बाबूलाल का स्वार्थी महत्वाकांक्षा झारखण्डी जनता के लिए घातक

भाजपा को आदिवासी चेहरे की तो बाबूलाल मरांडी को स्वार्थी महत्वाकांक्षा के फलीभूत हेतु भाजपा-संघ जैसे लूटेरी मानसिकता की जरूरत. झारखंड के लूट के लिए दोनों को ही एक दूसरे की जरुरत  

रांची : चुनाव झारखंड में दस्तक दे. और अचानक भाजपा नेता के रूप में बाबूलाल मरांडी की सक्रियता बढ़ जाए. वह मीडिया के समक्ष अलोकतांत्रिक बयान देने से न चूके. आदिवासियों को हिंदू बताए. तमाड़ चुनाव के नतीजों को दोहराने की बात करे. लोकतंत्र की खरीद-फ़रोख्त के अक्स में 10 मई तक झारखंड में भाजपा की सरकार बनाने तक की बात कह जाए. कभी बिना सिर-पैर की बजटीय सवाल उठाये. और तमाम तरह के अनर्गल बयानों के मार्फ़त जनता के सवालों से वर्चुअल जुड़ाव बनाने की प्रयास केरे. तो अक्स में उस समझ को समझा जा सकता है. जिसमे स्वार्थी महत्वाकांक्षा के मद्देनजर पार्टी का विलय और मुख्यमंत्री बनाने का सच है.   

भाजपा को आदिवासी चेहरे की तो बाबूलाल को भी भाजपा जैसे लूटेरी मानसिकता की जरुरत 

भाजपा-बाबूलाल के स्वार्थी महत्वाकांक्षा को समझने के लिए किस रॉकेट साइंस की आवश्यकता नहीं. मौजूदा दौर में जहाँ भाजपा को झामुमो को काउंटर करने के लिए एक ऐसे ही आदिवासी चेहरे की जरूरत थी. तो वहीं बाबूलाल मरांडी को अपनी महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए, केवल लूट से मतलब रखने वाली विचारधारा की पार्टी की आवश्यकता थी. चूँकि भाजपा के आदिवासियों का नाम रट की मंशा का पर्दाफाश हो चुका था. इसलिए उसे एक आदिवासी चेहरा चाहिए था. और बाबूलाल मरांडी जैसे संघी प्रचारक के बायोडाटा रखने वाले उपर्युक्त कोई नाम उसके लिए हो नहीं सकता था.  जो आदिवासियों के मुद्दों का भावनात्मक इस्तेमाल कर सकता है. 

चूँकि भजपा अर्जुन मुंडा को केंद्रीय मंत्री का झुनझुना पकड़ा चुकी हैं. महतो में आजसू का गर्दन पहले ही उसके जबड़े में है. और दलित से झामुमो बहुत अधिक संवाद अभी तक बना नहीं पायी है. ऐसे में रणनीति के तौर पर जेवीएम बाबूलाल के चेहरे को आगे कर झारखंड के आदिवासी-मूलवासी व गरीब जनता को फाँसने के लिए चाल चल दी है। 

मसलन,  बाबूलाल का नाम और आदिवासी चेहरा जहाँ भाजपा रबर स्टांप के तौर पर इस्तेमाल कर रही है. तो वहीं बाबूलाल जी फिर से मुख्यमंत्री बनने के सपने को साकार होता देख, वह बिना शर्त लोकतंत्र को ताक पर रखते हुए भाजपा-संघ के इशारे पर नाचने से कोई परहेज नहीं दिखा रहे हैं. लेकिन बाबूलाल नामक रबर स्टांप न केवल पुराना हो चुका है, घिस भी चुका है. और अपने भविष्य के मद्देनजर उनकी मानसिक भावना समझ रही. ऐसे में वह अपनी बची-खुची शाख भी गवां दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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