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भाजपा झारखंड

भाजपा आखिर क्यों छठ जैसे महान पर्व के नाम पर गन्दी राजनीति करने को है विवश

भाजपा लोकआस्था व सामाजिक समरसता की राह दिखाने वाले महान पर्व छठ पर गन्दी राजनीति करने को विवश 

मौजूदा दौर में, लूट कायम रखने की जुगत के मद्देनजर भाजपा की विचारधारा पूरी तरह से खोखली हो चुकी है। उनकी नैतिकता का पतन इस हद तक हो चुका है कि अब वह खुले आम मौकापरस्त राजनीति करने से नहीं चूक रही। स्थिति यह है कि केंद्र की भाजपा का मापदंड राज्यों की भाजपा इकाई के आगे दम तोड़ देती है। ऐसा भी नहीं है कि राज्य के भाजपा नेता ऐसा कर केंद्र के खिलाफ उदंडता का उदाहरण पेश कर रहे है, बल्कि यह केंद्र की भाजपा का साजिश का हिस्सा है। साफ़ प्रतीत होता है कि गैर भाजपा शासित राज्यों में वह मौकापरस्ती की हर पैतरे अपनाते हुए गन्दी राजनीति करने से नहीं चुकती, ताकि उनकी सस्ती लोकप्रियता बनी रहे।

केंद्र भाजपा द्वारा पारित मानदंडों का केंद्र के इशारे पर राज्य भाजपा द्वारा उल्लंघन मौकापरस्ती का स्पष्ट उदाहरण  

उदाहरण के तौर पर, झारखंड में जब भाजपा किसी भी जनहित मुद्दे के आसरे मौजूदा हेमंत सत्ता के सामने टिक पाने में आसमर्थ है, तो सरकार को धर्म के हथकंडे के तहत न केवल अस्थिर करने की प्रयास कर रही, बल्कि मौकापरस्ती के मातहत, केंद्र द्वारा पारित खुद की मानदंडों का उल्लंघन केंद्र के इशारे पर कर, आम जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ करने से भी नहीं चूक रही। ऐसे में सवाल है कि भाजपा को आखिर झारखंडी अवाम की चिंता क्यों नहीं है? 

गौर करे तो पाते हैं कि मौजूदा दौर में, बाहरी लूटेरे, माफियाओं व झारखंड की दलाली करने वाले दलालों के गठजोर का नाम ही झारखंड भाजपा है। जाहिर है ऐसे में उन्हें अवाम से अधिक चिंता झारखंड की खनिज-सम्पदा की लूट की ही होगी। और यह लूट तभी संभव हो सकती है जब उसकी पहुँच सत्ता तक हो। मसलन, यह जग जाहिर है कि सत्ता तक पहुँच बनाने के लिए मौकापरस्ती जैसे तमाम पैंतरे को अपनाने से वह नहीं चूकती। आप जो चाहे इसका नामकरण कर सकते है लेकिन कडवा सच तो यही है।

झारखंड के लोग भाजपा के राजनितिक पैंतरे भली भांति समझते हैं

भाजपा के नेताओं को लगता है कि झारखंडी लोग इनके गन्दी राजनीति के पीछे के मंसूबे नहीं समझते। आज इन्टरनेट की दुनिया हैं, झारखंड की समझदार जनता भलीभांति जानती है कोरोना संकट के मातहत केंद्र की भाजपा सरकार द्वारा देश/राज्यों के लिए क्या गाइडलाइन जारी की गयी है। साथ ही उन्हें यह भी पता है कि क्या उनके भविष्य व स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। हाईकोर्ट भी जनता के स्वास्थ्य के मद्देनजर इस प्रकार की छूट देने के पक्ष में नहीं है। सर्वे से साफ़ पता चलता है है कि लोग स्वयं ही परिवार की बेहतर स्वास्थ्य के लिए अपने-अपने घरों में ही इस महान पर्व को मनाने के लिए तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में आस्था व सामाजिक समरसता की राह दिखाने वाली पर्व छठ को भाजपा का राजनीतिक रंग दिए जाने का प्रयास पूरी तरह से सोची-समझी शाजिस का हिस्सा है।         

बहरहाल, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन निश्चित रूप से संवेदनशील हैं। इसलिए उनकी सरकार ने राज्य के जनता के भावना का आदर करते हुए, केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों/गाइडलाइन के ही तहत संक्रमण से बचाव के सुझावों के साथ पर्व को मनाने की छूट हैं। उन्होंने नदी व तालाबों में छठ पूजा करने की अनुमति देने से पहले स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता की उपस्थिति में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकार के साथ बैठक कर राज्य प्रशासन के क्षमता के अनुरूप निर्णय लिया। साथ ही जनता से अपील भी की है कि वह अपनी जागरूकता के स्तर बढाते हुए खुद के विवेक से एहतियात बरते हुए इस माहन पर्व को मनाएं।

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