वीर सावरकर नहीं जो डर जाऊं, मैं स्वतंत्र हूँ, क्योंंकि मैं दैनिक भास्कर हूँ …

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मैं दैनिक भास्कर हूँ

‘दैनिक भास्कर’ पढने वाले कुछ महीनों से चकित जरुर होंगे. भास्कर पत्रकारिता पथ पर लौटते हुए सिलसिलेवार तौर पर ख़बरें खोजने लगा था. गंगा तीर पर दफनाई शवों की तस्वीरे दहलाने वाली थी. सुस्त टीकाकरण पर विस्तृत रिपोर्टिंग सीधे तौर पर भाजपा के केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे थें. उसी ने राजस्थान की गहलोत सरकार में बिना इस्तेमाल किए फेंके गए टीके का सच सामने लाया. खंडन सरकार करती रही भास्कर प्रमाण देता रहा, ख़बरें सच थी हर हर्फ़ ने चीख कर बताया. तमाम परिस्थितियों के बीच  अख़बार भरोसा दिलाता रहा कि उसकी अपनी स्वतंत्र नीति है. जहाँ सरकारी स्क्रिप्ट मायने नहीं रखता.

अखबार ज़मीनी सच दिखायेगा तो ढपोरशंखी सरकार की धड़कन जरुर तेज होगा 

मौजूदा दौर में जब अखबार ज़मीनी सच दिखायेगा तो उस सरकार की धड़कन जरुर तेज करेगा जो हर मोर्चे पर विफल हो. और अपने प्रचार-प्रसार में प्रतिदिन करोड़ों फूंकती हो. कोरोना संक्रमण के दूसरे दौर में केंद्र की भाजपा सरकार सोयी रही, बंगाल चुनाव में खोई रही. तब चंद अखबार ही covid-19 के त्रासदी या कहर को दिखा-पढ़ा रहे थे. उस सूची में भास्कर था. एक से सत्रह अप्रैल के बीच जब संक्रमण चरम पर था, प्रधानमंत्री के ट्विटर हैंडल से सैकड़ों ट्वीट हुए, देश का दुर्भाग्य रहा कि कोरोना बचाव से सम्बधित केवल तीन ट्वीट थे. 

कोरोना संक्रमण जब चरम पर था उस दौर में प्रधानसेवक के ट्वीट 

  • 12 अप्रैल – देश में कोरोना के 1.61 लाख मामले, तब प्रधानमंत्री ने बंगाल चुनाव से जुड़े 16 वीडियो ट्वीट किए. 
  • 13 अप्रैल – देश में जब 1.84 लाख कोविड केस आये, प्रधानमंत्री ट्विटर पर सबको त्योहारों की बधाई दे रहे थे. 
  • 17 अप्रैल – कोविड के 2.61 लाख मामले आए, बंगाल में अपनी रैली में उमड़ी भीड़ पर प्रधानमंत्री ने प्रसन्नता जताया. 
  • 23 अप्रैल – कोविड के 3.46 लाख केस आ चुके थे, प्रधानमंत्री ने वर्चुअल रैली की. 
  • 27 अप्रैल – वह तारीख है जब प्रधानमंत्री ने पहली बार ऑक्सीजन की कमी को लेकर हाई लेवल मीटिंग किया.

यह वहीं दौर था. दिल्ली भी अस्पताल खोज रही थी, ऑक्सीजन सिलिंडर की मांग हो रही थी. लोग सड़क पर दम तोड़ रहे थें. पुलों से शव फेंककर जा रहे थे. नदियों के तीर क़ब्र में तब्दील हो चुके थे. उत्तरप्रदेश में श्मशानों की दीवारे सरकार ऊँची कर रही थी. ख़बरें इतनी प्रत्यक्ष थीं कि आंख चुराया नहीं जा सकता था. उस दौर में भी वह सरकार तमाम परिस्थितियों का खंडन ठीक वैसे ही कर रही थी जैसे संसद में उसने बताया कि देश में ऑक्सीजन की कमी से एक की भी मौत की ख़बर नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे कोरोना के पहले दौर में बताया था उसके पास आंकड़े नहीं है कि कितने प्रवासी मजदूरों ने पैदल चलते हुए दम तोड़ दिया.

भास्कर ने 27 ज़िलों को खंगाल कर देश को बताया, गंगा किनारे 1140 किलोमीटर में 2000 से अधिक शव पड़े हैं

दैनिक भास्कर के पत्रकारों ने यूपी के 27 ज़िलों को खंगाला और देश को बताया कि गंगा किनारे 1140 किलोमीटर के दायरे में 2000 से अधिक शव पड़े हैं. बड़ी तस्वीर छापी जिसमें नदी के घाट पर सरकार के प्रबंधन का सच दिख रहा था. यह पत्रकारिता को मायने दे सकता है. लेकिन किसे पता था कि शाबाशी के तौर पर अख़बार के कई दफ्तरों पर एक साथ छापे पड़ेंगे. ज्ञात हो गुरूवार को भास्कर के कई ठिकानों पर दिन भर छापे पड़ते रहे. यही हाल उत्तर प्रदेश के स्थानीय समाचार एजेंसी भारत समाचार की भी रही. ब्रजेश मिश्र व चैनल स्टेट हेड वीरेंद्र सिंह के घर और दफ्तर पर भी छापे पड़े. भारत समाचार भी लगातार यूपी सरकार से सवाल कर रहा था. 

भारत समाचार चैनल ने छापों को यूपी चुनाव से जोड़ते हुए कहा कि वह छापों से डरने वाला नहीं. सरकार चाहती है कि वह अन्य चैनलों की तरह आलोचना छोड़ दे. लेकिन वह नहीं रुकेगा. यही भाव भास्कार का भी दिखा. जहाँ उसने कहा, “मैं वीर सावरकर नहीं जो डर जाऊं, मैं स्वतंत्र हूँ, क्योंकि मैं दैनिक भास्कर हूँ … मसलन, भाजपा सरकार देश में अजब परिस्थितयों में फंसती जा रही है. जहां किसान, कर्मचारी, युवा आदि ने पहले ही मोर्चा खोल रखा था अब अखबार-मीडिया भी उस फेहरिस्त में आकर खड़े होते जा रहे हैं, जहाँ …

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