मधुपुर उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त

झामुमो इतिहास दुहराती हुई मधुपुर उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त दी

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झामुमो का इतिहास दोहराना और मधुपुर उपचुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त कई मायने में झारखंड के लिए महत्वपूर्ण है. भाजपा का भविष्य गर्दिश में

रांची : झारखंड में झामुमो ने पिछले पांच सालों के इतिहास को दोहराया है. मधुपुर उपचुनाव का नतीजा दिलचस्प रहा. भाजपा को झारखंड में इस बार भी जनता द्वारा नकारा गया है। वजहें उसकी जन विरोधी नीतियांयुवाओं के भविष्य के साथ किया गया खिलवाड़ ही मुख्य वजह हो सकती है. उपचुनावों में एक-एक कर भाजपा को 8 हार का भार में एक और अतिरिक्त हार का भार जुड़ 9 हो चुका है. हार भी ऐसी जहाँ भाजपा मुकाबले में सिरे से ख़ारिज हो चुकी है. इसी के साथ फियुज बलब गैंग व फर्जी बाबा का ट्रान्सफोर्मर ही उड़ गया. 

झामुमो जीत का झारखंड में अलग राजनीतिक मायने

झारखंड में इस जीत का अलग राजनीतिक मायने हो सकते हैं। झामुमो के जीत के मद्देनजर झारखंड में अब तय हो गया है कि ये महज आंकड़े भर नहीं है, जनता के अपने मिजाज से संघ विचारधारा आधारित भाजपा बाहर हो चुकी है। जनता ने लूट, भ्रम और साम्प्रदायिकता पर आधारित राजनीति को तिलांजलि दे दिया है. अब देखना यह है कि तमाड़ के इतिहास दुहराने वाले अपनी हार पर क्या बयान देते हैं और कैसे राज्य में भाजपा की सरकार बनाएंगे. लेकिन बडबोल से इतर चुनाव में झारखंडी मानसिकता को मजबूती मिली है. जहाँ झारखंड ने जात-पात के राजनीति से ऊपर उठ अपने आंदोलनकारी नेता को श्रद्धांजलि दिया है. और मौकापरस्तों को करारी जवाब.

मसलन, झारखंड के भाजपा इकाई के नेताओं को इस हार से जरूर सीख लेना चाहिए। कि राज्य के प्राथमिकताओं से बढ़कर पार्टी नहीं होती. और वजह चाहे जो रहे लेकिन विपत्ति में नैतिकता को प्राथमिकता देते हुए जनता के साथ खड़ा होना चाहिए. अब भी वक़्त है जहाँ झारखंडी भाजपा नेताओं को कोरोना त्रासदी में केंद्र के समक्ष मजबूती से खड़ा होना चाहिए. और झारखंड की मदद के मद्देनजर हेमंत सरकार के सवालों को केंद्र के समक्ष मजबूती से रखना चाहिए. अन्यथा झारखंड में भाजपा का भविष्य अंधेरे में दुखती है. क्योंकि, सत्ता और नेतृत्व कितनी भी तानाशाह क्यों ना हो जाए आखिरकार उसका हर पैंतरा जनता के दहलीज पर दम तोड़ ही देता है।

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