संविधान दिवस पर कोई कहे कि देश संवैधानिक लकीरों पर अडिग है

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संविधान दिवस

संविधान दिवस पर ही महाराष्ट्र में फडन्वीस को इस्तीफ़ा देना पड़ा

क्या आज संविधान दिवस पर कोई यह कहने की स्थिति में है कि सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत अपने संवैधानिक लकीरों पर अडिग है? यकीनन नहीं। संविधान होना और संविधान की लकीरों के तहत नुमाइन्दों को चुनने से लेकर देश को बुनने तक के अधिकार को ही शायद लोकतंत्र कहा जा सकता है। लेकिन सत्ता जब जनादेश व कालेधन के आसरे उसी संविधान पर सफ़ेद चादर ओढ़ा सत्ता पाने को ही लोकतंत्र कहे तो कोई कैसे संविधान दिवस मनाये।

मौजूदा संविधान दिवस के वक़्त में देश का त्रासदीदायक सच तो यही हो चला है कि आवाम को केवल सत्ता के लिए एक टूल बना दिया गया है। चुनावों में जनता जिसे हराती है वे ही कालेधन से लिचिंग कर सत्ता तक पहुँच जाते हैं। यकीनन संविधान में दर्ज शब्द के मायने अब महत्वहीन हो चले हैं। ऐसे में सत्ता द्वारा परिभाषित लोकतंत्र देश बनाने का रास्ता तो कतई नहीं हो सकता।

इस संविधान दिवस पर सत्ता के पास देश चलाने के पैसे नहीं

सत्ता के पास विधायक खरीदने के लिए ऑपरेशन लोटस के तहत बेहिसाब पैसे हो और देश चलाने के लिए देश को ही बेचने की बात करे तो क्या कहियेगा? जो मर्ज़ी कहना हो कह सकते हैं, देश की शान माने जाने वाली बीपीसीएल, एयर इंडिया और टिहरी बाँध की सार्वजनिक कंपनी से लेकर, शिपिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड व अन्य कंपनियों तक को ‘रणनीतिक विनिवेश’ का हवाला दे निजी कंम्पनियों को मार्च तक बेचने की स्थिति में हो तो संविधान को आज कैसे परखियेगा

सत्ता इसे बेच कर देश में 78,400 करोड़ लाएगी, क्योंकि उसके के पास देश चलाने के लिए पैसे नहीं है,  लेकिन वही सत्ता वोडाफ़ोन, एयरटेल व अन्‍य कॉर्पोरेट्स को 42 हज़ार करोड़ रुपये की छूट देने का ऐलान भी करती है। मसलन, मंदी में डूबी अर्थव्‍यवस्‍था के भंवर में फंसे देश को बचाने से ज्यादा जरूरी सत्ता के लिए कॉर्पोरेट्स घरानों को बचाना जरूरी हो जाए तो आपको समझना होगा कि संविधान दिवस के मौके पर हमारे लिए किस राग को गाना जरूरी है। 

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