुनिया में होने वाली आत्महत्याओं में भारत का हिस्सा स्त्रियों में 1990 के 25.3% से बढ़कर 2016 में 36.6% हो गया और पुरुषों में 18.7% से बढ़कर 24.3% हो गया है. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 में पता चला कि 13-17 वर्ष उम्र के 98 लाख किशोर अवसाद और दूसरी मानसिक समस्याओं का सामना करते हैं.

वैश्विक स्तर पर बीमारियों की स्थिति 1990–2017’ नामक अध्ययन से पता चला था कि हर 7 में से 1 भारतीय अलग-अलग स्तर के मानसिक विकारों से परेशान था और भारत में रोगों के कुल बोझ में मान‍सिक विकारों का अनुपात 1990 से 2017 तक दोगुना हो गया है. क्या आप विश्वास करेंगे कि हमारे देश में 15-29 वर्ष और 15-39 वर्ष के बीच के लोगों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है, किसी भी संक्रामक रोग या दूसरी किसी बीमारी से भी ज़्यादा? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार 2018 में 10,159 विद्यार्थियों ने अपनी जान ले ली. 2017 में यह संख्या 9905 थी 2016 में 9478.

भारत में डिप्रेशन या मानसिक अव्यवस्था तेज़ी से पसर रही है

भारत में डिप्रेशन या अवसाद की असामान्य मानसिक अवस्था या मानसिक अव्यवस्था तेज़ी से पसर रही है. बहुसंख्यक कामगार आबादी दो जून की रोटी और जिन्दगी की न्यूनतम ज़रूरतें पूरी करने के लिए सुबह से शाम तक जूझती है और रात को अपनी परेशानियों-तनावों को देसी दारू मेमिलाकर हलक के नीचे उतार लेती है. और थोड़ी चीख-पुकार, के बाद उनकी झोपड़ियाँ नींद और अँधेरे में डूब जाती हैं. ऐसे में झारखण्ड जैसे गरीब प्रदेश में एक आदिवासी मुख्यमंत्री यूनिवर्सल पेंशन, मनरेगा मजदूरी बढाने या फिर लॉक डाउन में उन्हें कुछ सहूलियत देने की बात करता है. तो विपक्ष आडम्बर या भ्रम फैला का उस विचार को रौंदने का प्रयास करता है.

1980 – बीजेपी के उदय ही समाज में किसी न किसी रूप में भीड़तंत्र के प्रसारण से हुआ है, मंडल से कमंडल का सफ़र भी इसी का रूप

1980, भारतीय जनता पार्टी के उदय के बाद, भारत में धार्मिक उन्माद, चरम पतनशील, निरंकुश दमन की राजनीति और अपराध, भ्रष्टाचार, मँहगाई, बेरोजगारी आदि में अभूतपूर्व रफ़्तार से बढ़ोत्तरी हुई. यह भयंकर आत्मिक-सांस्कृतिक क्षरण और समाज में गहराते अलगाव, एकाकीपन, व्यक्तित्व के विघटन और दमघोंटू अवसाद की दुनिया की शुरुआत हुई है. आम नागरिकों के बीच, विशेषकर मध्य वर्ग के लोगों के बीच अवसाद और मानसिक अव्यवस्था की समस्या बड़े पैमाने पर और बहुत तेज़ी से फैली. कई शोध-अध्ययन इस बात की गवाही देते हैं, मनोचिकित्सकों और काउंसिलिंग की रिपोर्ट इसकी तस्दीक की है.

कौन सी परिस्थिति है जो युवाओं को भीतर से खाये जा रहा है

क्यों हैं ऐसे हालात? कौन सी परिस्थिति है जो युवाओं को भीतर से खाये जा रहा है? उम्मीदों और सपनों से भरी उम्र में कुओं युवा नाउम्मीदी, चुप्पी, अकेलेपन या तो भीडतंत्र का हिस्सा बन रहे हैं या फिर मौत का दामन थाम रहे हैं? इसे झारखण्ड की पृष्ठभूमि में ऐसे समझ सकते हैं. बेरोजगारी के आलम में भीड़तंत्र की शुरुआत, प्रचार-प्रसार या भीषण प्रयोग भाजपा सत्ता काल में हुआ है. या फिर ऐसे भी समझे कि भाजपा जैसे राजनीतिक दल को अस्तित्व में लाने वाला भी यही परिस्थितियां है. भीड़तंत्र के ही किसी न किसी रूप के सहारे भाजपा अस्तित्व में आयी. और दूसरी विचारधारा के दल क़ानून के सहारे इससे जूझने का प्रयास करती रही है.  

ताज उदाहरण, झारखण्ड के सिमडेगा में खाने के अधिकार के मद्देनजर एक हृदय विदारक घटना घटी है. हालांकि, झारखण्ड सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं. लेकिन राज्य की भाजपा इकाई मुद्दे को गौमांश से जोड़कर अपने भीड़तंत्र के एजेंडे को बढ़ाते हुए राजनीति करती साफ़ दिख रही है. चंद सालों पहले के झारखण्ड विकास मोचा के बाबुलाल और वर्तमान के भाजपा नेता बाबूलाल के वक्तव्य को सुने अंतर साफ़ पता चलता है. मसलन. इससे बड़ी विडंबना समाज के लिए और क्या हो सकती है जहाँ भीड़तंत्र का शुरुआत करने वाली भाजपा आज इस मुद्दे पर राजनीति भी कर रही है और मौजूदा झारखंडी सत्ता को घेरने का प्रयास भी करती दिखती रही है. ऐसे में समाज ही तय करे कि उसे भाजपा -संघ के  फैलाए धुंध में गुम होंना है या फिर संविधान में निहित क़ानून के सहार आगे बढ़ना है.

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