वैक्सीन मामले में झारखंड पर सवाल उठाने के बजाय भाजपाइयों को पहले सुप्रीम कोर्ट के जीने के अधिकार से सम्बंधित, महत्वपूर्ण सवालों का जवाब देना चाहिए

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सुप्रीम कोर्ट के जीने के अधिकार से सम्बंधित महत्वपूर्ण सवाल

कोरोना वैक्सीन मामले में, सुप्रीम कोर्ट के जीने के अधिकार से सम्बंधित महत्वपूर्ण सवालों से बचने के लिए केंद्र से राज्यों पर आरोप लगा रही. जबकि यह वक़्त उसके लिए अभिभावक बन संघीय ढांचा को मजबूत करने का है.

रांची : केंद्र की भाजपा सरकार को पहले सुप्रीम कोर्ट के उन सवालों का जवाब देना चाहिए, जो जनता के जीवन से संबंधित है. चूँकि, मोदी सरकार से कोर्ट द्वारा पूछे गए सवाल का सीधा सम्बन्ध जीने के अधिकार है. तो लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप सवालों के जवाब कोर्ट के साथ-साथ जनता की चेतना के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है. 

महत्वपूर्ण सवाल -. 

  1. अलग-अलग राज्यों में वैक्सीन की कीमत अलग क्यों है?
  2. कोविन पोर्टल पर वैसे ग्रामीण भारत, जो संसाधनहीन हैं, नेटवर्क की कमी से जूझते हैं, जिन्हें इंटरनेट की पर्याप्त जानकारी नहीं है. वह ग्रामीण गरीब भारत रजिस्ट्रेशन कैसे कर पाएंगे. यह कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है?

वैक्सीन मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी किया, कि “इंडिया जो भारत है, राज्यों का संघ है, का संविधान जब कहता है कि केंद्रीय सत्ता को संघीय शासन का पालन करना चाहिए. तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कहना कि भारत सरकार को खुद ही कोरोना वैक्सीन की खरीद कर, राज्यों को वितरण करना चाहिए. जो देश की अखंडता के लिए कितना महत्वपूर्ण हो जाता है. 

लेकिन, तमाम परिस्थितियों के बीच यदि भाजपा सुप्रीम कोर्ट के सवालों के जवाब देने के बजाय. देश को बरगलाने की मंशा पाले, टीकाकरण की विफलता पर झारखंड सरकार को चिट्ठी लिखे. वह भी तब जब टीका बर्बादी के प्रोपेगेंडा का पर्दाफाश हो चुका हो. तो केंद्रीय सत्ता की देशभक्ति व राष्ट्र को एक सूत्र में बांधे रखने वाली डोर को कमजोर करने की सच्चाई समझी जा सकती है.   

भाजपा भूल चुकी है कि भारत में कोरोना संक्रमण राष्ट्रीय आपदा का मामला है

पूरे प्रकरण में, क्या भाजपा महज एक बरस में ही भूल चुकी है कि भारत में कोरोना संक्रमण राष्ट्रीय आपदा का मामला है. चूँकि, तमाम तकनीक व संसाधन केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है. इसलिए उसके पास ही महामारी से सम्बंधित तमाम मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने के विशेषाधिकार सुरक्षित है. और राज्य सरकारें केंद्र के निर्देशों के आधार पर ही अपनी क्षमता के अनुरूप, जनता के हित में नियमों को तय करती हैं. जबकि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने अपने वक्तव्य में बता चुके हैं कि ऑक्सीजन कोटा से लेकर वैक्सीन वितरण तक को केंद्र ही नियंत्रित करता है.

ज्ञात हो, देश भर में झारखंड ऑक्सीजन उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर होने के बावजूद. अपनी मर्जी से इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता है. इसके लिए भी केंद्र द्वारा कोटा तय किया गया है. इन हालात में भी जब झारखंड अपनी इच्छाशक्ति से, युवाओं के निशुल्क टीकाकरण की अभी बात भर ही करता है. कि केंद्र राज्य से जुड़ी परियोजनाओं, खासकर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में आवंटित होने वाली राशि में भारी कटौती कर देता है. जिसके बोझ तले राज्य सरकारों का दम फूलने लगता है. और वही भाजपा कोतवाल बन सवाल भी करने लगती है – क्या हुआ तेरा वादा? तो ऐसे में भाजपा विचारधारा की परपंच को जनता के लिए समझना आवश्यक हो जाना चाहिए.

मसलन, भारत के राज्य घोर वित्तीय संकट के समक्ष खड़ा है. ऐसे में मुख्यमंत्रियों का केंद्र की तरफ टकटकी निगाह कर पत्र लिखना ही एकमात्र विकल्प शेष रह जाता है. और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य के नागरिकों के हित में केंद्र को पत्र लिख भी दिया है. ऐसे में भाजपा द्वारा इस विषम परिस्थिति पर राजनीति करना, जनता को सच्चाई से दूर रखने का प्रयास भर है.

क्या केंद्र को राज्यों पर आरोप लगाने के बजाय अभिभावक बन फर्ज अदा नहीं करना चाहिए 

बहरहाल, मोदी सत्ता पहले गैर भाजपा राज्यों से सौतेला व्यवहार करती है. और अपनी इस कलंक को छुपाने के लिए झारखंड, बंगाल समेत तमाम गैर भाजपा शासित राज्यों पर ही संघीय भावना का अनादर करने का आरोप लगा देती थी. और राज्य केंद्र की ताक़त के आगे केवल कसमसाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पाते थे. लेकिन, मौजूदा दौर में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र की भाजपा सरकार को संघीय व्यवस्था की याद दिलाया जाना. उसकी पोल खोलती दिखती है. मसलन, बेहतर होगा कि  केंद्र राज्यों पर आरोप लगाने के बजाय अपने अभिभावक होने का फर्ज अदा करें. और देश में जीने के अधिकार को सुनिश्चित करना चाहिए.

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