भाजपा पचा नहीं पा रही एक आदिवासी मुख्यमन्त्री की लोकप्रियता, बार-बार कर रही है हमले

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भाजपा पचा नहीं पा रही एक आदिवासी मुख्यमन्त्री की लोकप्रियता

भाजपा पचा नहीं पा रही आदिवासी मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन की लोकप्रियता, मनुवादी विचारधारा पर खड़ी संघवाद के समझ तले भाजपा अलोकतांत्रिक हो बार-बार कर रही है हमले

रांची : मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन के नेतृत्व में  झारखण्ड सरकार ने लगभग डेढ़ साल पूरे कर लिए है. इन डेढ़ सालों में भाजपा जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय, सत्ता हथियाने की लालसा में मुख्यमन्त्री पर लगातार अलोक्ततांत्रिक तौर पर हमले करती रही हैं. भाजपा कोशिश करती रही है कि वह सरकार गिरा दें. मसलन, राज्य के आदिवासी संगठनों व समुदाय के बीच यह चर्चा आम हो चली है  कि भाजपा को एक आदिवासी मुख्यमन्त्री की बढ़ती लोकप्रियता नहीं पच रही है. यही वजह है कि वह बार-बार पिछली गली से मुख्यमन्त्री पर हमले जारी है. हालांकि भाजपा अपने काले मंसूबे में कामयाब नहीं हो सकी है. जिससे उसकी खीज बढ़ती जा रही है.

कुछ घटनाओं को गौर करने पर साफ पता चलता है 

  • 4 जनवरी 2021, रांची के किशोरगंज में मुख्यमन्त्री के काफिले पर हमला किया गया. जिसमें मुख्य आरोपी भैरव सिंह है जिसका पुराना सम्बन्ध भाजपा से है. आरोपी को जमानत मिलने के बाद मुख्य विपक्षी दल से जुड़े संगठनों द्वारा उसे ऐसे  प्रचारित किया जा रहा है कि जैसे वह कोई आन्दोलनकारी या हीरो हो, जो जेल से वापस आया हो.
  • मुख्यमन्त्री ने कोविड के खिलाफ जब मुहिम छेड़ी तो भाजपा ने सहयोग देने के बजाय, उसके सांसदों/विधायकों ने हेमंत सरकार को बदनाम और परेशान करते रहे.
  • कई बार सरकार गिराने की असफल कोशिश हुई. ताजा मामले में महाराष्ट्र भाजपा के प्रदेश महासचिव चंदू उर्फ चंद्रशेखर बावनकुले का नाम सामने आया है.
  • अपने गिरबान को झांके बिना भाजपा द्वारा लगातार आदिवासी मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन पर लगातार परिवारवाद का आरोप भी लगाया जा रहा है.

आखिर क्यों भाजपा को आदिवासी समाज से इतनी खीज है – क्या यह संघवाद का असर है?

मौजूदा दौर में भाजपा के पास ऐसा कोई आदिवासी चेहरा नहीं है जो मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन के नेतृत्व का मुकाबला कर सके.  ज्ञात हो बाबूलाल मरांडी की मौजूदा छवि एक दलबदलू, मौकापरस्त व स्वार्थी राजनेता की हो चली है. जनता द्वारा वे खारिज किए जा चुके हैं. राज्य में पहली बार भाजपा द्वारा पांच साल सरकार चलाने के बाद भी, उसके मनुवादी विचारधारा के अक्स तले 2019 के विधानसभा चुनाव में हार मिली. साथ ही तीन उपचुनावों में भी भाजपा को लगातार हार का सामना करना पड़ा है. हालांकि वह अपनी जीत नतीजों से पूर्व ही तय मान रही थी. और पार्टी अभी तक सदमे से ऊबर नहीं सकी है.

संकटों और चुनौतियों से मजबूत हुए है हेमन्त सोरेन 

कोरोना संकट के दौर में हेमन्त सोरेन को सत्ता मिली है. संवेदनशीलता, मजबूती और आत्मविश्वास के साथ के  उन्होंने संकट और चुनौतियों का सामना किया. उन्होंने लगातार बिना थके काम किया और कुशल नेतृत्व का लोहा मनवाते हुए दूसरी लहर पर अंकुश लगाया. देशभर में वे पहले मुख्यमन्त्री थे जिन्होंने मुफ्त वैक्सीन की बात कही थी. केंन्द्र ने जिसका अनुसरण बाद में किया. 

कोरोना काल में श्रमिकों की मदद मुहैया करने में बतौर मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन में जो संवेदनशीलता दिखी, वह देश में एक मिसाल है. हवाई जहाज, विशेष ट्रेनों जैसे तमाम साधनों की मदद से श्रमिकों को वापस झारखंड लाया गया. विदेशों में फंसे श्रमिकों तक मदद पहुंची. पहले पायदान पर खड़ा हो देश को ऑक्सीजन उपलब्ध कराया. मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन ने तमाम मामलों में लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी है. मानव तस्करी के कोढ़ से ग्रसित झारखंड की बेटियों को न केवल मुक्त कराया गया बल्कि उन्हें रोजगार से जोड़ने की भी पहल इन्हीं के कार्यकाल में हुई है.जो अबतक जारी है. 

हावर्ड यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन की धमक 

जब दुनिया के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, हावर्ड यूनिवर्सिटी ने मुख्यमन्त्री हेमन्त सोरेन को विचार रखने के लिए आमंत्रित किया, तो उन्होंने इस मंच का उपयोग दलित-दमित-आदिवासियों की आवाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के रूप में किया. मुख्यमन्त्री ने हावर्ड यूनिवर्सिटी को संबोधित करते हुए सहजता के साथ आदिवासियों की पीड़ा बयान किया. उन्होंने बिना अपना गुणगान किए झारखंडी दृष्टि और प्रदेश की जनता की बात कही. ऐसे में भाजपा को चिढ़ होना स्वाभाविक है. मसलन, मौजूदा दौर में भाजपा को हेमन्त सोरेन को हराने के लिए बड़ी लकीर खींचनी होगी. जिसकी बुनियाद जनता के नब्ज को संवैधानिक तौर पर छूती हो. क्योंकि हवाई महल ताश के पत्ते की तरह ढह जायेंगे.

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