झारखंडी खिलाड़ियों की सीधी नियुक्ति, जरूरत पर टिकी भाजपा राजनीति के लिए चुनौती

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झारखंडी खिलाड़ियों की सीधी नियुक्ति

मौजूदा सत्ता में झारखंडी खिलाड़ियों की सीधी नियुक्ति, दूसरों की जरूरत पर टिकी भाजपा राजनीति के लिए चुनौती, क्यों उसकी नीतियां 14 बरस में स्थानीय मुद्दों से सरोकार न बना पायी

हैसियत पाकिस्तान की भले दुनिया के नक्शे में सुई भर न हो लेकिन, केन्द्रीय मानसिकता का केवल उससे आगे निकलने भर की भूख मंगल फतह से कम नहीं मालूम पड़ता। जाहिर है अपनी इसी महत्ता के आसरे भाजपा राजनीति हमेशा सौदेबाजी की तलाश में रहती है। क्योंकि उसकी अपनी जरूरत दूसरों की जरूरत पर ही टिकी होने का सच लिए है। राज्यों में एक राष्ट्रीय दल के रूप में भाजपा की उपस्थिति का सच केवल बाहरियों व सवर्ण मानसिकता की लूट राजनीति पर आश्रित होने भर का है। तो ऐसे में झारखंड जैसे राज्य के बेहतरीन अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी ही क्यों न हो। उसके अधिकारों पर भी संकट खड़ा हो तो आश्चर्य क्यों? 

झारखंड का सच खिलाड़ियों की एक ऐसी लम्बी फेहरिस्त से जुडती है। जहाँ संसाधन के अभाव में भी खिलाड़ी राज्य व देश का नाम रोशन करते आये हैं। ना जाने कितनों की प्रतिभा मुफलिसी में दम तोड़ दी। इसकी खीज का अहसास तब होता है जब कोई झारखंडी मानसिक प्रतिभा के सम्मान में कहता है। 20 बरस कैनवास में पहली बार है जब कि अल्प संसाधन के बीच, आंतरिक और राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न खेल स्पर्धाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों की सीधी नियुक्ति की ऐतिहासिक लकीर खींचता है। और बहुत जल्द नयी खेल नीति की जरूरत को समझते हुए जल्द ही लाने की बात कहता है। तो…


मसलन, झारखंड के प्रतिभावान खिलाड़ियों के लिए जहाँ यह सुखद खबर है। वहीं बीते 14 बरस के भाजपा शासन की नीतियों को लेकर गभीर सवाल भी खड़े हो सकते हैं। जहाँ आदिवासी-मूलवासी अधिकार संरक्षण के मद्देनजर उस सरकार की प्राथमिकता खिलाड़ियों के आर्थिक विकास से सरोकार क्यों नहीं बना सका? जबकि बाहरियों की आर्थिक ग्राफ से उसके संबंधों प्रगाढ़ होने के सच को झूठलाया नहीं जा सकता। खेर मौजूदा दौर की झारखंडी मानसिकता वाली सत्ता स्थानीय की  जरूरतों को समझ भी रही है और ठोस नीतियों के अमलीकरण पर जोर भी दे रही है।

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