यह वक़्त युवाओं का भरमाने का नहीं बल्कि धुंध के उस पार भविष्य को देखने का है

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भविष्य को देखने का है

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर हुआ हमला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राज्य के युवाओं के उस भविष्य पर है, जिसकी बाट युवा 20 वर्षों से जोह रहे हैं

सन 2000, झारखंड को अलग राज्य बनने के बाद, 2020-2021, यह पहला मौका है जहाँ यह राज्य अपनी नयी नीतियों के आसरे, अपनी मूलभूत सुविधा के अभावों के दरारों को भरने के दिशा में सधे क़दमों से आगे बढ़ा है। जहाँ पहली बार जख्मों के मवादों का इलाज नहीं बल्कि जख्मों को कारणों को टटोला जा रहा है, ताकि इसका जड़ से इलाज हो सके। इस नए कैनवास में युवाओं के सपनों को पंख देने के लिए सटीक नीतियां गढ़ी जा रही है, जिसके जद में राज्य के तमाम वर्गों को रखा गया है।  

इस कैनवास की रेखा की अमिटता ने राज्य में 14 वर्षों तक शासन करने वाली भाजपा के राजनीतिक चौहद्दी को हिला कर रख दिया है। उसकी ताश के पत्तों पर खड़ी की गयी इमारत एक-एक कर ढहढहा कर गिरने लगी है। शायद इसी डर के कारण भाजपा हाफ-पेंट पहना कर विभीषणों की फ़ौज खड़ा कने में जुट गयी है। साहित्य गवाही देते हैं कि जब भी मनुवादी विचारधारा को लगता है कि मानवता उस पर भारी है, तो वह मानवता के सभी लकीरों को मिटाने पर उतारू हो जाता है। और छल-बल, लोभ, साजिश, महिलों को ढाल बना आदि तमाम पैतरों मैदान में उतर जाता है। 

मनुवादी विचारधारा को मानवता से इतना भय क्यों ?

देश में उदाहरण भरे पड़े हैं, जब भी मनुवादी व्यवस्था को डर लगता है वह नीचता पर उतर आता है। फिर जस्टिस लोया हो, संपादक गौरी लंकेश हो, रोहित बेमुला हो, या फिर झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ही क्यों न हों, सभी को भी रौंदने के लिए तैयार रहता है। 

मसलन, झारखंड के युवाओं के लिए यह फैसले की घड़ी है। युवाओं को यह तो तय करना ही होगा कि उन्हें स्वर्णिम भविष्य चाहिए या फिर भ्रम से भरी फूट की राजनीति। इतिहास गवाह है मंडल से कमंडल की युवाओं को मुड़ने के कारण, आज देश ऐसे मुहाने पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ उसे एक वस्तु बना बिकने के लिए बाजार में खड़ा कर दिया गया है। 


युवाओं को समझना होगा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर हुआ हमला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राज्य के युवाओं के उन सपनों पर हमला है, जिसकी वे बाट 20 वर्षों से जोह रहे हैं। जिसकी आस में उन्होंने राज्य के सत्ता से भाजपा को तिलांजलि दी है। यह वक़्त भरमाने का नहीं बल्कि धुंध के उस पार देखने का है। नीतियों के शब्दों में झाँक कर अपने भविष्य को देखने का है। जिसके आसरे युवा अपने चमकते भविष्य को फिर से गढ़ सकती हैं। इसी कारण तो भाजपा डर रही है….             

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