चौसर

चौसर में फंसी भाजपा को बाबूलाल का आसरा

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हेमंत के चौसर में फंसी भाजपा को बाबूलाल का आसरा 

नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन द्वारा 2019 के झारखंड चुनाव में बिछाई गयी महाभारत की चौसर केवल राजनीति भर नहीं है। पासे जिस तरह फेंके गए वह झारखंड में गाथा के तौर पर कई  दस्तावेज़ रच रही है। जिसमें एक तरफ भाजपा क्षित-विक्षित हो 180 डिग्री पर घूमने को मजबूर हो गयी है। जहाँ वह समीक्षा करते हुए ऐसे नतीजे पर पहुँची और उनके बी टीम माने जाने वाली जेवीएम समेत उसके सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी को वापस घर बुलाना पड़ा। ऐसा पहली बार हुआ है जहाँ भाजपा वापस घूम कर अपने शुरूआती दौर के राजनीति तक लौटने पर मजबूर है।

जनादेश के बाद भाजपा की यह रणनीति पहली नजर में ही साफ इशारा करता दिखता है कि वह न केवल सांगठनिक बल्कि सांस्कृतिक तौर पर झारखंड में कमजोर हो चुकी है। जहाँ वह संघी संस्कृति विचारधारा व अपनी कार्यशैली के लकीर तले डरी दिखती है, जहाँ उसे राजनीति में यह आभास हो रहा है कि कोई उसे बख्शेगा नहीं। जिस प्रकार समीक्षा के दौरान पूरे चुनाव का फीडबैक केंद्रीय नेताओं द्वारा हारे हुए प्रत्याशियों से अलग-अलग बुला कर लिया गया, उसी स्थिति पर मुहर लगाती है। हारे प्रत्याशियों ने केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष जिस प्रकार गुस्से में अपनी पीड़ा बतायी़ या फिर भड़ास निकाले, वह संगठन के जर्जरपन को ही तो दर्शाता है।

मसलन, हेमंत सोरेन की फेंके चौसर की दूसरी परिस्थिति ज्यादा रोचक है, जिसमें भाजपा ऐसी फंसी जहाँ वह बी टीम के आसरे सेकुलर वोट बटोरने में बहुत हद तक कामयाब रहती थी, अब उससे वह वंचित होती दिखती है। जिसका सीधा फायदा भविष्य में झामुमो को होता साफ़ दिखता है। तो ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि तो फिर भाजपा घाटे का सौदा कर क्यों रही है। इसका जवाब यह है कि वह ऐसा कर नहीं रही बल्कि खुद के अस्तित्व को झारखंड में बचाने के लिए उसे ऐसा करना पड़ रहा है। मतलब हेमन्त सोरेन के फेंके चौसर ने भाजपा को उसके विचारधारा समेत न केवल आदिवासियत बल्कि झारखंडियत सरोकारों से अलग दिखने की स्थिति में ला खड़ा किया है। और इस करो या मरो वाली स्थिति में अगर वह ऐसा नहीं करती है तो खुद को नहीं बचा सकती।

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