किसान आन्दोलन के सहारे के रूप में उभरता देश का पानी पिलावो आन्दोलन

Share on facebook
Share on telegram
Share on twitter
Share on whatsapp
देश का पानी पिलावो आन्दोलन

देश के अहिंसावादी किसान को, मटके में पानी भर पिलाने को उमड़ी भीड़ मोदी सत्ता के कई सत्य उभारती है 

देश के अन्नदाता, देश के मालिक, किसानों को मोदी सत्ता द्वारा आतंकवादी, हिंसावादी सिद्ध करने के जद्दोजहद में, उनके धरना क्षेत्र में इन्टरनेट, बिजली तो फिर भी दूर, उन्हें पानी पिलाने से इंकार कर दे, तो ऐसी मानसिकता के साथ कैसे भाजपा सत्ता को पूंजीपतिपोषक से इतर देश परम्परावादी सत्ता मान ले। शायद जनता ने इस सत्य को स्वीकार कर लिया है, तभी तो पूरा देश मोदी सरकार के फैसले के खिलाफ, अहिंसावादी किसान को, मटका भर पानी पिलाने को धरना स्थल पर उमड़ पड़ी है। जिसे सत्ता के विरुद्ध व किसान आन्दोलन के सहयोग में देश का पानी पिलाओ आन्दोलन भी माना जा सकता है। 

ज़मीन की भूख में आदिवासी-मूलवासियों की सुरक्षा कवच सीएनटी/एसपीटी तक को भेदने की साज़िश हुई

भाजपा को बड़े बनियों का संगठित दल माना जाता है। भाजपा सत्ता व उनके अनुषंगी दलों के आकाओं को ज़मीन की भीषण भूख है। पहले प्रायोगिक तौर पर भाजपा सत्ता ने देश भर के राज्यों में, जहाँ उनकी सत्ता बनी, वहां वह ज़मीन हड़पने का खेल खेली। स्पष्ट उदाहरण के तौर पर हम झारखंड को ले सकते हैं। जहाँ ज़मीन की भूख में कभी लैंडबैंक बने, कभी हाथी उड़े। भूख न मिटने की स्थिति में आदिवासी-मूलवासियों की सुरक्षा कवच सीएनटी/एसपीटी तक को भेदने की साज़िश हुई। धारा 370 प्रकरण इसी कड़ी का हिस्सा भर हो सकता है। और देश में भाजपा द्वारा घोषित तमाम मौजूदा बेतुके एजेंडे इसी मंशा के फलीभूत में उठाया गया कदम भर है।    

बनिए की टोली को राज्यों की ज़मीनों से भूख न मिटने पर निकल पड़े गरीब किसानों की ज़मीन हड़पने

जब बनिए की टोली को राज्यों की ज़मीनों से भी भूख न मिटी तो खुले आम निकल पड़े है, देश के गरीब किसानों की ज़मीन हड़पने। लाद दिया इन मुफलिसों पर फरमान के तौर पर तीन काले कानूनों का भार। देश के किसानों को पहले ही एहसास हो गया था, लेकिन महापंचायत में उमड़ती भीड़ व इन किसानों को देश द्वारा पानी पिलाने की कावाद, सरकार के सच्चाई के कई परतें उधेड़ती है। दरअसल, अपने एजेंडे को फलीभूत में मौजूदा सत्ता तमाम संस्थानों को ताक पर रखने के क्रम में न्याय को भी बंधक बनाने से नहीं चूकी। अपने राजनैतिक मतलब के अक्स तले इतिहास के काले पन्ने, पुराने घावों को भी कुरेदने से नहीं चुकी।

मसलन, इतिहास कुरेदने के क्रम में वह भूल गयी कि देश में सत्ता से पहले भी भारत की महान परंपरा में पंचायतें लगती थी।  और न्याय व्यवस्था के अंधी हो जाने की स्थिति में वह व्यवस्था फिर से जाग चुकी है। और देश के पंच परमेश्वर न्याय के ख़ातिर कमर कस लिए हैं। देश की जनता धीरे-धीरे सरकार से इतर किसानों की ओंट लेने लगी है। ऐसे में मोदी सत्ता को जल्द तय करना चाहिए कि कील व दीवार के बजाय, अन्नदाताओं की मांगे माने और उनके राहों में फूल बिछाए। अन्यथा तानाशाह सत्ता गद्दी खाली करें देश की जनता आती है …

Leave a Replay

DON’T MISS OUT ON NEW POSTS

Don’t worry, we don’t spam. Click button for subscribe.